कक्षा 12 में इतिहास के नाम पर क्या पढ़ाया जाता है?

पिछले कुछ वर्षों में हमने यह देखा कि स्नातक के और विशेषकर मानविकी, इतिहास, समाजशास्त्र आदि के विद्यार्थी आज़ादी के नाम पर कई देश विरोधी नारे लगा रहे हैं। यह प्रश्न बार बार उठता ही है कि अचानक से ऐसा क्या हुआ कि विद्यार्थी अपने इतिहास से सर्वथा विमुख होकर भारत के ही विरोध में खड़े हो गए हैं? क्या यह समाज की गलती है या फिर परिवार या फिर किसकी? कुछ भी होता है तो हम वामपंथ पर ठीकरा फोड़ देते हैं? या फिर परिवार की गलती बता देते हैं या फिर कह देते हैं कि बच्चे वामपंथ की ओर मुड़ गए। परन्तु इसकी जड़े कहीं पुस्तकों में तो नहीं हैं, जो वह उस उम्र में पढ़ते हैं, जिनमें उनका मस्तिष्क विकसित होता है। आइये कक्षा 12 की इतिहास की एनसीईआरटी की पुस्तक के अध्यायों के कुछ अंशों पर दृष्टि डालकर समझते हैं:

इससे पहले एक और षड्यंत्र को समझना होगा।  भारत में यह कहावत है कि यहाँ पर दो भाषाएँ बोली जाती हैं “एक रामायण की और एक महाभारत की।” अर्थात राम और कृष्ण, इस देश के दो आधार हैं। प्रभु श्री राम को पहले ही विवादास्पद बना दिया है, परन्तु सबसे बड़ा अपराध और षड्यंत्र इनका है महाभारत जैसे महान ग्रन्थ एवं भारत के इतिहास को आम लोगों के घर से बाहर करने का।  यह प्रचारित किया गया कि ग्रन्थ को घर पर रखने से भाइयों में झगड़े हो जाते हैं, तो वहीं चुपके से कक्षा 12 की इतिहास की पुस्तक में इस महायुद्ध को मात्र एक जनपद के लिए लड़ा गया युद्ध बता दिया। जबकि यह युद्ध मात्र और मात्र धर्म की रक्षा और स्थापना के लिए ही लड़ा गया गया था।

कक्षा बारह में इतिहास के सभी अध्यायों को पढ़कर बच्चा पूरी तरह से हिन्दू एवं भारतीय दृष्टिकोण विरोधी हो जाएगा।  और लगभग समस्त संस्कारों के प्रति दुराग्रह विकसित हो जाएगा।  कन्या दान का उचित अर्थ समझे बिना “कन्या की भेंट” के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया गया है। एवं कन्या को वस्तु बना दिया है। जबकि विवाह का स्थान हर हिन्दू ग्रन्थ में कितना उच्च है, यह वेदों और पुराणों में हर स्थान पर लिखा है। यहाँ तक कि मनु स्मृति भी स्त्री अधिकारों की बात करती है।  मजे की बात यह है कि मनुस्मृति में उल्लिखित आठ विवाहों का उल्लेख करते हुए मात्र चार ही विवाहों का ही उल्लेख किया है और दोषों के कारण मनुस्मृति में चार विवाहों को त्याज्य माना गया है।  परन्तु इसे अत्यंत ही चतुराई से ब्राह्मणों के विरुद्ध अर्थात हिन्दू धर्म के विरुद्ध घोषित करते हुए लिखा है कि “दिलचस्प बात यह है कि धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकारों को अपनी स्वीकृति देते हैं। इनमें से पहले चार ‘उत्तम’ माने जाते थे और शेष को निन्दित माना गया। संभव है कि यह विवाह पद्धतियाँ उन लोगों में प्रचलित थीं, जो ब्राह्मणीय नियमों को अस्वीकार करते थे।”

इसी प्रकार वर्ण व्यवस्था को जन्म से प्रमाणित करने का भी कुप्रयास किया गया है।  महाभारत के प्रति यह पूरा अध्याय विष से भरा हुआ है। फिर चाहे एकलव्य वाला प्रकरण हो या फिर द्रौपदी चीर हरण का। क्या विडंबना है कि युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को दाँव पर लगाने को स्त्री अधिकार से जोड़ दिया है,परन्तु कौरव पक्ष द्वारा द्रौपदी अपमान पर वह मौन रहे हैं। चुन चुन कर उन प्रकरणों को उठाया है जिनसे हमारे हिन्दू समाज के प्रति घृणा का विस्तार हो।

यह पुस्तकें कितनी गूढ़ प्रयोजन (एजेंडा) परक हैं इस बात से भी ज्ञात होता है कि महाभारत को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने महाश्वेता देवी की कहानी का उल्लेख किया। यहाँ पर जिस प्रकार से महाश्वेता देवी का परिचय दिया जा रहा है उस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। महाश्वेता देवी का इतिहास हम सभी को ज्ञात है, इस अध्याय में जो कि इतिहास का अध्याय है, उसे एक विशेष विचारधारा की लेखिका की कहानी के साथ प्रस्तुत करने की क्या आवश्यकता थी? और यदि महाभारत को समझने के लिए ही यदि प्रयोग करना था तो श्री नरेंद्र कोहली के महासमर से उल्लेख लिया जा सकता था, जो कि नहीं लिया गया।

लाक्षगृह की कहानी में एक निषाद स्त्री और उसके पांच पुत्रों के जल जाने को लेकर महाश्वेता देवी ने एक लघु कथा लिखी है “कुंती ओ निषादी”।

यह एक पूर्णतया एजेंडा परक कहानी है और जो कुंती को एक स्वार्थी स्त्री के रूप में प्रदर्शित करती है। कहानी का अंत इस प्रकार है कि कुंती अपने अंतिम समय में अग्नि से घिर गयी हैं, तो एक निषादी उन्हें देख रही है। फिर वह निषादी कुंती को कोसती हुई कहती है कि उन्होंने जिस निषादी को जलाकर मार डाला था वह उनकी सास थी और क्या उन्हें ऐसा करते समय लाज न आई!

यदि यह इतिहास की पुस्तक थी तो उसमें एक विशेष विचारधारा की कहानी क्यों सम्मिलित की गयी?  क्या यह एक प्रयास था कि बच्चे अपने असली इतिहास के प्रति घृणा से भर जाएं?

ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं। कक्षा बारह की पुस्तकें इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि इन पुस्तकों को पढने वाले बच्चे ऐसी उम्र में होते हैं, जब उन्हें संक्रमित करना सबसे सरल कृत्य होता है।

हम आने वाले लेखों में पिछली पुस्तकों के ऐसे ही हिस्सों का प्रकाशन करते रहेंगे।


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