क्यों आस्था आधारित पंथ धार्मिक नहीं हैं

अब्राहमिक पंथ (रिलिजन),  विशेष रूप से ईसाईयत और इस्लाम ऐसे पंथ हैं जिनमें आस्था पर प्रश्न नहीं किया जा सकता उनका विश्वास है कि इन आस्थाओं को स्वीकार करने पर ही उद्धार होता है और स्वर्ग में जाने का अधिकार भी मिलता है उनका प्रमुख कार्य दूसरों को अपने पंथ में परिवर्तन करना है, जिसके लिए वे अनेक प्रकार से प्रभावित करना, लोभ-लालच या भय का प्रयोग करते है

ऐतिहासिक रूप से, ईसाईयत और इस्लाम पंथ के प्रचार के लिए तरह तरह के भय- जैसे ईश्वर का डर, फ़तवा, जिहाद व दण्ड का उपयोग हुआ है। आधुनिक पंथनिर्पेक्ष(सेकुलरवादी) देशों में भय का प्रयोग अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, पर होता अवश्य है, और पंथ परिवर्तन की उद्देश्य पूर्ति के लिए जनहित और सामाजिक हित के कार्यों के  मुखौटे का प्रयोग होता है।

आस्था आधारित पंथ का उद्देश्य अपने भीतर के ईश्वरीय की अनुभूति करना नहीं होता बल्कि उसमें किसी उद्धारक, पैगम्बर, ग्रन्थ या संप्रदाय को महत्व दिया जाता है ईश्वर सम्पूर्ण आस्था का विषय होता है, उस पर न तो प्रश्न किया जा सकता है, न उसकी प्रमाणिकता पर प्रश्न किये जा सकते हैं और न ही आंतरिक अवलोकन किया जा सकता है भारत में अस्तित्व में आई ‘धार्मिक’ परम्पराएं बहुत अलग हैं । ये ज्ञान आधारित हैं, न कि आस्था आधारित। यहाँ ज्ञान नाम, आकार या संख्या का बाहरी ज्ञान नहीं है, बल्कि यह आन्तरिक आत्मज्ञान और अस्तित्व की एकता की समझ है

धार्मिक परम्पराएं आस्थाओं पर बल नहीं देतीं, बल्कि हमें आत्मचेतना पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। यह परम सत्य, सामूहिक आस्थाओं से नहीं बल्कि केवल स्वयं के प्रयासों से अर्जित किया जा सकता है इसका मार्ग हर एक के लिए अलग होता है धार्मिक परम्पराओं और विज्ञान में ज्ञान अर्जित करने की पद्धतियों में बहुत सी समानताएं हैं इसीलिए हिन्दू या बुद्ध धर्म को ‘पंथ’ कहना भ्रामक होगा

विश्व में आज आस्था आधारित पंथों का वर्चस्व है, ये पंथ सामूहिक विमर्श को अध्यात्म से हटा कर आस्था के विषयों पर लाना चाहते हैं यही कारण है कि आस्था आधारित पंथों के सम्मेलनों (interfaith conferences) का आयोजन किया जाता है, ऐसे समारोहों में पहले ही आस्थाओं और मान्यताओं को पंथ (religion) की परिभाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है, जिससे अब्राहमिक परम्पराओं और उनके विचारों को एक प्रकार से अनुचित लाभ मिलता है   

धर्म, आस्था और पंथ

आज भारतीय प्रसंग में ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग साधारणतः पंथ (religion) के रूप में किया जाता है परन्तु आस्था आधारित पंथ को ‘धर्म’ कहना उतना ही भ्रामक होगा जितना कि धार्मिक परम्पराओं को ‘पंथ’ कहना

धर्म सार्वभौमिक सत्य पर आधारित है, न कि आस्था और मान्यताओं पर धर्म का आरंभ ही प्राकृतिक शक्ति से होता है अग्नि का धर्म उसका ताप और दहन का गुण है अग्नि की ज्वलनशक्ति धारणा या आस्था पर निर्भर नहीं करती परन्तु यह अनुभव करने का विषय है भगवान आपको अग्नि में हाथ डालने पर दण्डित नहीं करता, आप केवल अग्नि की हानिकारक प्राकृतिक क्षमता का अनुभव करते हैं

धर्म आध्यात्मिक स्तर तक जाता है, जिस स्तर पर इसकी जड़ें कर्म के नियम से जुडी हैं, जो कि हमारे कार्य और उसके परिणामों के बीच का सम्बन्ध है  कर्म का नियम ईश्वर की आज्ञा पर निर्भर नहीं करता बल्कि ये प्रकृति के नियम और मन कैसे काम करता है, उसको दर्शाता है

हमारे विचारों और कार्यों का परिणाम स्वाभाविक रूप से उनमें निहित गुणों पर आधारित होता है, बिल्कुल वैसा जैसे प्राकृतिक शक्तियों में होता है उदाहरण के लिए क्रोधित होने का परिणाम हिंसक और विनाशकारी हो सकता है कर्म का कोई दण्ड नहीं होता बल्कि उन बलों का स्वाभाविक परिणाम होता है जिन्हें हम खुद पैदा करते हैं कर्म के नियम को समझने से हम अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी और अपने कर्मों के लिए ज्यादा सचेत हो जाते हैं

