झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का महाप्रयाण दिवस- 18 जून 1858

भारत के इतिहास में सन 1857 का बहुत महत्व है, क्योंकि उसी दिन अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ प्रथम संगठित कदम उठाया गया था और लगभग पूरे भारत के राजे रजवाड़े स्वतंत्रता के महासंग्राम में अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए हंसकर निकल पड़े थे।  भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को आए हुए दो सौ वर्षों के करीब का समय हो गया था। व्यापारी बनकर आए अंग्रेज कुटिल चालें चलकर भारत का शासक बन बैठे थे।

भारत की संपदा और समृद्धि देखकर उनकी आँखें चौंधिया गयी थीं और धीरे धीरे उन्होंने अपनी व्यापारिक नीतियों को ऐसा कर लिया था कि राज्यों से उन्हें सैन्य शक्ति प्राप्त होने लगी। अंग्रेजों की नियत अब पूरे भारत पर निष्कंटक राज्य करने की थी और इसके लिए वह हर अनुचित रास्ता अपना रहे थे। हर कीमत पर उन्हें इस धरती का शासन चाहिए था। और ऐसे में उन्होंने जो नीतियाँ बनाईं, उनके कारण व्यापक असंतोष उपजा।

कुछ राज्य अपना अधिकार पाने के लिए जैसे हर कदम उठाने के लिए तैयार थे, फिर चाहे कुछ भी हो। इसमें उन्हें हर कहीं से सहयोग मिल रहा था। और इन राज्यों में सबसे बड़ा केंद्र था झांसी और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं, जिन्होनें यह नारा दिया था कि मैं अपने जीतेजी यह अपनी झांसी नहीं दूंगी।

जन्म, विवाह एवं डलहौजी की राज्य हड़प नीति

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, जिन्हें 1857 की क्रान्ति में सबसे अधिक वीर की संज्ञा दी गयी है, उनका जन्म 19 नवम्बर 1835 को बनारस में एक मराठा ब्राह्मण परिवार  में हुआ था। उनका नाम उनके मातापिता ने मणिकर्णिका रखा। प्यार से सब उन्हें मनु कहा करते थे। फिर वह लोग बिठूर चले गए थे। मनु की माँ की जल्दी मृत्यु होने के कारण मात्र तीन या चार वर्ष में ही वह मातृविहीन हो गईं। परन्तु बिठूर में मनु का पालनपोषण स्नेह से होने लगा। मनु को बचपन में घोड़े चलाने, तलवार बाजी तथा अन्य शिक्षा प्रदान की गई।

वह अत्यंत रूपवती थीं। वह बाजीराव के दत्तक पुत्र नाना साहब और राव साहब के साथ खेलती थीं। उनके मोहक रूप को देखते हुए सब प्यार से उन्हें छबीली भी कहा करते थे। किसी को भी यह नहीं ज्ञात था कि एक दिन यह बच्ची इतिहास के पन्नों पर अमिट पहचान बन जाएगी।  कहते हैं कि एक बार मनु ने हाथी पर चढ़ने का हठ किया और नाना साहब का मन नहीं था, उन्हें अपने साथ बैठाने का। तो उन्होंने कहा “क्या तेरे भाग्य में हाथी बदा है? क्यों निरर्थक हठ करती है?”

मनु ने त्वरित चपलता से उत्तर दिया “मेरे भाग्य में एक छोड़ दस हाथी हैं।” और उनका यह कहना असत्य नहीं था। शीघ्र ही वर्ष 1842 में उनका विवाह झांसी के महाराज श्रीमान गंगाधर राव के साथ पूरी धूमधाम के साथ हुआ।

झांसी उस समय की समृद्ध जागीरों में से एक था। वर्ष 1851 में उनके एक पुत्र हुआ, परन्तु वह तीन माह ही जीवित रह सका। यह दुःख गंगाधर राव के लिए कहर बनकर आया। वह अस्वस्थ रहने लगे थे। उसके उपरान्त उन्होंने एक आनंद राव नामक एक पांच वर्षीय बालक को गोद लिया।

