अंदरूनी सूत्रों के अनुसार क्या सोनिया गांधी एक राजनीतिक माफिया की संचालक हैं?

जैसे जैसे मार्ग्रेट अल्वा की पुस्तक ‘साहस और प्रतिबद्धता – एक आत्मकथा’, के अंश एक के बाद एक सुर्खियां बना रहे हैं, लाखों भारतीय नागरिकों की आशंकाएं सच हो रही हैं – कि सोनिया गांधी बिल्कुल मनमाने तरीके से काम करती हैं और भ्रष्ट, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों और सांठगांठ का समर्थन करती हैं ।

सोनिया द्वारा अपनाए गए राजनीतिक माफिया किस्म के प्रबंधन को उजागर करने वाली अल्वा पहली नहीं हैं। तवलीन सिंह, संजय बारू, नटवर सिंह, जयंती नटराजन, विनय सीतापति सभी इसी तरह के वर्णन के साथ सामने आए हैं।

पूर्ण दासता – कांग्रेस आचार संहिता

अल्वा ने कहा कि 2008 में कर्नाटक के चुनावों के लिए कांग्रेस की सीटें योग्यता अनुसार नियुक्ति के बजाय बोली लगाने वालों के लिए खुली थीं। कांग्रेस ने उनके दावों से इनकार किया और पार्टी अध्यक्ष, सोनिया गांधी के साथ एक मीटिंग के बाद अल्वा को उनकी आधिकारिक जिम्मेदारियों से निष्कासित कर दिया गया। अल्वा ने दावा किया कि उनके निष्कासन में एके अंटोनी का हाथ है।

एक समाचार अंश उद्धृत करते हुए –

“अल्वा ने अपनी आत्मकथा में उनके द्वारा 2009 में लिखित एक पत्र जो उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव के पद से इस्तीफा देने के लिए कहे जाने के बाद लिखा था, की प्रतिलिपि प्रस्तुत की है।

वह लिखती हैं: “समय बदल गया और पहली बार मुझे उस संगठन में अनुपयुक्त की तरह महसूस हुआ जिस संगठन को मैंने अपने घर के रूप में अनमोल माना था। हमारे हाल के उम्मीदवारों की सूची पर एक नज़र डालने से खनन, शिक्षा और भूमि भवन व्यापार जैसे धनी और अमीर मंडली के प्रतिपालन का एक विशिष्ट प्रतिमान दिखता है …

बिचौलियों के माध्यम से कार्य करना कठिन है क्योंकि हमें कभी पता नहीं लगता है कि कब और कौन सा संदेश वास्तव में आपका है और आप क्या चाहती हैं। मुझे अब एहसास हुआ है कि मैं आपके आसपास के निर्णय लेने वाले लोगों के साथ तालमेल में नहीं हूँ।”

वह आगे लिखती हैं कि कैसे सोनिया के एक कॉल ने कुछ सेकंड में उनकी किस्मत को मोहरबंद कर दिया, और उन्हें दिल्ली से बाहर का रास्ता दिखाया गया, जो उनके दावे के अनुसार पार्टी के भीतर उनके कुछ विरोधी हमेशा से चाहते थे। उनकी मर्जी के बिना उन्हें उत्तराखंड का राज्यपाल बनाया गया।”

इस रिपोर्ट के अनुसार, अल्वा की पुस्तक ने यह भी खुलासा किया है कि गांधियों के क्रिश्चियन मिशेल के पिता वोल्फगैंग के साथ संबंध थे। क्रिश्चियन मिशेल 3600 करोड़ रुपये के विवादित अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर घोटाले में मुख्य बिचौलिया है।

अल्वा की आत्मकथा के अनुसार, मामला 1980 के दशक का है जब संजय गांधी जीवित थे। समाचार रिपोर्ट का हवाला देते हुए:

“संजय गांधी, सीपीएन सिंह और टैंक घोटाला

इसे टैंक घोटाले के रूप में जाना जाता था, जहां संजय गांधी और सीपीएन सिंह ने साउथ अफ्रीका को भारतीय सेना के सेकेंड हैंड टैंक बेचने के लिए कथित रूप से मिलीभगत की थी। सीपीएन सिंह, जो संजय गांधी के प्रमुख सहयोगी और विश्वासपात्र थे, को तब अल्वा के आरोपों के कारण उनके पद से हटा दिया गया था। इसके अलावा, अल्वा ने अपनी आत्मकथा में आरोप लगाया है कि उन्हें सीपीएन सिंह द्वारा निशाना बनाया जा रहा था क्योंकि वह मिशेल के साथ उनके संबंधों से पर्दा हटाने वाली थी।”

अल्वा की पुस्तक में पीवी नरसिम्हा राव सरकार के दौरान सोनिया के हवाले से कहा गया है, “कांग्रेस सरकार ने मेरे लिए क्या किया है? यह घर मुझे चंद्र शेखर सरकार ने आवंटित किया था।”

अल्वा ने कांग्रेस के साथ 45 वर्षों तक काम किया है, और केवल एक बार स्पष्ट प्रतिक्रिया देने से उन्हें पार्टी के सभी पदों से निष्कासित कर दिया गया। उन्होंने अपने बॉस सोनिया गांधी पर पार्टी को “मनमाने ढंग से” चलाने का भी आरोप लगाया

“कांग्रेस में निर्णय बहुत केंद्रीकृत है”, अल्वा ने एक टीवी शो में कहा।

प्रतिशोधी सोनिया

तवलीन सिंह ने भी 2 किताबें, ‘दरबार’ और उनकी नवीनतम ‘इंडियाज ब्रोकन ट्रिस्ट’ लिखी हैं, जिसमें लुट्येन्स दिल्ली की जीवनशैली और सोनिया गांधी पर प्रकाश डाला गया है। तवलीन सिंह के पार्टनर, हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी के एमडी अजीत गुलाबचंद, को सोनिया गांधी के खिलाफ लिखे गए उनके पत्रकीय लेखों के परिणामों का सामना करना पड़ा।

तवलीन सिंह की हालिया जारी किताब के पहले अध्याय में बताया गया है कि सोनिया गांधी ने उनसे व्यक्तिगत बदला लेने के लिए आयकर विभाग और ईडी अधिकारियों को ‘आतंकवादियो’ की तरह कैसे इस्तेमाल किया। “तुरंत नीचे आओ, हम भारत सरकार के लिए काम करते हैं, हम प्रवर्तन निदेशालय से हैं,” उन्होंने स्थानीय ठगों की तरह चिल्लाया, लेखक ने कहा।

तवलीन सिंह की नवीनतम पुस्तक के एक अंश में वह बताती हैं कि कैसे जब एक पूर्व यूपीए मंत्री ने सोनिया, उनके बच्चों और उनके दोस्तों के प्रति पक्षपात, जो राष्ट्रहित के खिलाफ था, करने से इनकार किया, तो सोनिया ने उस मंत्री से गाली-गलौज और दुर्व्यवहार किया।

इस साक्षात्कार में, तवलीन का कहना है कि सोनिया गांधी ने जानबूझकर और चतुराई से मीडिया को अपने से दूर रखा ताकि कांग्रेस के महत्वपूर्ण मुद्दों और नीतियों पर उससे सवाल न पूछे जाएँ। और यह एक सटीक अवलोकन है – लगभग 20 साल तक देश के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक होने के बावजूद, सोनिया गांधी ने आज तक कभी भी किसी तीक्षण साक्षात्कार का सामना नहीं किया है। यह वास्तव में लोकतंत्र के स्तंभों में से एक, हमारे मीडिया, के कामकाज पर सवाल उठाता है।

सोनिया और उसके करीबी रिश्तेदारों का नाम रिश्वत, दलाली और भ्रष्टाचार के पैसे प्राप्त करने वालों के रूप में सामने आए हैं – बोफोर्स, प्राचीन वस्तुओं की तस्करी, नेशनल हेराल्ड घोटाला, अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाला, 2 जी, कोयला-गेट, वाड्रा-गेट आदि में। लेकिन हमारे मीडिया द्वारा इन मामलों पर उनसे कभी सीधे तौर पर पूछताछ नहीं की गई, और उनके राजनीतिक रसूख ने यह सुनिश्चित किया कि वह कानूनी कार्यवाही से भी बची रहीं ।

