जातीय वैमनस्यता बढ़ानें के लिए हुए सक्रिय

उत्तर प्रदेश के हाथरस में कन्या के साथ घटित दुष्कृत्य की वीभत्स घटना नें सम्पूर्ण देश को गहरा अघात पहुंचाया है | लेकिन हमेश की तरह सुनियोजित तरीके से जिस प्रकार इसे जातीय रंग दिया जा रहा है वो भी कम वेदना पहुंचाने वाला नहीं है | अभी तक अपनों से ही निपटने से जिन्हें फुर्सत नहीं मिल पा रही थी, ऐसा  गाँधी परिवार भी इस बवाल में सक्रिय हो उठा है | लेकिन सारा देश इस बात से भी बेखबर नहीं कि इसी प्रकार की घटना जब किसी गैर हिन्दुओं के हाथों होती है तो यही  लोग कैसे अंजान बने रहते हैं |

दलित-आदिवासीयों का अहित मिशनरीयों [प्रचारकों] के हाथों भी होता रहा है, वो  चाहें तो जूनूल बालबंदी नाम के उस पास्टर को याद कर सकतें हैं, जिसका नाम सन २०१४ में एक दलित महिला के साथ उसके द्वारा महीनों किये गए दुष्कृत्य को लेकर खूब उछला था | उनकी जानकारी के लिए बता दें कि उस पास्टर को पिछले साल  १० वर्ष की सजा न्यायालय द्वारा सुनायी दी  गयी है I [टाइम्स ऑफ़ इंडिया]. 

पिछले वर्ष घटी  झारखण्ड के खूटी जिले की घटना तो और भी दिल दहला देने वाली थी, जिसमें एक एन.जी.ओ. से संबधित दलित आदिवासी महिलाओं का अपहरण कर उनके  साथ छ: युवकों नें बड़ी दरिंदगी के साथ दुष्कृत्य किया था | इस घटना में उक्त युवकों का सहयोग करने  के कारण मिशनरी विद्यालय के फादर अल्फांसो को भी आरोपी बनाया गया था | और फिर जिसको लेकर उनकी गिरफ़्तारी भी हुई थी |

इन फादर और पादरियों के आचरण नें तो चर्च तक को कमजोर और जरूरतमंद महिलाओं के लिए असुरक्षित बना डाला है | केरल प्रान्त के कोट्टयम स्थित मालंकर आर्थोडाक्स चर्च के पांच पादरियों पर चर्च की ही एक महिला कार्यकर्त्ता के साथ दुष्कृत्य का आरोप लगा था | और भारी बवाल मचने पर जिन्हें चर्च प्रशासन  निष्काषित करने पर मजबूर हुआ था | बाद में जब पादरियों को पुलिस  ने अपनी गिरफ्त में लिया, तो कहीं जाकर लोग शांत हुए |

मिशनरीज़ भले ही हिन्दुओं में मौजूद जात-पात का अपने धर्मान्तरण के लक्ष्य को साधने में शोषण करें, पर वे ये भी याद रखना ना भूलें कि ईसाई समाज भी इस व्याधि  से  मुक्त नहीं है |

Tamilnadu Untouchability Eradication Front  [तमिलनाडु अछूत निवारण मोर्चा] की वो रिपोर्ट देखने के काबिल है जो कि २०१८ में प्रकाशित हुई थी | रिपोर्ट बताती है कि दलित इसाईयों के लिए गाँवों में अलग चर्च और कब्रिस्तान  मिलना आम है | गिरजाघर के प्रशासन, पादरी के पद, व्यवसायिक -शैक्षणिक गतिवीधीयों को लेकर वन्नियार और नादार उच्च जाति के लोगों के हांथों दलित भेदभाव से पीड़ित हैं |

कई मामलों में तो उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ता है. कहना पड़ेगा कि कभी  बाबा साहब अम्बेडकर नें ठीक ही कहा था कि- ‘ईसाई हो जाने से भेद प्रिय मनोवृति नष्ट नहीं होगी | जो ईसाई हुए हैं, उनमें ब्राह्मण ईसाई ,मराठा ईसाई, महार, मांग, भंगी ईसाई जैसे भेद कायम हैं  हिन्दू  समाज की तरह ईसाई समाज भी जातिग्रस्त है | जो धर्म देश की प्राचीन संस्कृति को खतरा उत्पन करेगा अथवा अस्पृश्यों को अराष्ट्रीय बनाएगा, ऐसे धर्म को मैं कभी भी स्वीकार नहीं करूँगा | क्यूंकि इस देश के इतिहास में, मैं अपना उल्लेख विध्वंशक के नाते करवाने का इच्छुक नहीं हूँ |’ [डॉ.अम्बेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा; पृष्ठ-२७८]

दलित-समुदाय को आज सबसे बड़ी चुनौती क्रिप्टो-ईसाई या गुप्त ईसाईयों से मिल रही है, और उन्हें खबर भी नहीं है. आन्ध्र प्रदेश में स्थिती सर्वाधिक गंभीर हो चुकी है, और जगन रेड्डी के मुख्यमंत्री रहते इस पर कोई रोक नहीं. इस प्रदेश में इसके खिलाफ सक्रीय एलआरपीएफ [कानूनी अधिकार सरंक्षण मंच/ लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम] के अनुसार ये वो लोग  हैं जो ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद सरकारी अभिलेखों में अभी भी हिन्दू ही बने हुए हैं | और अपने हिन्दू नाम पर पूर्व में जारी अनुसूचित जाति के प्रमाण-पत्र के आधार पर सरकारी लाभ लेते हुए दलितों के हक़ को मारने में लगे हुए हैं |

इसी प्रकार  लव-जिहाद की घटनाएं तो नित्य-दिन का हिस्सा बन चुकी हैं | कर्णाटक के शिवमोगा शहर से लगे सक्रेबैलू की घटना हो, चाहे  बिहार के मोतिहारी जिले की घटना; राँची की जया भंडारी का मामला हो चाहे  पश्चिम  बंगाल के मालडा जिले का सभी में भोली-भाली हिन्दू  कन्याओं को प्रेम -जाल में फंसा कर अपनी हवास का शिकार बनाया गया है |

कितना अच्छा होता  कि इन  मामलों पर भी  प्रियंका वाड्रा और राहुल गाँधी नें गौर करने जरूरत समझी होती, और लोगों को लगता  कि उनकी नज़र में मज़हब का कोई भेद नहीं |


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About the Author

Rajesh Pathak
Writing articles for the last 25 years. Hitvada, Free Press Journal, Organiser, Hans India, Central Chronicle, Uday India, Swadesh, Navbharat and now HinduPost are the news outlets where my articles have been published.