क्या अगली पीढ़ी आते आते केरल में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे?

हाल के वर्षों में केरल एक इस्लामी प्रयोगशाला के रूप में उभरा है जहां इस्लाम की जीत हासिल करने के लिए विभिन्न प्रतिमानों (मॉडलों) का परीक्षण किया गया है। इनकी सफलता इस्लामवादियों के सपनों से भी बढ़ कर है, लेकिन यह केरल के हिंदुओं के लिए खतरा है। हम इस लेख में दो ऐसे प्रतिमानों के बारे में बात करते हैं जिन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि इस्लामवादी केरल में अगले बीस से तीस वर्षों के भीतर जनसांख्यिकीय प्रभुत्व प्राप्त कर लेंगे ।

अंतर धार्मिक अदालती विवाह

1954 का विशेष विवाह अधिनियम मूल रूप से भारत में बिना किसी संस्कार या समारोह के अंतर्धामिक विवाह की अनुमति देता है। दूल्हा और दुल्हन एक निर्दिष्ट प्रपत्र (इंटेंडेड मैरिज का नोटिस) भरते हैं और स्थानीय मैरिज रजिस्ट्रार के पास फाइल करते हैं। केरल में, रजिस्ट्रार तब नोटिस के रूप में उसी को ऑनलाइन प्रकाशित करता है। यह जनता को बताने के लिए है, और यदि कोई आपत्तियां हैं (जैसे पहले से शादीशुदा हिंदू पुरुष की पत्नी) तो वे अपनी असहमति प्रकट कर सकते हैं। यदि तीस दिनों के भीतर कोई आपत्ति नहीं उठाई जाती है तो रजिस्ट्रार तीन गवाहों की उपस्थिति में विवाह को कानूनी रूप से वैध घोषित कर देता है।

सहमति की आयु (दूल्हे का 21 वर्ष और दुल्हन के गैर मुस्लिम होने की स्थिति में 18 वर्ष), मानसिक क्षमता, निषिद्ध संबंध (जैसे बेटी से शादी करनेवाले पिता) आदि की कुछ शर्ते रजिस्ट्रार द्वारा सत्यापित की जाती हैं। इसे भारत में रजिस्टर विवाह या कोर्ट मैरिज के रूप में जाना जाता है।

24 जुलाई को केरल के मंत्री जी सुधाकरण का कार्यालय, जो पंजीकरण संविभाग भी देखता है, ने एक नोटिस जारी किया। इसमें उल्लेख किया गया कि “नोटिस ऑफ मैरिजस”, जो विभाग की वेबसाइट पर ऑनलाइन तीस दिनों के लिए प्रकाशित किया जाता था, अब अपलोड नहीं किया जाएगा। आगे से सभी नोटिस की हार्ड कॉपी, प्रत्येक रजिस्ट्रार के कार्यालय में लगे नोटिस बोर्ड पर चिपकाए जाएंगे।

यह आदेश ऐसे समय में आया है जब डिजिटल इंडिया पूरे जोरों पर है, और सभी सरकारी कामों के लिए जनता को ऑनलाइन जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह भी ध्यान रखने की बात है, कि यह कोविड-19 का समय है, और लोग रजिस्ट्रार के कार्यालयों जैसी भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से परहेज करते हैं। स्पष्ट रूप से सरकार कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वास्तव में क्या छुपा रही है?

Kerala registration order

यह आदेश केरल के हिंदुओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा

इस नोटिस के लिए सरकार द्वारा दिया गया कारण यह है कि ऑनलाइन नोटिस डाउनलोड किए जा रहे थे और विवरण का उपयोग ‘सांप्रदायिक प्रचार’ के लिए, और आवेदकों को धमकी देने के लिए किया जा रहा था। इसमें कहा गया है कि यह संबंधित आवेदकों की गोपनीयता पर भी हमला था।

