मंदिर एवं हिन्दुओं से लेखकों की घृणा का नैरेटिव और उसमें फँसता हिन्दू समाज 

पिछले दिनों हमारे देश में दो ऐसी घटनाएं हुई जिन पर दो भिन्न भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं हमने देखीं। हमारा लेखक जगत वैसे ही एजेंडापरक लिखता है, परन्तु वह धर्म देखकर ही बोsलता है, यह इन दो घटनाओं से हमें दिख जाता है। 

पहले हम चार दिन पहले सुदूर कर्नाटक में घटी घटना पर दृष्टि डालते हैं। एक दलित बच्चे की लाश भाजपा शासित कलबुर्गी में मिली। चूंकि दलित था, तो शोर मचना चाहिए था। और भाजपा को दलित विरोधी घोषित किया जाना चाहिए था। मगर चंद्रशेखर आज़ाद भी उस बच्चे से मिलने नहीं गयी। शायद ट्वीट भी किया हो, ऐसा परिलक्षित नहीं हुआ। 

दरअसल इस घटना पर जय भीम और जय मीम की राजनीति करने वाले और एजेंडा चलाने वाले साहित्यकार इसलिए मौन थे, क्योंकि उसे मारने वाले मज़हब विशेष के थे। वह इसलिए भयभीत हो गए क्योंकि वह केवल और केवल हिन्दू धर्म के विरुद्ध ही बोल सकते हैं।  उन्हें उस बच्चे की क्षतविक्षत लाश नहीं दिखाई दी। उन्हें वह हैवानियत दिखाई नहीं थी। या कहें आँखें मूँद ली। 

बच्चे के मातापिता ने कहा कि इसमें हिन्दू मुसलमान का कोई काम नहीं है और यह दो परिवारों के बीच की बात है, जो कोई भी क़ानून का पालन करने वाला व्यक्ति कहेगा और हिन्दू तो वैसे ही कानून का पालन करने वाले व्यक्ति होते हैं। हिन्दू समूह के रूप में धर्म का पालन करने ही व्यक्ति हैं।

अब आते हैं दूसरे मामले पर, जहाँ पर गाज़ियाबाद में एक मन्दिर में एक चौदह साल का लड़का प्रवेश करता है, अन्दर जाता है और फिर पकड़ा जाता है। उसका नाम पूछकर उसे मारा जाता है। यह हो सकता है कि वह चोरी ही करने आया हो जैसा पंडित जी कह रहे हैं। वह संभवतया ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि क्योंकि वहां पर अतीत में ऐसा होता रहा है और ऐसे बच्चे चोरी करने के लिए आते रहे हों। यह भी एक संभावना है। परन्तु फिर भी हाथ उठाने का या क़ानून हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है। यह हमें ध्यान में रखना होगा। और जब कोई हाथ उठाता है तो स्वाभाविक है कि आम जन उसके विरुद्ध हो जाते हैं और न्याय के पक्ष में वह कहीं न कहीं नीचे आ जाता है।

हम सभी निर्दोष व्यक्ति के प्रति अन्याय से दुखी हो जाते हैं और जो स्वाभाविक है, क्योंकि हिन्दू मूलत: अच्छे लोग होते हैं। हिन्दू किसी को मारने के लिए बल्कि आत्मरक्षा में अस्त्र उठाते हैं, एवं अंतिम विकल्प के रूप में। और वह भी कम उम्र के व्यक्ति पर हाथ उठाने से और भी अधिक बचते हैं। परन्तु यहाँ पर मंदिर में उस लड़के की पिटाई की गयी। और इसने हर संवेदनशील व्यक्ति को दुखी कर दिया।  क्योंकि कहीं न कहीं सभी को लगा कि एक प्यासे बच्चे को मारा गया। 