असली प्रधानमंत्री

नीति विश्लेषक और शीर्ष नौकरशाह संजय बारू की पुस्तक ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर‘ इस तथ्य को सामने लाती है कि सोनिया और उनके बेटे राहुल प्राथमिक निर्णयकर्ता थे और मनमोहन सिंह 2004-2014 से यूपीए सरकार में सिर्फ एक मुखौटा थे। बारू बताते हैं कि सिंह ने उन्हें समझाते हुए कहा, “इससे उलझन पैदा होती है। मुझे यह स्वीकार करना होगा कि पार्टी अध्यक्ष सत्ता का केंद्र हैं। सरकार पार्टी के प्रति जवाबदेह है।”

पुस्तक में सोनिया गांधी की सत्ता और पैसे की भूख की ओर इशारा किया गया है। वह ये सवाल भी उठाती है कि क्या ए राजा को सोनिया गांधी के इशारे पर नियुक्त किया गया था और क्या पीएम मनमोहन ने जानबूझकर अपने सहयोगियों द्वारा किये गये भ्रष्टाचार की अनदेखी की?

अधिनायक, अहंकारी, गुप्त

विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, नटवर सिंह की आत्मकथा ‘वन लाइफ इज़ नॉट इनफ’ सोनिया गांधी के सत्तावादी, अहंकारी और स्वार्थी व्यवहार पर प्रकाश डालती है। पूर्व पीएम पीवीएन राव के लिए सोनिया की प्रकट शत्रुता के अलावा पुस्तक में सोनिया के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया गया है – जैसे कि अगर सोनिया गांधी के स्थान पर किसी अन्य नेता ने 1999 में राष्ट्रपति के सामने बहुमत का गलत दावा किया होता तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाता।

नटवर सिंह की पुस्तक पर एक अन्य समाचार रिपोर्ट से पता चलता है कि वह सोनिया गांधी को कांग्रेस के पतन का श्रेय देते हैं। नटवर सिंह के अनुसार, सोनिया गांधी के साथ राजपरिवार की तरह व्यवहार किया गया और वह एक अतिमहत्वपूर्ण महिला की तरह व्यवहार करती हैं। उन्होंने सोनिया के एक व्यग्र और शर्मीली महिला से परिवर्तित होकर एक अधिकारवादी नेता और दृष्टिकोण में बेहद गोपनीय होने के बारे में बताया है। उनका कहना है कि कांग्रेस पार्टी में सोनिया का अधिकार जवाहरलाल नेहरू की तुलना में अधिक मजबूत है और पार्टी में हर असंतोष को कुचल दिया जाता है। लेकिन सभी तेवरों से अलग, वे लिखते हैं की सोनिया गांधी एक साधारण और असुरक्षित व्यक्ति हैं।

उपयोग करो और फेंको की नीति

यूपीए सरकार में पर्यावरण मंत्री रहीं जयंती नटराजन को दिसंबर 2013 में सोनिया गांधी ने इस्तीफा देने के लिए कहा था। सोनिया को संबोधित उनका लंबा पत्र स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जयंती और उनके मंत्रालय को बलि का बकरा बनाया गया था और उस समय अर्थव्यवस्था की विफलता के लिए सोनिया और राहुल द्वारा उनको (जयंती और उनके मंत्रालय को) जिम्मेदार ठहराया गया था। ऐसा भी लगता है कि जासूसी मामला (स्नूपगेट) पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलने के लिए उन पर दबाव डाला गया था। उनके पत्र के कुछ अंश:

मैं यह बताना चाहती हूं कि मैं नियमित रूप से राज्य मंत्री (I/C) पर्यावरण और वन के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन कर रही थी, जब 20 दिसंबर, 2013 को अचानक तत्कालीन पीएम, डॉ मनमोहन सिंह, ने मुझे उनके कार्यालय में बुलाया। जब मैंने प्रवेश किया तो वह अपनी कुर्सी से उठे, तनावग्रस्त और गंभीर दिखे, और इन सटीक शब्दों का उच्चारण किया। उन्होंने कहा “जयन्ती, मुझे कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा है कि पार्टी के काम के लिए आपकी सेवाओं की आवश्यकता है।” मैं हैरान थी, और मैंने कहा, “हाँ सर। तो मुझे क्या करना चाहिए? ”उन्होंने जवाब दिया,“ वह चाहती है कि आप इस्तीफा दें।” मैं चौंक गयी और बोली,“ इस्तीफा सर? लेकिन कब?” उन्होंने जवाब दिया “आज।” मैंने एक बार फिर उनसे पूछा कि क्या यही कांग्रेस अध्यक्ष चाहती है। उन्होंने पुष्टि में जवाब दिया। निस्संदेह, और आप पर पूरी तरह से भरोसा करते हुए, मैंने एक भी शब्द नहीं कहा, लेकिन उनसे मुस्कुराते हुए कहा कि मैं कांग्रेस अध्यक्ष की इच्छाओं का पालन करूंगी।

अगले दिन मेरा इस्तीफा मीडिया में सुर्खियों में था, और सभी प्रारंभिक रिपोर्टों ने सही बताया कि मैंने पार्टी के काम के लिए इस्तीफा दिया था। दोपहर तक आश्चर्यजनक रूप से, मुझे जानकारी मिली कि श्री राहुल गांधी के कार्यालय के लोग मीडिया को बुला रहे थे और कहानियाँ सुना रहे थे कि मेरा इस्तीफा पार्टी के काम के लिए नहीं था।

उसी दिन, अर्थात्, मेरे इस्तीफा देने के अगले दिन, श्री राहुल गांधी ने उद्योगपतियों की एक फिक्की (FICCI) बैठक को संबोधित किया, जहाँ उन्होंने पर्यावरणीय मंजूरी में देरी और अर्थव्यवस्था पर उसके प्रतिकूल प्रभाव पर अपमानजनक टिपण्णी की, और कॉर्पोरेट जगत को आश्वासन दिया कि पार्टी और सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि आगे से उद्योग के लिए कोई देरी और अड़चन न आए।

कुछ विश्लेषकों ने अनुमान लगाया कि मुझे उस समय अर्थव्यवस्था की कथित विफलता के केंद्र बिंदु के रूप में पेश किया जा सकता है। इसके बाद मीडिया में मेरे खिलाफ एक हिंसक, शातिर, गलत और प्रेरित अभियान, पूरी तरह से पार्टी में विशेष रूप से चुने हुए व्यक्तियों द्वारा, किया गया। जो कहा गया उसमें सत्य का एक भी शब्द नहीं था, न ही कोई ठोस तथ्य था।

मुझे यह भी लगता है कि मुझ पर उन मुद्दों का नेतृत्व करने के लिए दबाव डाला गया है जिन्हें मैंने गलत माना। एक उदाहरण: जब मैं एक मंत्री थी, तब एक महत्वपूर्ण मामला जिसने मुझे काफी परेशान किया वह यह है कि मुझे वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए कहा गया था, जिसे मीडिया में ‘स्नूपगेट’ का नाम दिया गया।