आवेदनों के अध्ययन से वास्तविक कारण को सामने लाया गया। अब तक उपलब्ध अधिकांश नोटिस (इस महीने में दाखिल) में एक परिचित प्रतिरूप दिखाई दिया। लड़कियां 18 से 25 आयु वर्ग में थी और उनमें से लगभग सभी हिंदू और कुछ इसाई थीं। दूल्हे सभी मुस्लिम थे और या तो निर्माण श्रमिक या किसान थे। अनपढ़ और आर्थिक रुप से गरीब मुसलमानों को हिंदू लड़कियों को लुभाने के लिए समय और संसाधन कैसे मिले, यह एक और दिलचस्प कहानी है।

कथित रूप से बेरोजगार मुस्लिम युवाओं को संगठित इस्लाम वादियों द्वारा चिन्हित किया जा रहा है और प्यार के बहाने हिंदू लड़कियों को धर्मांतरित करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। जाहिर है, दूल्हे को इस के लिए वित्तीय इनाम भी प्रदान किया जाता है। इसका न केवल हिंदुत्ववादियों, बल्कि केरल में ईसाई चर्च द्वारा भी दावा किया गया है, और यहां तक कि उच्च न्यायालय द्वारा भी स्वीकार किया गया है।

कुछ अतिशय मामलों में, कट्टरपंथी नए धर्मांतरित तो आईएसआईएस (ISIS) जैसे आतंकवादी समूहों में शामिल होने लगे हैं। केरल के कट्टरपंथियों के स्तर के बारे में हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद पर रिपोर्ट से पता चला है कि भारत में आइएसआइएस की स्थानीय शाखा, इस्लामिक स्टेट (हिंद विलायह) के केरल और कर्नाटक में 180 से 200 सदस्य हैं।

पहले भी ऐसी खबरें आईं थीं, कि केरल के कई ऐसे भर्ती, इराक और अफगानिस्तान में आईएसआईएस के लिए लड़ते हुए मारे गए थे और इनमें शामिल होने वाली कई महिलाएं इस्लाम में नई-नई धर्मांतरित हुई थीं।

इस पद्धति के माध्यम से केरल में धर्मांतरण अभूतपूर्व पैमाने पर हो रहा है। केरल सरकार का यह आदेश, वास्तव में तथ्यों को छिपाने और  इस तरह के धर्मांतरण को गोपनीय रखने के लिए है। यह एक अत्यंत गंभीर सामाजिक मुद्दे पर प्रकाश डालता है। क्या मुस्लिम गिरोह हिंदू लड़कियों की ग्रूमिंग (यौन शोषण तथा धर्मांतरण के लिए रिझाना) कर रहे हैं? अगर ऐसा नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण कैसे संभव है कि शायद ही कोई हिंदू लड़के मुस्लिम लड़कियों से शादी कर रहे हैं। स्पष्ट रूप से यह हिंदू लड़कियों को इस्लाम की ओर एकतरफ़ा मार्ग पर ले जाने के लिए एक संगठित गतिविधि है।

मुस्लिम जनसंख्या विस्फोट

1901 में केरल में मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी 17.3% थी जो 2011 तक 26.3% तक पहुंच गई। इसी अवधि के दौरान हिंदू 68.9% से घटकर 54.7% हो गए। 2015 में हिंदुओं की जन्म दर सभी जन्मों का 42.87% थी, जबकि मुस्लिमों की हिस्सेदारी 41.45% थी ।अगले वर्ष 2016 में मुस्लिम महिलाओं और हिंदू महिलाओं द्वारा जन्म की संख्या क्रमशः 211,182 और 207,831 थी।

2019 में सभी नवजात शिशुओं में मुस्लिम 43% थे और हिंदू 41.71%थे। अगर हम बच्चे पैदा करने की दर (टोटल फर्टिलिटी रेट, TFR)  के बारे में बात करते हैं, यानी 15 से 49 साल की उम्र के बीच एक महिला के कुल बच्चे होने की औसतन संख्या, तो हिंदू टीएफआर 1.3 है जबकि केरल में मुस्लिम टीएफआर 2.8 है। औसतन, केरल की हिंदू महिला की तुलना में एक केरल मुस्लिम महिला के दोगुने बच्चे हैं। कृपया ध्यान दें कि इसमें 15 वर्ष से कम उम्र और 49 वर्ष से अधिक की महिलाएं शामिल नहीं हैं । भारत के मुसलमानों में बाल विवाह गैरकानूनी नहीं है, और इन दोनों आयु समूह में इनमें बच्चे पैदा होते हैं।

