मीडिया का मुंह अरविन्द केजरीवाल की रिश्वत से बंद है

परसों दिल्ली उच्च न्यायालय ने जैसे ही दिल्ली की आम आदमी सरकार की फटकार ऑक्सीजन के मामले पर लगाई, वैसे ही मीडिया, जिस पर हर पंद्रह मिनट में अरविन्द केजरीवाल सरकार का विज्ञापन आता है, वह अरविन्द केजरीवाल को बचाने के लिए आ गयी। और बहुत ही बेशर्मी से अरविन्द केजरीवाल के बचाव में उतर आई। मुख्यधारा के निजी मीडिया चैनलों को इस तरह घिसटते हुए देखना बहुत ही वितृष्णा जगाता है क्योंकि यह लोग अब खुलकर दलाली पर उतर आए हैं।  यद्यपि यह दलाली इनकी पहले से जारी थी, पर यह दलाली पहले कांग्रेस के लिए करते थे, अब यह दलाली बदल कर उन सरकारों के पास चली गयी है, जो अपनी विफलताओं का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ने के लिए तैयार बैठी हैं।

इनमें सबसे ऊपर है केजरीवाल सरकार! अरविन्द केजरीवाल सरकार आज तक गंदी और छिछोरी राजनीति खेल रही है। आज भी वीडियो जारी करके अरविन्द केजरीवाल ने यही झूठ दोहराया कि ऑक्सीजन लाने में केंद्र सरकार मदद करे। और इतना ही नहीं आज जो विज्ञापन दिए हैं, वह तो मीडिया को दी जा रही रिश्वत की पराकाष्ठा है।  कोई भी मीडिया चैनल आज की तारीख में अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ मुंह खोलने से डरता है। यही नहीं दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी की समस्या बताने पर दिल्ली के उप मुख्यमंत्री द्वारा अस्पतालों को यह निर्देश दे दिया गया है कि वह फालतू में शोर न मचाएं।

दिल्ली में ऑक्सीजन की समस्या दरअसल दिल्ली सरकार की अक्षम सरकार द्वारा बनाई गयी समस्या है, जो दिल्ली उच्च न्यायालय में साबित हो गयी है। परन्तु मीडिया को दी गयी रिश्वत के बल पर अरविन्द केजरीवाल आज पूरी तरह से बेशर्मी से सभी उद्योगपतियों से टैंकर्स मांगने का नाटक कर रहे हैं। यह देखना बेहद ही क्षोभपूर्ण है कि जिस काम के लिए सरकारी मशीनरी को लग जाना चाहिए था, उस कार्य के लिए जनता से सहायता माँगी जा रही है।

क्या किसी भी मीडिया चैनल को यह प्रश्न नहीं करना चाहिए था कि ऑक्सीजन की कमी, जो प्रशासनिक अक्षमता के कारण हो रही है, उसका उत्तरदायी कौन है और इसके उत्तर किससे मांगे जाएँ? मगर उन्होंने केवल और केवल केंद्र सरकार को ही इस मामले में घेरा। यहाँ तक कि जिस अस्पताल अर्थात जयपुर गोल्डन अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुईं तो अस्पताल प्रशासन ने केवल और केवल दिल्ली की सरकार को न्यायालय में आरोपी ठहराया था। पर दुर्भाग्य है कि मीडिया इस पर भी नहीं बोला। यहाँ तक कि न्यूज़ 24 पर जयपुर गोल्डन अस्पताल के डॉ। बलुजा ने स्पष्ट तौर पर दिल्ली सरकार को दोषी ठहराया कि मांगे जाने पर भी ऑक्सीजन नहीं दी गयी।

वीडियो में मुख्यधारा की मीडिया की बेशर्म पत्रकारिता कितनी स्पष्ट दिखाई दे रही है जब एंकर बार बार केवल केंद्र सरकार को ही दोषी ठहराने की कोशिश में है। जबकि डॉक्टर बार बार दिल्ली सरकार का नाम ले रहे हैं।  मीडिया ने क्या अपना सारा जमीर उन करोड़ों रूपए के लिए बेच दिया है, जो विज्ञापन के बदले उनके पास आते हैं। एक आरटीआई के अनुसार दिल्ली सरकार ने तीन महीने में डेढ़ सौ करोड़ रूपए विज्ञापनों में खर्च किये हैं। क्या यह वही पैसे हैं, जो पीएम केयर फंड से आठ ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए मिले थे।

जहाँ जनवरी 2021 में 32।52 करोड़ रूपए, फरवरी 2021 में 25।33 करोड़ रूपए तो वहीं सबसे महत्वपूर्ण मार्च के महीने में 92।48 करोड़ रूपए मीडिया में दिए गए। इन आंकड़ों से यह प्रश्न नहीं उठता है कि मार्च में ऐसा क्या हुआ कि इतने पैसे मीडिया में विज्ञापन के लिए क्यों दिये गए? क्या अरविन्द केजरीवाल को यह पता चल गया था कि कोरोना की सुनामी आने वाली है और उसमें वह बुरी तरह से विफल होने जा रहे हैं तो क्या यह पहले से ही रिश्वत दे दी गयी थी कि इस विफलता का ठीकरा उन पर न फोड़ा जाए और सारा का सारा दोष केवल और केवल केंद्र सरकार पर ही थोप दिया जाए।