इस तथ्य के बावजूद कि मैंने शुरू में इनकार कर दिया था, क्योंकि मैंने सोचा था कि पार्टी को नीति और शासन पर श्री मोदी पर हमला करना चाहिए और एक अज्ञात महिला को विवाद में नहीं घसीटना चाहिए, श्री अजय माकन ने मुझे 16 नवंबर, 2013 को फोन किया जब मैं एक दौरे पर थी और मुझे इस मुद्दे पर एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करने के लिए तुरंत दिल्ली आने के लिए कहा। मैंने ऐसा करने के लिए अपनी अस्वीकृति व्यक्त की और इस कार्य से इनकार कर दिया, यह उल्लेख करते हुए कि मैं उस समय एक मंत्री थी, और इसे सरकार के दृष्टिकोण के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। मैंने सुझाव दिया कि शायद एक आधिकारिक प्रवक्ता को प्रेस कांफ्रेंस करनी चाहिए, यदि ऐसा जरूरी है तो। श्री माकन ने मुझे एक बार फिर बताया कि यह “उच्चतम स्तर” पर लिया गया निर्णय था और इस मामले में मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जो विवाद चला उसके दौरान श्री माकन ने टीवी चैनलों पर और बहस करते समय मुझे श्री मोदी पर जमकर हमला करने को बोला, हालाँकि मेरे मंत्री के रूप में नियुक्ति के बाद मीडिया में मुझे कभी किसी और विषय पर बोलने के लिए नहीं भेजा गया था।”

उन्होंने आगे यह भी कहा:

“मेरी प्रतिष्ठा को पहुँचा नुकसान पूर्ण और विनाशकारी है। और मेरे परिवार की आने वाली पीढ़ियाँ मुझे माफ नहीं करेंगी अगर मैंने सही विवरण नहीं दिया। इसलिए मैंने आपको पत्र लिखने के लिए इस समय को चुना है। मैं इसे चार महीने की प्रार्थना और चिंतन और इस निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद कर रही हूं कि मुझे आपको वह सच लिखने की जरूरत है, जो आप भी मेरे जितना ही जानती हैं।

हालांकि अभी पार्टी में काफी मंथन चल रहा है, लेकिन मेरी अपनी समस्याएं बहुत गहरी हैं, और ये सामान्य तौर पर पार्टी के संबंध में और मेरे साथ कैसा व्यवहार किया गया है, दोनों से संबंधित है।”

जयंती नटराजन कांग्रेस की चौथी पीढ़ी की कार्यकर्ता हैं।

मौत से भी परे दुश्मनी

सोनिया की पार्टी के वरिष्ठों पर किस तरह की बर्बर और आक्रामक पकड़ है, इसे जिस तरह से उन्होंने पीवी नरसिम्हा राव के साथ उनकी मौत पर व्यवहार किया, अच्छी तरह दर्शाता है। न तो उन्होंने दिल्ली में राव के अंतिम संस्कार की अनुमति दी, न ही कांग्रेस पार्टी मुख्यालय में उनके शव के प्रवेश की। विरासत में उन्हें जो भी गुणवत्ता प्राप्त हुई, उन्होंने उसे बहुत हल्के में लिया और केवल निजी स्वार्थ के लिए इसका इस्तेमाल किया। विनय सीतापति द्वारा अपनी पुस्तक “हाफ-लायन: हाउ पीवी नरसिम्हा राव ट्रांसफॉर्मेड इंडिया” में पीवी नरसिम्हा राव की मृत्यु के ठीक बाद की घटनाओं के वर्णन से उनके (सोनिया)अहंकारी दिमाग की लघुता को समझा जा सकता है। कुछ अंश:

“गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने राव के सबसे छोटे बेटे प्रभाकर को सुझाव दिया कि हैदराबाद में शव का अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए। लेकिन परिवार ने दिल्ली को प्राथमिकता दी। आखिरकार, राव तीस साल से अधिक समय पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, और तब से कांग्रेस महासचिव, केंद्रीय मंत्री और अंत में प्रधान मंत्री – सब दिल्ली में ही रहकर काम किया था। यह सुनकर सामान्यतः सहज शिवराज पाटिल तिलमिला कर बोले, ‘कोई नहीं आएगा‘।

वाईएस राजशेखर रेड्डी अब तक दिल्ली पहुंच चुके थे। ‘यह हमारी सरकार है, मुझ पर विश्वास करो’, उन्होंने राव के परिवार से कहा। ‘उन्हें हैदराबाद ले जाया जाए। हम वहां उनके लिए एक भव्य स्मारक का निर्माण करेंगे।’ राव की बेटी एस वाणी देवी कहती हैं, ‘वाईएसआर शव को हैदराबाद लाने के लिए परिवार को समझाने में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे।’

