यामी गौतम के विवाह के चित्र के बहाने हिन्दू फोबिया

अभिनेत्री यामी गौतम ने अपनी शादी की तस्वीरें इन्स्टाग्राम पर पोस्ट की।  शादी के लाल जोड़े में वह अत्यंत सुन्दर लग रही थीं। परन्तु यामी गौतम की सबसे आकर्षक तस्वीरें थी, शेष रस्मों की। जिसमें वह सहज एवं स्वाभाविक दिख रही थीं। जैसी कोई भी हिन्दू दुल्हन लगती है। बेहद आम, बेहद सहज और उन्होंने वह तस्वीरें इन्स्टाग्राम पर साझा कीं। उनके प्रशंसकों ने उनके इस सहज लुक की प्रशंसा की तो वहीं, कुछ लोग ऐसे थे जो हिन्दुओं के प्रति इस हद तक नफरत से भरे होते हैं कि वह एक सहज तस्वीर की प्रशंसा नहीं कर पाते।

विक्रांत मेस्सी, जो ईसाई धर्म से हैं, शायद उनके साथ काम किया हो और अभिनेता हैं, उन्होंने यामी गौतम के इस लुक पर लिखा “प्योर एंड पायस, लाइक राधे माँ?”

हर कोई जानता है कि राधे माँ कौन है? राधे माँ पर विश्वास करने वाले कितने लोग होंगे? एक स्वघोषित साध्वी जिनके कार्यकलापों से हिन्दू समाज सहमत नहीं है, फिर भी राधे माँ पर टिप्पणी करने का अधिकार केवल और केवल हिन्दू समाज है।

एक ऐसे उद्योग का कोई व्यक्ति जिसका मूल चरित्र ही हिन्दू विरोधी है, वह आराम से एक होने वाली दुल्हन पर ऐसी टिप्पणी कर जाएगा, क्योंकि उनके लिए हिन्दू रीतिरिवाजों का उपहास उड़ाना बहुत आम है। आखिर वह कैसी मानसिकता है जो किसी स्त्री के सबसे सुन्दर रूप पर ऐसी अपमानजनक टिप्पणी कर सकती है? अपमानजनक इसलिए क्योंकि राधे माँ की छवि धार्मिक हिन्दू समाज में कैसी है, यह सब जानते ही हैं।

दरअसल मीडिया और मनोरंजन उद्योग में हिन्दू फोबिया इस लिए अधिक है क्योंकि हिन्दुओं के खिलाफ बोलकर आप सेक्युलर और प्रोग्रेसिव कहलाते हैं तो वहीं विक्रांत मेसी जैसे लोग अपने रिलिजन के चर्चों में होने वाले घोटालों पर बात नहीं करते।

अभी हाल ही में केरल में सिस्टर अभया के बलात्कार वाले मामले में निर्णय आया था और उसमें चर्च के ही एक पादरी और एक नन को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। और पाठकों को यह स्मरण करना होगा कि यह निर्णय एक दो नहीं बल्कि पूरे 28 वर्षों बाद आया था। जिसमें पादरी को बचाने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया गया था। विक्रांत मेसी जैसे लोग जो हिन्दू धर्म की दुल्हन पर ऐसी टिप्पणी करते हैं, क्या वह किसी बलात्कारी के लिए यह टिप्पणी कर सकते हैं कि यह उस चर्च के पादरी जैसा है!

या फिर फ्रैंको मुलक्कल जैसा ही बोल सकेंगे? नहीं वह नहीं बोल सकेंगे? क्योंकि उनकी नजर वहां तक जाती ही नहीं है! यह लोग अपने चर्चों में होने वाले यौन शोषण तक पर मुंह सी लेते हैं। सिस्टर अभया तो चलिए पुराना मामला है, पर फ्रैंको मुलक्क्ल?

पाठकों को याद होगा कि कैसे यौन शोषण के आरोपी फ्रैंको मुलक्क्ल के खिलाफ आवाज़ उठाने पर चार नन को कान्वेंट से ही निकाल दिया गया था।  सिस्टर अभया का मामला तो बहुत पुराना है मगर यह तो कुछ ही वर्ष पुराना मामला है। जब केरल की ही एक नन ने रोमन कैथोलिक चर्च के बिशप फ्रैंको मुलक्क्ल पर वर्ष 2014 से 2016 के बीच दुष्कर्म का आरोप लगाया था।

https://www.amarujala.com/india-news/nuns-opposing-bishop-franco-mulakkal-removed-from-the-convent

प्रश्न यह है कि हिन्दू स्त्री के इतने पवित्र रूप को मात्र लाल वस्त्रों के कारण राधे माँ कहकर अपमानित करने वाले विक्रांत मेसी को इतना दृष्टिभ्रम क्यों है? जैसे लाल रंग के कारण राधे माँ आपको नज़र आईं क्या वैसे ही सफ़ेद वस्त्रों के चोगे में आपको फ्रैंको मुलक्क्ल नज़र आएँगे?

शायद नहीं! क्योंकि आपका एकतरफा सेक्युलरिज्म केवल हिन्दुओं पर ही प्रश्न उठाने, हिन्दुओं को अपमानित करने की स्वतंत्रता देता है। शेष आप सब पीछे हट जाते हैं, दरअसल आप जैसे लोग डरपोक हैं, कुंठित हैं और समय समय पर अपनी कुंठा हिन्दू धर्म पर निकालते रहते हैं।

यामी गौतम की इस प्यारी तस्वीर पर इतनी अपमानजनक टिप्पणी के विरोध में कंगना रनावत हालांकि सामने आईं और उन्होंने कहा कि “यह कॉकरोच कहाँ से निकला, मेरी चप्पल लाओ”

अब उन्होंने यह मज़ाक में लिखा या वाकई गुस्सा आया, यह नहीं पता चल पाया है। पर विक्रांत मैसी के इस कमेन्ट से यह तो पता चल जाता है कि मनोरंजन उद्योग में हिन्दू फोबिया और हिन्दुओं के प्रति घृणा कितनी गहरी धंसी हुई है, परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि वह अपने मजहब या रिलिजन को बदनाम करने वालों की ओर नहीं देखते हैं और यही कारण है कि आवाज़ न उठने के कारण फ्रैंको जैसे लोग और शक्तिशाली होते जा रहे हैं और सिस्टर अभया को अपनी मृत्यु के 28 वर्षों बाद न्याय मिल पाता है!


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