शबरीमलय मंदिर: निष्ठा और आधुनिक अज्ञानता

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केरल के प्रसिद्ध और देश भर के हिंदूओं के आस्था के केंद्र – शबरीमलय मंदिर पर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी निर्णय दिया और ब्रह्चारी अविवाहित युवा देवरूप अयप्पा स्वामी के गृह मंदिर में युवतियों के अबाध प्रवेश को निरंकुश कर दिया। निर्णय के विरोध में सम्पूर्ण केरल और अन्य प्रांतों में, सहस्रों लाखों आबालवृद्ध नरनारी सर्वजन, इसके विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनों के इस कड़ी के परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या देश भर की आस्थावान हिंदू स्त्रियों को तथाकथित लिंग निरपेक्ष निर्णय का विरोध क्यों करना पड़ रहा है। क्या युवतियों के इस पुरुष ब्रह्मचारी के गृह में निरंकुश प्रवेश पर रोक लगाना समानता के अधिकार का हनन है।

शबरीमलय और एकात्मता

यह ध्यातव्य है कि आधुनिक युग वाले “एकता / समानता” जैसे विचार पश्चिमी ईसाई औद्योगिक क्रांति और प्रौटेस्टेंट मजहबी रिनेजां के वैचारिक निचोड़ हैं। पूर्व में इन देशों में घोर अहंकार, मजहबी फासीवाद, हिंसा, नस्लीय भेद, सामूहिक हत्या, नारी उत्पीड़न, धर्मांधता, दलित उत्पीड़न और वैज्ञानिक विभेद का लम्बा युग रहा है। फलस्वरूप विभिन्न क्रांतियों के द्वारा, इन देशों में नवसंरचना का प्रयास हुआ जिससे इनमें नई स्फूर्ति आई, पर साम्राज्यवाद भी पनपा। भौगोलिक और आर्थिक साम्राज्यवाद के इतर वैचारिक और मजहबी सामंतवाद भी आ गया। “आधुनिक नारी समानता” भी इसी वैचारिक साम्राज्यवाद का ही हिस्सा है जो “भारतीयता” के विचार को आत्मसात करने में नाकाम रहे हैं। आधुनिक “समानता” की व्याख्या के दो पहलू हैं –

1- विचारों और सामाजिक कार्यकलापों की एक कठोर पत्थर की लकीर, जिसमें अन्य पक्ष का कोई स्थान नहीं होता है ।

2- ईसाई पश्चिमी देशों के बर्बर काले इतिहास का बोझ हिंदू भारत पर थोपना और उसका प्रायश्चित्त करना।

क्या किसी अन्य की ऐतिहासिक विसंगति को दूसरा वहन करता है। क्या ईसाई सभ्यता का विचार वांड्मय हिंदुओं को अपनाने के लिये बाध्य किया जा सकता है । पश्चिम ने आज जो स्वरूप अपनाया है, वह वहीं के ईसाई गर्भ से निकला है। तो फिर हिंदू सभ्यता उस विदेशी गर्भ को क्यों माता का स्थान दे। क्या हम स्वत: स्फूर्त चैतन्य नहीं हैं कि आत्मावलोकन करें और स्वयम् के धार्मिक, स्थानिक, ऐतिहासिक पैमानों के प्रयोग से अपने समाज का दिशानिर्देश कर सकें । क्या पश्चिमी कट्टरता और यूनिटेरियन विचारों के सामने हम अपनी विशेषता, आध्यात्मिकता, पौराणिकता और बहुलता को ठोकर मार देंगे। पर अंग्रेज़ों के बनाये उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय हमें उसी ओर ढकेल रहा है।

जहाँ तक शबरीमलय का प्रश्न है, यह एक विशिष्ट मंदिर है, जिसके अपने विशेष प्रावधान हैं। यहां के भक्तों के लिये भी विशेष नियम और विधान हैं। यह मंदिर अयप्पा, जिन्हें धर्मशास्ता भी कहा जाता है, के ब्रह्चारी रूप का गृह है। चूंकी यहां के देव ने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है, यहां पर 10-50 वर्ष वाली स्त्रियों, जिन्हे युवती की श्रेणी में माना गया है, का प्रवेश निषेध है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इस जीवंत ब्रह्चारी के व्रत पर गर्भधारण योग्य जीवंत स्त्रियों को थोपा नहीं जा सकता। हाँ, 10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक महिलायें जो पुत्री और माता की श्रेणी में आती हैं, उनपर कोई रोक नहीं है। अत: यह कहना कि यह व्यवस्था नारी समानता का अतिक्रमण करता है, निराधार है। अन्य अयप्पा मंदिरों में यह प्रतिबंध भी नहीं है, क्योंकी वहाँ पर यह देवता- बालक, गृहस्थ या सन्यासी के रूप मे रहते हैं। ये मंदिर कुलतुपूड़ा, आर्यनकावू और अचनकोविल में स्थित हैं। चतुर्आश्रम व्यवस्था में सिर्फ ब्रह्चर्याश्रम में ही बटुक युवतियों से दूर रहते हैं, दूसरे आश्रमवासी नहीं।