परिवार आश्वासन चाहता था कि दिल्ली में राव के लिए एक स्मारक बनाया जाएगा। मौजूद कांग्रेस नेताओं ने हां कहा। लेकिन पार्टी ने उनके रिटायरमेंट में राव के साथ कैसा व्यवहार किया था, इस पर विचार करते हुए परिवार दोगुना सुनिश्चित करना चाहता था। 9.30 बजे वे लोग ऐसे व्यक्ति से मिलने पहुँचे जो राव के अंतिम वर्षों में उनके साथ थे। यानि मनमोहन सिंह, जो अपनी नाइट ड्रेस, सफेद कुर्ता-पायजामा पहने हुए थे, जब राव का परिवार उनसे रेसकोर्स रोड स्थित उनके सरकारी आवास पर मिला था। जब शिवराज पाटिल ने दिल्ली में एक स्मारक की मांग की, तो मनमोहन ने जवाब दिया, ‘कोई बात नहीं, हम करेंगे’। प्रभाकर याद करते हैं, हमें तब भी महसूस हुआ कि सोनिया-जी नहीं चाहती थीं कि पिताजी का अंतिम संस्कार दिल्ली में हो। वह स्मारक नहीं चाहती थीं [दिल्ली में]…. वह उन्हें अखिल भारतीय नेता के रूप में नहीं देखना चाहती थीं … [लेकिन] दबाव था।

‘हमने मान लिया।’

पिछले कांग्रेस अध्यक्षों के शवों को पार्टी मुख्यालय के अंदर ले जाने की प्रथा थी ताकि आम कार्यकर्ता उनके प्रति सम्मान अर्पित कर सकें। ऐसा न होने पर परिवार आश्चर्यचकित था। राव के एक मित्र ने एक वरिष्ठ कांग्रेसी व्यक्ति से शव को अंदर ले जाने की अनुमति देने के लिए कहा। ‘गेट नहीं खुलेगा’, उसने जवाब दिया। ‘यह असत्य था’, मित्र को याद है। ‘जब माधवराव सिंधिया की मृत्यु हुई [कुछ साल पहले] उनके लिए गेट खोला गया था’। मनमोहन सिंह अब अकबर रोड से कुछ ही मिनटों की दूरी पर एक सुरक्षित बंगले में रहते हैं। यह पूछे जाने पर कि राव के शरीर को कांग्रेस मुख्यालय में क्यों नहीं रखा गया था, उन्होंने जवाब दिया कि वह उपस्थित थे, लेकिन उन्हें इस बात का कोई ज्ञान नहीं है। एक और कांग्रेसी अधिक जानकारी देने के लिए तैयार था। “हम उम्मीद कर रहे थे कि गेट खुल जाएगा…..लेकिन कोई आदेश नहीं आया। केवल एक ही व्यक्ति यह आदेश दे सकता था।’

वह कहते हैं, ‘उसने (सोनिया) नहीं दिया।’

यह कहा गया है कि सोनिया और प्रियंका गांधी ने व्यक्त किया कि उन्होंने राजीव गांधी के हत्यारों को माफ कर दिया है और वे हत्यारों की मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदलने के पक्ष में हैं। राजीव के हत्यारों को माफ करने के लिए गांधी परिवार द्वारा दिखाई गई उदारता (जिसे मीडिया ने विस्तार से प्रसारित किया), उनके द्वारा मृत पीवी नरसिम्हा राव के साथ किये गए व्यवहार के विपरीत है (जिसे मीडिया ने इतने वर्षों तक छुपाकर रखा)। यह कई सारे सवाल उठाता है।

