वर्तमान भारत में ‘बुद्धिजीवी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ बनने की प्रक्रिया

आमतौर पर विश्व में स्थापित धर्मो के नाम कुछ इस प्रकार है : हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध। लेकिन विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश भारत में धर्म कुछ इस प्रकार है: हिन्दू, ‘समुदाय विशेष’, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध।

कमाल की बात हमारे जनतंत्र में यह रही है कि हम सबका वैभवशाली इतिहास उजाड़कर अपने मापदंड से मिथकपूर्ण और झूठा इतिहास बनाने वाले वामी कलमें ‘बुद्धिजीवी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ चिड़िया के नाम से जानी जाती हैं, और अपने धर्म को बाहरी आक्रमण से बचाने वालों को ‘भगवा आतंकवादी’ बताकर शर्मसार करने का प्रयास कई दशकों से किया जा रहा है।

आपको यदि इनके अनुसार विद्वानों की श्रंखला में अलंकृत होना है और सड़क पर बिक रहे 2 कौड़ी के ‘बुद्धिजीवी’ नामक बिल्ला अपने छाती पर लगाकर घूमना है तो देवी देवताओं को गाली देना, उन्हें काल्पनिक बताना, अपने लोगों का शोषण करके दूसरों को लाभ पहुँचा कर उन्हें खुश करना आना चाहिए। ऐसी विशेष योग्यता धारकों का यहाँ हमेशा स्वागत रहेगा।

इस देश मे इन्ही ‘बुद्धिजीवी’ बिल्ला धारकों के कारण हिन्दू को अपने ही पूज्य की आराधना में संकोच होने लगा है। अब वो बेचारा भी क्या करे जब 700 करोड़ कमा गयी फ़िल्म PK में शिवलिंग पर दूध चढ़ाना ही व्यर्थ बता दिया गया; चुटिया रखना, धोती पहनकर घूमना गवारो की निशानी बता दी गयी हो; महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी की जगह अकबर महान इनकी शिक्षा का हिस्सा बना दिये गए हो।

आखिरकार इस देश का हिन्दू अपने आप को हिन्दू कहलाने में शर्म क्यों ना करे जब उसे वामी कलमों द्वारा असभ्य घोषित कर दिया गया हो जिन्होंने मुगलों से घर बनाना सीखा और अंग्रेजो से जेंटलमैन बनना। असलियत में हमे कभी हमसे रूबरू करवाया ही नहीं गया क्योंकि ये सड़क चलते बुद्धिजीवी जानते हैं कि जिस दिन इस देश का हिन्दू अपने वैभवशाली इतिहास का स्मरण कर लेगा, उस दिन से लेकर आने वाली हर सदी हिंदुस्तान की सदी होगी यहाँ के हिन्दुओं की सदी होगी।

इस देश में सदैव ऐसे आरोप वामी मीडिया की सड़कों पर बेताहाशा नंगे पैर चले हैं कि ‘उन्मादी हिन्दू’ लोग देश मे अशांति ला रहे है। इसके लिए आज तक जो महान बुद्धिजीवी आतंकवाद का धर्म नहीं बता पाए वो भगवा आतंकवाद की विचारधारा का गाना विश्व भर में गाते हैं ।जिन्हें आजतक यह मालूम नहीं हुआ कि अयूब पंडित को किसने मारा था वो यह बता पाने में अचानक सक्षम हो जाते हैं कि अखलाक को मारने वाले तिलक लगाते थे या टोपी पहनते थे। वो राममंदिर किसने तोड़ा इस बात को जानने में तनिक उत्सुक नही होते, परंतु बाबरी किसने तोड़ी यह बताकर उन्हें तुष्टिकरण की रोटियां सेकनी है; उन्हें गुजरात याद दिलाकर सांत्वना चाहिए और गोधरा की घटना महज दुर्घटना बतानी है।

इन सब प्रसंगों के बाद लोकतंत्र का यही चौथा स्तंभ अख़बारों में, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में, जुनैद को मारने वाले का धर्म हिन्दू बताते हैं और दिल्ली में रात अपने बच्चे संग खेल रहे डॉक्टर पंकज नारंग के हत्यारों को ‘समुदाय विशेष’ का बताते है। दुनिया के कौन से शब्दकोष में ‘समुदाय विशेष’ की उचित परिभाषा अंकित है शायद सभी जानना चाहेंगे, परन्तु वाकई में इस ‘समुदाय विशेष’ शब्द का अविष्कार इन्ही बिल्ला-धारी बुद्धिजीवी गैंग ने किया है ताकि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ विचारधारा वाले अपने हिन्दू जीवन पद्धति को कलुषित और अमानवीय बताया जा सके, और जिहाद और खुद के धर्म को काफिरों से खतरा बताकर बेगुनाहों की जान लेने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों को शांति का अग्रदूत बताया जाए।

इन सभी षड्यंत्र को समझकर इनका तोड़ निकालने हेतु हिन्दू समाज के लोगों को अग्रेसर की भूमिका निभानी पड़ेगी नहीं तो अतीत में विश्वगुरु बना हुआ हिंदुस्तान अतीत के चंद गौरवशाली पन्नों तक सिमट कर रह जायेगा और जयचन्दों की फ़ौज एक बार फिर हम पर बढ़त ले लेगी।

– सुशांक कुमार


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