जाहिर है, अगले 20 वर्षों के भीतर युवा पीढ़ी में मुस्लिम हिंदू आबादी को आसानी से पार कर लेंगे। अगले बीस वर्ष में वे शायद बहुमत में होंगे। टीएफआर में अंतर इसको एक अनवरत वास्तविकता बनाता है। क्या “भगवान का अपना देश” यानि केरल, कश्मीर का एक और संस्करण बन जाएगा जिसे शायद “अल्लाह का देश” कहा जाएगा? और यहां हमने उन ईसाइयों के प्रतिशत पर विचार भी नहीं किया है, जो 2011 की जनगणना के अनुसार केरल में कुल जनसंख्या का 18.38% थे।

अब यह केवल केरल तक ही सीमित नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की प्रजनन दर हिंदुओं की तुलना में 25% अधिक है।विश्व स्तर पर दुनिया में मोहम्मद अब सबसे लोकप्रिय शिशु नामों में से एक है, यहां तक कि अमेरिका और ब्रिटेन में भी। लेकिन केरल में हिंदू अब अल्पसंख्यक होने की कगार पर हैं।

केरल सरकार का रवैया

इस धर्मांतरण के प्रति केरल सरकार का रवैया कम्युनिस्टों का प्ररूपी है। पंजीकरण मंत्री सुधाकरण एक नास्तिक हैं और हिंदूओं का अपमान करने का उनका इतिहास है। उन्हें सार्वजनिक रूप से मंदिर के तंत्रियों का अपमान करते हुए देखा गया है और ये पूछते सुना गया है कि वे (तंत्री) मंदिर में खुली छाती और बिना अधोवस्त्र (अंडरवियर) के धोती पहने क्यों आ जाते हैं।  उन्होंने कैसे इस बात की जांच की कि तंत्रियों ने अधोवस्त्र पहना है या नहीं, यह अभी भी अनुत्तरित है!

इससे पहले जब कम्युनिस्टों ने अनैतिक मुस्लिम महिलाओं को सबरीमाला मंदिर भेजने की कोशिश की थी तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तंत्री ने कहा था कि अगर इस तरह के उल्लंघन होते हैं तो वह मंदिर को बंद कर देंगे । सीपीएम सरकार ने पॉस्को मामले में वर्तमान में जेल में बंद कुख्यात कार्यकर्ता रेहाना फातिमा को अपनी पुलिस सुरक्षा देकर वहां भेजने की कोशिश की थी।

उस समय सुधाकरण ने यह कहकर तंत्री का सार्वजनिक रूप से अपमान किया कि तंत्री को श्री अय्यप्पा के प्रति कोई स्नेह या भक्ति नहीं थी। उन्होंने कहा कि गधे मंदिर तक सामान ले जाने का काम अधिक अनुग्रह के साथ करते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि तंत्री में न अनुग्रह है ना ही वह उपयोगी है।

निष्कर्ष

इतिहास ने हमें सिखाया है कि उन जगहों पर क्या हुआ है जहां हिंदूओं की आबादी घट गई है। अफगानिस्तान में यह सदियों से घटती रही और आज की तारीख में वहां एक भी हिंदू नहीं। पाकिस्तान में हिंदू नरसंहार जारी है। कश्मीर में, कश्मीरी हिंदुओं का कुख्यात पलायन एक हालिया स्मृति है। केरल में सौ साल पहले के मप्पिला दंगों में नरसंहार और हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन शामिल था।

क्या केरल के हिंदूओं को, कश्मीर के हिंदुओं की तरह शरणार्थियों के रूप में रहने के लिए, केरल से बाहर निकाल दिया जाएगा? इसका उत्तर इस बात से निर्धारित होगा कि आज हम एक समाज के रूप में क्या कर रहे हैं।

(रागिनी विवेक कुमार द्वारा इस अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद)


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