आस्था धर्म नहीं है

आस्था आधारित पंथ धर्म नहीं हैं, न ही सार्वभौमिक सत्य के सिद्धांत हैं यीशु ईश्वर का एक मात्र पुत्र है या मुहम्मद अंतिम पैगंबर है यह किसी समुदाय विशेष के लिए आस्था का विषय हैं, न कि धार्मिक सिद्धान्त, जो हर व्यक्ति और हर समय के लिए वैध हो

आस्था आधारित पंथ तर्कहीन मान्यताओं के लिए प्रेरित करते हैं ईसाईयत में, कौमार्य गर्भधारण, क्रॉस पर  जीजस के रक्त से समस्त मानवता का उद्धार होना, स्वर्ग या नर्क के लिए निर्णायक दिन पर मृतकों का जीवित होना जैसी बातों में आस्था होना आवश्यक है हम इन आस्थाओं को धर्म नहीं कह सकते

आस्था और तीन गुण

धार्मिक परम्पराओं में श्रद्धा का महत्व समझा गया है, प्रायः श्रद्धा का अनुवाद आस्था किया जाता है, जो समर्पण और भक्ति को दर्शाता है। परन्तु श्रद्धा सृष्टि की सारी रचनाओं की तरह तीन गुणों से प्रभावित होती है, वो तीन गुण हैं सात्त्विक, राजसिक और तामसिक श्रीमद् भगवद गीता और अन्य हिन्दू ग्रन्थ इन तीन गुणों का विस्तार में विश्लेषण/परीक्षण करते हैं

जो सार्वभौमिक है उसमें आस्था होना, सत्य में आस्था होना, या सभी प्राणियों में दिव्यता की उपस्थिति में आस्था होना, जो निःस्वार्थ और शांतिपूर्ण हो, जिसका स्वभाव ज्योतिर्मयी हो, संतुलित और बुद्धिमत्ता पूर्ण हो, वही सात्त्विक है

वो आस्था जो अहंकारी हो, केवल किसी एक व्यक्ति या समूह के लिए हो, जिसका उपयोग शक्ति अर्जित करने के लिए हो, ऐसी आस्था रजस  के अस्थिर गुणों को दर्शाती है, जो आक्रामक, गर्व से पूर्ण, भावुक और उत्तेजित होती है वह आस्था जो अपने व्यवहार में या प्रचार करने के लिये घृणा और हिंसा के लिए प्ररित करे वह तामसिक , अंधी या अंधकारमयी हो जाती है 

यह आवश्यक नहीं है की एकेश्वरवाद (एक ईश्वर में आस्था) सात्त्विक  ही हो, भावनात्मक आस्था और एकमेवता में विश्वास रजस को बढ़ावा देता है लोगों का पंथ परिवर्तन और अपनी आस्था के लिए विश्व पर अधिकार पाने की इच्छा रखना निश्तिच ही राजसिक है और यह आक्रामकता व अहंकार दर्शाता है, न कि एकमेवता (एक होने) के उच्चतम सत्य को

रजस गुण ऊर्जा और प्रबल भावावेश देता है, अव्यावहारिक महत्वाकांक्षाओं की ओर आकर्षित करता है, गहन चेतना की और जाने से रोकता है  यह आसानी से ‘तमस’ और हिंसा की और ले जा सकता है

विवेक की आवश्यकता

धर्म आस्था और विश्वास पर निर्भर नहीं करता, बल्कि प्रत्यक्ष बोध और सही-गलत देख पाने, या विवेक  पर निर्भर करता है ऐसा गहन विवेक केवल आस्था, विश्वास और मन की कल्पनाओं को सत्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता इसके लिए अपने मस्तिष्क और अपने अहम् से ही प्रश्न करने होते हैं, समस्त माया  जाल को भेदना होता है

मानव का सबसे बड़ा धर्म अपनी चेतना को समय, स्थान और कर्म  की सीमाओं से परे ले जाकर स्वतंत्र करना है यह आस्था आधारित विश्वास नहीं है बल्कि यह योग और ध्यान की सहायता से अध्यात्म का अनुभव है

पंथ और अध्यात्म पर विचार-विमर्श करते समय हमें शब्दों पर पूरी तरह से स्पष्टता होनी चाहिए, जिससे शब्दों के अनुचित अनुवाद को रोका जा सके, आस्था आधारित पंथ को धर्म से बराबर करके नहीं देखा जा सकता और धर्म को आस्था के स्तर तक नीचे नहीं ले जाया जा सकता

आस्था पर्याप्त नहीं है; आस्था पर प्रश्न उठने ही चाहिये और उसका महत्व उच्चतर चेतना के आतंरिक अनुभवों से ज्यादा नहीं हो सकता है, नहीं तो आस्था एक रूकावट और एक बोझ बन सकती है विश्व के इतिहास में और आज भी विश्व भर में अनियंत्रित होते संघर्ष इसी को प्रमाणित करते हैं  प्रतिस्पर्धा में लगी सेनाएं और उग्रवादी संगठन पूरी लगन और समर्पण के साथ अपनी आस्था के वर्चस्व के लिए काम कर रहे है, परन्तु धर्म के सम्मान के लिए नहीं

(अनिल मोटवानी तथा वीरेंद्र सिंह का हिंदी अनुवाद के लिए आभार)

About the Author

Dr. David Frawley
Dr. David Frawley, D.Litt (Pandit Vamadeva Shastri) is the Director of American Institute of Vedic Studies (www.vedanet.com). He is a renowned Yoga, Ayurveda and Jyotish Teacher. He is also a Padma Bhushan awardee and author of 'Shiva, the Lord of Yoga' and over thirty other books.