लोकशक्ति और वि-उपनिवेशीकरण

आम नागरिक को दिखता है कैसे कांग्रेस पारितंत्र और सोनिया का प्रभाव हमारे राज्य के सभी अंगों के ऊपरी क्षेत्रों तक फैला हुआ है – हाल ही में नेशनल हेराल्ड मामले में कोर्ट द्वारा निचली अदालत के फैसले को पलट दिया गया; सीजेआई ठाकुर ने पीएम मोदी पर कटाक्ष किया और पूर्व सीजेआई आरएम लोधा ने मोदी सरकार के खिलाफ प्रहार किया, लेकिन किसी भी सीजेआई ने सोनिया काल के दौरान एक शब्द नहीं बोला जबकि हमारे सभी संवैधानिक संस्थानों को अवक्रमित किया जा रहा था; यूपीए के गृह मंत्री चिदंबरम द्वारा ‘भगवा आतंक’ नाम के झूठे शब्द का अविष्कार किया गया और राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया गया; 2008 मालेगांव धमाकों के अभियुक्तों के मानवाधिकारों के चरम उल्लंघन के प्रति कांग्रेस शासन की उदासीनता; मीडिया की सोनिया के प्रति छूट; वामपंथी शिक्षाविद जो सोनिया की धुनों पर नाचते हैं जैसा कि अवार्ड-वाॅपसी नाटक में स्पष्ट था- यह सब हमारे प्रतिष्ठानों पर आज तक कायम सोनिया गांधी की मजबूत पकड़ दिखाता है।

सोनिया गांधी की विरासत के सबसे बुरे पहलुओं में से एक वह नुकसान है जो उसने हमारे सार्वजनिक मानसिकता को पहुँचाया है। सोनिया और उनके वंश के नेतृत्व के दौरान इस देश के लोगों के प्रति कांग्रेस का सामान्य रवैया देशवासियों को नीचा दिखाने का रहा है, जैसे मानो कि वह कहना चाहते हों, “तुम एक जातिवादी, अनपढ़ , सामाजिक रूप से पिछड़े, जन्मजात भ्रष्ट लोग हो। हम, कांग्रेस पार्टी, आप पर शासन करके एक एहसान कर रहे हैं… .. हम इस खंडित, विभाजित, अंधविश्वासी देश पर शासन करने के लिए सबसे अच्छा विकल्प हैं।”

यह सोच भारत के प्रति ब्रिटिश औपनिवेशिक रवैये को जारी रखती है। और आश्चर्य की बात नहीं है कि कांग्रेस के इस दृष्टिकोण को भूरे रंग के अंग्रेज़ियत में डूबे हुए साहबों का समर्थन है जो हमारे संस्थानों पर हावी हैं, क्योंकि यह उनके उत्‍तमोत्‍तम पदों और इस देश के भाग्य के मध्यस्थ के रूप में उनकी भूमिका को जारी रखता है।

सोनिया कई मायनों में अब भी देश की सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हैं। आम जनता के पास उसके द्वारा शासित पारितंत्र के विरुद्ध युद्ध में एक शक्तिशाली हथियार है – हमारा मत (वोट)। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सोनिया, उसके राजवंश, उसके बिकाऊ दरबारी, और ‘धर्मनिरपेक्षवादी’ हमारे देश की विधायी बागडोर को नियंत्रित करने के लिए दोबारा लौटकर न आएं। और विधायिका में सोनिया के कांग्रेस पारितंत्र को सत्ता से बाहर रखते हुए, हमें अपने लोकतंत्र के अन्य 3 स्तंभों – मीडिया, न्यायपालिका और कार्यपालिका – का निरंतर पर्दा फर्श करना होगा जहाँ औपनिवेशिक विचारधारा गहरी जड़ें ले चुकी है, और जहाँ कई शक्तिशाली तत्व नेहरू-गाँधी राजवंश का तथा भारत के बारे में उनके विकृत विचार का समर्थन करते हैं।

भारत पर सोनिया के प्रभाव को इस देश के जागरूक, सक्रिय नागरिक द्वारा धीरे-धीरे नष्ट करना होगा। यह लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष है, और हम एक या दो नायकों से इसे करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं – यह हम सबको मिलकर करना होगा।

(यह लेख २०१६ में प्रकाशित एक अँग्रेज़ी लेख का हिंदी अनुवाद है )


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