यह जो मारना है, उसने सारा नैरेटिव खड़ा किया। हो सकता है उस लड़के ने अपनी जान बचाने के लिए झूठ बोल दिया हो, पर उसे हिन्दुओं के विरुद्ध कैसे प्रयोग करना है यह हर देश तोड़ने वाली शक्ति को पता है। यह वही लोग हैं, जो शाहीन बाग़ में मुस्लिमों के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाते है और अभी वह किसानों के कंधे पर बन्दूक चला रहे हैं। धीरे धीरे वह बैंक कर्मियों और उसके बाद अन्य असंतुष्ट समूह के कंधे पर रखकर बन्दूक चलाएंगे। 

देश तोड़क उन्हीं शक्तियों ने यह अपने लेखों और अपने पोर्टल पर उस किशोर लड़के को बच्चा कहा और बच्चा कहकर संवेदना को उन हिन्दुओं के विरुद्ध प्रयोग किया, जो प्रकृति के हर रूप का आदर करते हैं। जिनके खाने से गाय और कुत्ते तक की रोटी निकलती है, और जो चींटी तक को चीनी खिलाते हैं, उन हिन्दुओं को आम मुसलमान ने नहीं बल्कि उन लोगों ने संवेदनहीन और क्रूर घोषित कर दिया, जो बेचारे इतने वर्षों से क्रूरता का शिकार स्वयं है।  

इस घटना के विरोध में जब मंदिर प्रशासन से उत्तर आया तब तक यह नैरेटिव स्थापित हो चुका था कि उसे पानी के कारण मारा गया। यद्यपि मंदिर प्रशासन की चिंताएं सम्पूर्ण हिन्दू समाज की चिंताएं हैं, परन्तु जब उसे पकड़ा तो उसे संवैधानिक दायरे में ही दोषी या निर्दोष साबित करना चाहिए था, जिससे नैरेटिव बनाने वाले अपना घृणित नैरेटिव न बना पाएं, क्योंकि वह ऐसे ही मौकों की प्रतीक्षा में रहते हैं। 

जम्मू का कठुआ वाला काण्ड हम सभी की स्मृति में होगा ही। उसमे बलात्कार की बात नीचे चली गयी थी और रह गया था तो केवल मंदिर के पुजारी द्वारा कथित रूप से किया गया बलात्कार। आज तक उस नैरेटिव से हम लोग बाहर नहीं आ पाए हैं।  मंदिरों को और विशेषकर हिन्दुओं को अब इस नैरेटिव युद्ध में यह निर्धारित करना है कि हम कहाँ खड़े हैं? हमें कहाँ जाना है? क्या हमें उनके द्वारा दिए गए (नैरेटिव बनाने वालों) प्रश्नों पर उछलना है या स्वयं के प्रश्न बनाने हैं?  

क्योंकि यह मंदिर के बाहर के चित्र से स्पष्ट है कि बाहर ही नल लगा है तो वह पानी पीने के लिए अन्दर क्यों गया? यह एक बेहद ही सामान्य प्रश्न है, इसे समझा जाना चाहिए।  यह पूरा नैरेटिव हिन्दू संतों, हिन्दू मंदिरों और हिन्दुओं को जालिम साबित करने का है, उनकी विश्वसनीयता समाप्त करने का है, जिससे जब पालघर जैसी कोई घटना हो तो लोग कहें “यह लोग इसी लायक थे ऐसा ही होना चाहिए था।” 

उस लड़के की पिटाई ने उसे पीड़ित बना दिया और जो वाकई में पीड़ित है अर्थात वह मंदिर उसे उत्पीड़क बना दिया और अब सारा नैरेटिव हिन्दुओं के विरुद्ध है।  क्या हम अपनी लड़ाई लड़ पाएंगे? यह भी एक प्रश्न है क्योंकि धीरे धीरे पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से भी यह नैरेटिव बना ही दिया गया है कि मुगल तो मंदिरों के प्रति सहिष्णु थे और उन्होंने युद्ध में नष्ट हुए मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। 

