एक नए सांस्कृतिक भारत का उदय हो रहा है: संजय बारू

“प्रधानमंत्री मोदी ने एक नए सांस्कृतिक भारत का निर्माण किया है, जो कुलीनता विरोधी है और बौद्धिकता-विरोधी है (एंटी-एलीट और एंटी इंटेलेक्चुअलिजम) और एक ऐसे वर्ग का उदय हो रहा है, जो अब तक स्थापित कुलीनता का विरोध कर रहा है और उसके दिल में पिछले सत्तर वर्षों के मध्य हुए वैचारिक विकास के प्रति आदर नहीं है और यह शायद भारत के लिए उचित है।” यह विचार संजय बारू ने करण थापर को द वायर के लिए दिए गए अपने साक्षात्कार में व्यक्त किये।  यह साक्षात्कार उन्होंने अपनी नई पुस्तक “इंडिया’ज पावर एलीट:क्लास, कास्ट एंड अ कल्चरल रेवोल्यूशन” के परिप्रेक्ष्य में दिया था।

32 मिनट का यह साक्षात्कार बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक ऐसे भारत के उदय के बारे में बात की जा रही है जो उस कथित कुलीन वर्ग का नहीं है, जिसका अब तक भारत की सरकार बनवाने में और चलाने में योगदान रहा करता था। यह दर्द बार बार उभर कर आ रहा है कि जो वर्ग अब उभर रहा है वह देशी भाषा बोलता है या कहें हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषा बोलना पसंद करता है और साथ ही वह उच्च वर्ग का नहीं है। करण थापर यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि मोदी सरकार से पहले जो नेता आदि हुआ करते थे वह जिमखाना क्लब या आईआईसी के सदस्य थे और साथ ही वह उच्च मध्यवर्गीय थे, मगर मोदी के आने के बाद अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जैसे लोग एक बेहद भिन्न वर्ग से आते हैं, यह भिन्न वर्ग क्या है?

तो इसमें संजय बारू कहते हैं कि वह नेता अंग्रेजी बोलने वाले नहीं हैं, वह अंग्रेजी में सोचने वाले नहीं है। इतना ही नहीं संजय बारू कहते हैं कि जो अभी अधिकारी वर्ग है वह भी अधिकाँश हिंदी या देशी भाषाओं में ही बोलने वाला वर्ग है और जो अंग्रेजी में नहीं सोचता।

करण थापर बार बार हिंदी में बोलने वालों के शासन करने को लेकर आहत परिलक्षित होते हैं। उनके भीतर एक पीड़ा उभर कर आ रही है कि कैसे एक वर्ग जो उच्च मध्य वर्गीय नहीं है और जो अंग्रेजी में सोचता नहीं है और जो सामाजिक रूप से पिछड़े समाज से आता है, वह शासन कैसे कर सकता है?  करण थापर देसी कल्चरल रेवोल्यूशन अर्थात देशी सांस्कृतिक क्रांति के विषय में पूछते हैं कि क्या यह भारत के हित में है तो संजय बारू का कहना था कि यह भारत और इंडिया के बीच का संघर्ष है और वह कहते हैं कि इस समय प्रधानमंत्री के कार्यालय में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सैंट स्टीफंस आदि से पढ़ा हुआ हो, सभी वही हिंदी या देसी भाषाओं वाले लोग हैं।

उसके बाद वह कहते हैं कि पूर्व के बौद्धिकों का जो धर्मनिरपेक्ष वाम उदारवादी जीवनदर्शन था, अब उसके स्थान पर हिन्दू राष्ट्रवादी आधारभूत संरचना आ गयी है। जिसके कई परिणामों में से एक है कि जो नया वर्ग उभर कर आया है उसके दिल में उस उदारवादी सोच के लिए कोई मूल्य नहीं है।  इसमें बात करते हुए यह भी बात हुई है कि कैसे जो एक नया वर्ग उभर कर आ रहा है वह हाथ से खाना पसंद करता है और साथ ही वह कांटे और चम्मच का क्या प्रयोग करना है, उसमें फर्क नहीं करना जानता है।  अब ऐसे ही लोगों का स्थान सत्ता में अधिक होता जा रहा है।

यह साक्षात्कार देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे हिंदी और लोक के प्रति एक अतीव घृणा से भरे दो लोग बैठे हैं, और वह यह देखकर अत्यंत क्षोभ में हैं कि भारत में अब हिंदी बोलने वाले लोक से जुड़े लोग शासन में सम्मिलित हो गए हैं।

इतने वर्षों से शासन में न ही हिंदी बोलने वाले और न ही क्षेत्रीय भाषा बोलने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व उतना था कि वह सर्व साधारण की उन अपेक्षाओं को संसद में प्रस्तुत कर सकें, जिनका मत लेकर कुलीन वर्ग सत्ता की सीढियां चढ़ता था। संजय बारू और करण थापर दोनों ही प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को लेकर चकित हैं एवं उसके तमाम कारणों पर बात करते हैं।  जब वह लोकप्रियता पर बात करते हैं तो पाते हैं कि कई कारण हैं जिनके चलते मोदी जी आज सत्ता में हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है कि लोग उनके साथ जुड़ पाते हैं, कनेक्ट कर पाते हैं।

करण थापर ने पूछा कि क्या राहुल गांधी जैसा विकल्प होने के कारण ही मोदी जी सत्ता में है या क्या राहुल गांधी एक मजबूत चुनौती नहीं बन सकते हैं? तो संजय बारू ने राहुल गांधी को ऐसा व्यक्ति बताया जो प्रधानमंत्री मोदी को दूर दूर तक चुनौती नहीं दे सकता है। संजय बारू कहते हैं कि कांग्रेस को दोबारा से खुद को जीवित करना होगा, अब वह कैसे करती है, यह उस पर निर्भर करता है।

यह पूछे जाने पर कि मोदी को कैसे हराया जा सकता है तो संजय बारू का कहना है कि मोदी को हराने के दो ही तरीके हैं या तो विपक्ष से कोई ऐसा नेतृत्व उभर कर आए जो चुनौती दे या फिर आर्थिक स्थिति पूरी तरह से बर्बाद हो जाए। जैसे ही आर्थिक व्यवस्था तबाह होगी वैसे ही वह वर्ग जो अभी मोदी के साथ स्वयं को जोड़ रहा है, वह पूरी तरह से पृथक कर लेगा।

यह भी एक संयोग है कि जब संजय बारू मोदी से मोह भंग के लिए देश की अर्थव्यवस्था का बंटाधार चाह रहे हैं तो वहीं कोविड 19 के कुप्रबंधन के सर्वाधिक मामले कांग्रेस शासित प्रदेशों से आ रहे हैं, क्या यह भारत की अर्थव्यवस्था को ढहाने का षड्यंत्र है?


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