परन्तु उन्हें यह नहीं पता था कि अब उन्हें बच्चा गोद लेने का अधिकार ही नहीं है क्योंकि वर्ष 1848 में लार्ड डलहौजी भारत का गर्वनर जनरल बनकर आया था और उसका एक ही उद्देश्य था कि भारत को किसी प्रकार से अंग्रेजी सरकार के अधीन कर लिया जाए। उसने कई नीतियाँ बनाईं, उसमे सबसे अन्यायपूर्ण नीति थी, राज्य हड़प नीति, क्योंकि यह हिन्दू धार्मिक मान्यताओं का हनन थी। भारत में हमेशा से ही दत्तक पुत्रों की परम्परा रही है। जबकि कंपनी ने पहले यह स्वीकारा था कि वह समस्त हिन्दू मान्यताओं का आदर करेगी और मान्यता प्रदान करेगी। परन्तु इस नीति को लाकर हिन्दू धार्मिक मान्यताओं पर आघात था।

झांसी पर अधिकार और 1857 का संग्राम

गंगाधर राव के असमय निधन के उपरान्त रानी ने कंपनी के पास पत्र भेजा कि उनके दत्तक पुत्र को ही शासक माना जाए, परन्तु दुष्ट डलहौजी ने झांसी के साथ मित्रता पूर्वक सम्बन्धों को भी संज्ञान नहीं लिया और माहौल अपने अनुकूल देखकर राज्य को हड़प लिया।

रानी के सामने जब कंपनी के एजेंट ने यह आदेश सुनाया कि अब कंपनी का अधिकार झांसी पर हो गया है तो, रानी के दुःख और क्रोध का पारावार न रहा और उन्होंने कहा “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी!”

रानी झांसी के किले को छोड़कर महल में रहने लगीं, एवं अवसर की प्रतीक्षा में। और अवसर भी शीघ्र आया। भारत हर प्रकार के अत्याचार से त्रस्त हो गया था। और फिर आया 1857 जब एक सुनियोजित तरीके से संघर्ष हुआ और झांसी पर रानी ने फिर से अधिकार कर लिया उसके उपरान्त उन्होंने अपनी सेना संगठित की और उसके बाद अंग्रेजों की सेना के दांत खट्टे कर दिए।

मार्च 1858 में ह्यूरोज को झांसी पर कब्ज़ा करने के लिए भेजा गया। मगर रानी ने बहादुरी से सामना किया और जब देखा कि अंग्रेजों की सेना उन पर भारी पड़ रही है तो वह वहां से कालपी की ओर भाग निकलीं। फिर जून 1858 में ग्वालियर की ओर गईं, जहाँ पर सैनिकों ने रानी का साथ दिया। और सिंधिया महाराज आगरा पलायन कर गए।

परन्तु यह सफलता क्षणिक थी। दो जून को वह ग्वालियर में दाखिल तो हो गईं परन्तु ह्यूरोज शीघ्र ही अपनी सेना लेकर आ गया और 16 जून को वह अंतिम युद्ध के लिए निकल लीं। 17 जून को ह्यूरोज ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया, परन्तु रानी ने आत्मसमर्पण से इंकार कर दिया और सामना करने का निश्चय किया। परन्तु अंग्रेजों की विशाल सेना के आगे रानी की सेना टिक नहीं पाई और रानी ने अपने प्राणों की आहुति अपनी झांसी के लिए दे दी।  रानी का घोड़ा यदि पुराना होता और अड़ता नहीं तो शायद वह और जीवित रहतीं! पर, संभवतया समय उनके लिए इतना ही था। ह्यूरोज के उन्हें जीवित पकड़ने के सभी मंसूबे विफल हुए और उनके सैनिकों और उस मंदिर के पुरोहित ने उनकी अंतिम इच्छा को पूरा किया कि “मेरा शरीर अंग्रेजों के हाथ में नहीं पड़ना चाहिए!”

18 जून 1858 की वह तिथि थी जब रानी ने अंतिम सांस ली, परन्तु वह आज तक प्रेरणा बनी हुई हैं।

लक्ष्मीबाई भी हर उस वामपंथी मिथक को तोड़ती हैं, जो वह बार बार बनाते हैं कि भारत में स्त्रियों को पढ़ने का अधिकार नहीं था, अस्त्र शस्त्र चलाने का अधिकार नहीं था!


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