हम आज तक इसका तोड़ नहीं खोज पाए हैं और अब यह? यह तो अभी और लम्बा जाएगा और हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा कि ऐसी और भी घटनाएं हमारे कानों में पड़ें। ऐसे में हिन्दू क्या करे?  हिन्दुओं की लड़ाई आम मुसलमानों से नहीं है, वह तो प्यादा है। वह तो मोहरा है, सीएए के दंगों में जिन्होनें आग लगाई वह दूसरी जगह आग लगा रहे हैं, पर हाँ आम मुसलमान मारा गया। इसलिए हिन्दुओं को नैरेटिव युद्ध में जीतने की आवश्यता है न कि क्षणिक उन्माद में आकर अपने ही विरुद्ध एक नया नैरेटिव बनाकर उसमें फंसने की।

ऐसे ही एक बोर्ड बाहर लगा हुआ है कि मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है। यद्यपि यह प्रशासन के परामर्श के बाद ही लगवाया गया होगा, फिर भी यह कहीं न कहीं हिन्दुओं के विरोध में गया।  उन्होंने कहा कि यह निर्णय प्रशासन के साथ वार्ता के बाद लिया गया था क्योंकि 95% जनसँख्या ने देवी मंदिर के भक्तों का जीना मुश्किल कर दिया था।  मंदिर में सामने ही शिव लिंग है। उस शिव लिंग की ओर इशारा कर उन्होंने कहा कि इसी शिव लिंग पर उन्होंने ऐसे ही बच्चों को गंदे कार्य करते हुए पकड़ा है।

पत्रकार ने जब उनसे पूछा कि कैसे गंदे कार्य तो उन्होंने बताया कि “जैसे मूत्र करना, थूकना, बकरियों से वहां पर मल करवाना आदि। उन्होंने कहा कि इन्हीं लोगों के चक्कर में मंदिर प्रशासन को गेट लगवाना पड़ा और यह बोर्ड भी लगवाना पड़ा कि यहाँ पर मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है।”

उक्त वीडियो में पुजारी की पीड़ा स्पष्ट परिलक्षित होती है। क्या हमारे लेखक वर्ग को वहां एक बार जाना नहीं चाहिए था? हर मंदिर के अपने नियम होते हैं। परन्तु यह भी विडंबना है कि भारत में बहुसंख्यक वर्ग को कानूनों के माध्यम से हाथ बाँध दिए हैं, विशेषकर धार्मिक विश्वासों के मामले में।

हालांकि बाद में पुजारी ने यह भी कहा कि उन्होंने कभी भी उन मुसलमानों को मंदिर आने से नहीं रोका है, जो तालाब के पानी से चर्म रोग ठीक करने आते हैं, जैसे मान्यता है, पर यह बात सामने नहीं आएगी क्योंकि नैरेटिव बनने लगा है कि हिन्दुओं के मंदिरों में मुसलमानों को पानी नहीं दिया जाता।

यद्यपि इस सन्दर्भ में स्वामी यति सरस्वती जी ने भी अपना पक्ष रखा है, और वह भी क्विंट के माध्यम से, तो ऐसे में दोनों को सुना जाना चाहिए था, किसी भी नैरेटिव से पहले। पर आंसू सबसे बड़ा हथियार होते हैं और वह पहले ही एक नैरेटिव बना चुके थे। 

यहाँ पर एक प्रश्न यही उठता है कि हम कैसे इस नैरेटिव युद्ध से जीतें? कैसे मंदिर से घृणा करने वाले लेखक वर्ग का सामना करें?  कैसे अपने मंदिरों को सुरक्षित करें?  संवैधानिक दायरे में रहकर ही हर कदम उठाये जाने की आवश्यकता है, हमें आत्मनिर्णय के अधिकार की माँग करनी चाहिए, अभियान चलाना चाहिए कि हमारे मंदिरों में हमें निर्णय लेने का अधिकार दिया जाए और न्यायालय एवं प्रशासन का हस्तक्षेप हमारे मंदिरों में न्यूनतम हो, जिससे दीपावली की रात में स्वामी शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को पुलिस झूठे आरोप में लेकर न जाए।

हमारा संघर्ष हर नैरेटिव के विरुद्ध तभी होगा और हम तभी जीत पाएंगे जब उनके नैरेटिव में न फंसकर अपना खुद का नैरेटिव बनाकर प्रस्तुत करेंगे। 


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