यह हिंदुओं की पुरानी स्थायी सामाजिक व्यवस्था है जिसके मूल में कर्तव्य, ब्रह्चर्य, योग, सामाजिक चरित्र का निर्माण करना ही ध्येय है। हर पुरुष और नारी को विवाह न करना अथवा दूसरे लिंग से दूरी बनाने का अधिकार है, तो ब्रह्चर्य व्रतधारी अयप्पा स्वामी को क्यों नहीं। कई मंदिरों में और कर्मकांडों / रीतियों में पुरुषों का निषेध होता है, तो क्या हिंदू व्यवस्था पुरुषरोधी हो गई? संक्षेप में यह कहना उचित होगा कि शबरीमलय मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर निषेध का तथाकथित नारी समानता के विचार पर कोई कुठाराघात नहीं है। अब क्योंकि इस आयुवर्ग की अधिकांश महिलायें रजस्वला होती हैं, इसे रजोधर्म की “नीचता” और “शुचिता” से भी जोड़ दिया गया है, जो स्वाभाविक रूप से एक साम्यवादी कुत्सित चेष्टा है। रजोधर्म का महत्व सिर्फ इतना है कि वह एक यौवनवती नारी का द्योतक है जिसमें नैसर्गिक सामान्य काम वासना भी होती है। ब्रह्मचर्य के दो विशेष प्रकार हैं – उपकुर्वाण और नैष्ठिक। देवता अयप्पा ने ब्रह्मचर्य के अधिक कठिन – नैष्ठिक रूप का वरण किया है। यज्ञवल्क्य स्मृति (1/50) इस व्रत का निरूपण करती है। यही वसिष्ठ स्मृति में भी इस प्रकार उल्लिखित है:

आहूताध्यायी सर्वभैक्षं निवेद्य तदनुज्ञया भुञ्जीत |

खट्टाशयन दन्तप्रक्शालनाभ्यन्जनवर्जः तिष्ठेत् अहनि रात्रावासीत ||

अयप्पा अपने इस दुरुह वन पर्वत स्थित आश्रम में इस व्रत का पालन स्वत: स्वेच्छा से करना चाहते हैं। इसमें दसों इंद्रियों का निग्रह होना आवश्यक है। युवा स्त्री का सम्भोग, इस ब्रह्मचर्य व्रत काहिस्सा है। क्योंकि मनसा, वाचा, कर्मणा, श्रोतवा तथा दृष्टया सम्भोग का निषेध है, अत: भक्तों और समाज ने भी इस विधान का सरल मन से सदैव पालन किया।

एक और बिंदु जो महत्वपूर्ण है, कि हिंदू मान्यता के अनुसार, मंदिर एक देवस्थान होता है, जहाँ प्राण प्रतिष्ठा के उपरांत जीवंत देवता का विग्रह अपने गृह में रहता है। मंदिर का गृहस्वामी वहाँ का प्रतिष्ठित देवता होता है, जिसके नित्यकर्म यथा निद्रा, जागरण, प्रक्षालन, मंजन, पठन, भोजन – आवश्यकतानुसार होता है। इस स्थिति में अयप्पा मंदिर का स्वामी, भगवान अयप्पा हुए और उनके कक्ष में आना जाना ,उनके व्रत मतानुसार होना चाहिये। एक उदाहरण है देवव्रत भीष्म। क्या न्यायालय या पश्चिमी मान्यता अनुसार, उनको किसी कमनीय नारी के सानिध्य के लिये बाध्य किया जा सकता है¿ क्या किसी नारी को, उसकी इच्छा के विपरीत किसी युवा पुरुष को जाना चाहिये। क्या सहमति का कोई मोल नहीं है। क्या अयप्पा को यह अधिकार नहीं है कि वे अपनी कठोर तंत्र साधना कर सके – राम, कृष्ण और दुर्गा की इस धरा पर। क्या हिंदुओं को अपनी धार्मिक परिपाटी, जिनसे किसी समाज, पुरुष, नारी अथवा प्रकृति पर भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ रहा हो, उनको मानने का अधिकार नहीं रहा।

हिंदुत्व एक ऐसी समावेषी विशाल हृदयी धार्मिकता है जो सहस्रों समूहों को विभिन्नता के साथ आत्मसात करती है। एक सामूहिक अंतरंगता के होते हुये भी अनेक विधाओं को आध्यामिकता का पथ दिखाती है। शबरीमलय का मंदिर उसी हिंदू भक्तिपूर्ण, ज्ञानसाधक मेखला का एक सुंदर रत्न है। पर 1958 में जन्मे सर्वोच्च न्यायालय और उसके पूर्वावतार वाले बरतानियावी चेम्बर और प्रिंसेज़ (1937-1958) के निर्णय ने लाखों वर्षों की स्थापित मर्यादा पर आघात करके, इस समतामूलक रत्न को तेजहीन करने का प्रयास किया है। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न उठता है कि क्या हिंदू अपनी ही धर्म भूमि पर स्वयम् का नियंता है अथवा अन्य विदेशी तत्व हमारे भाग्य और विचार के विधाता होंगे।

(लेखक : शिल्पी तिवारी)

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