इसके साथ ही यह भी ध्यान रखा जाए कि जहाँ बार बार दिल्ली सरकार ऑक्सीजन की आपूर्ति का रोना रो रही थी, तो वहीं दिल्ली सरकार को ऑक्सीजन आपूर्ति करने वाली कम्पनी इनोक्स ने एक पत्र भेजकर यह स्पष्टता माँगी थी कि वह बताएं कि कहाँ पर ऑक्सीजन भेजनी है

इस पत्र में स्पष्ट लिखा है कि इनोक्स अनुबंध के अनुसार अनुलग्नक में संलग्न अस्पतालों को ऑक्सीजन की आपूर्ति कर रही है। परन्तु अभी तक उन्हें शेष 28 अस्पतालों के नाम नहीं बताए गए हैं, अत: जितना जल्दी हो सके वह अस्पतालों के नाम बताएं। यह पत्र परसों अर्थात 24 अप्रेल को भेजा गया है।  परन्तु उसमें उससे पहले के दो अन्य पत्रों का भी उल्लेख है, कि कैसे 22 और 23 अप्रेल को पत्र भेजे गए हैं।

परन्तु कोई भी मीडिया हाउस इस विषय में प्रश्न नहीं कर रहा! इन पत्रों के ट्विटर पर होने के बावजूद! क्या यह उन्हीं डेढ़ सौ करोड़ रूपयों की रिश्वत है जिन्होनें हर मीडिया हाउस का मुंह बंद कर रखा है? क्या हमेशा सच की बात करने वाले कुछ टुकड़ों के लिए पागल हो गए हैं कि वह दिल्ली में मरते हुए लोगों के खून से अपने हाथ रंग रहे हैं? क्या उन्हें दिल्ली में यह कुव्यवस्था दिखाई नहीं दे रही है?

इसी के साथ जो मीडिया का काम है, अर्थात खोजबीन करना कि यदि प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार से पैसा मिला तो उसका क्या किया? वह नहीं कर रही है। इतना ही नहीं वह उन आरटीआई के आधार पर भी प्रश्न नहीं कर रही है जो सार्वजनिक पटल पर मौजूद हैं। अर्थात कि कितना पैसा पीएम केयर फंड से मिला और कितना प्रयोग किया गया?

आपात काल में मीडिया का घुटने चलने वाला रूप दिखाई दिया था, तो केजरीवाल सरकार के सामने यह रेंग रहे हैं और वह भी विज्ञापन के लिए, पैसों के लिए मीडिया ने अपना पूरा चरित्र बेच दिया है, फिर चाहे वह रिपब्लिक हो, जी न्यूज़ हो, इंडिया न्यूज़ हो या फिर इंडिया टीवी! एनडीटीवी और आजतक जैसे चैनल तो घोषित हैं ही!  आज जो टैंकर का विज्ञापन हर अख़बार में दिया गया है, वह मीडिया को दी जाने वाली रिश्वत का सबसे घिनौना रूप है, जिसमें दिल्ली में मरने वाले आम नागरिकों का खून लगा है और इसमें वह सभी मीडिया हाउस सम्मिलित हैं, जहाँ जहाँ यह विज्ञापन प्रकाशित हुआ है क्योंकि जिन टैंकर्स के लिए विज्ञापन जारी किया गया है, वह विशेष होते हैं एवं उद्योगपतियों से प्रशासनिक संपर्क के माध्यम से प्राप्त किए जा सकते हैं।

परन्तु दुर्भाग्य यह है कि किसी भी मीडिया हाउस में इतनी रीढ़ नहीं शेष है कि वह इस रिश्वत को पत्रकारिता के मूल्यों से नीचे मानकर इसे लेने से इंकार कर दे! आज का दिन भारत में प्रिंट पत्रकारिता के लिए बेहद शर्म का दिन है, जिसमें वह एक पार्टी की रिश्वत खाकर भरे बाज़ार में नग्न होकर बैठ गयी है! एवं सुदूर गुजरात तक यह विज्ञापन गए हैं, यह किसी एक भाषा की मीडिया की बेशर्मी नहीं है बल्कि हर भाषा की मीडिया का लालच और बेशर्मी है!

(चित्र – newsroompost.com)

इतना ही नहीं, किसी भी मीडिया हाउस ने रीढ़ सीधी रखकर यह नहीं पूछा कि आपदा काल में यह कहकर पैनिक नहीं फैलाई जाती है कि अब केवल दो ही घंटे की ऑक्सीजन शेष है, या दो दिनों की! यह आपराधिक कृत्य है, न जाने कितने लोग भय से मारे गए होंगे, न जाने कितनी कालाबाजारी हो गयी होगी! दुर्भाग्य की बात है कि एक आधिकारिक पद पर बैठे गए व्यक्ति की इस गैर जिम्मेदार हरकत पर मोदी विरोधी अभी अट्टाहास ही कर रहे हैं कि लोग मर रहे हैं तो क्या, मोदी तो बदनाम हो रहा है?


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