इमरान खान का वक्तव्य और प्रगतिशील चुप्पी

प्राय: हमारे प्रधानमंत्री या भाजपा के नेता अपनी चुनावी रैलियों में यह घोषणा करते रहते हैं कि हमारे हारने पर पाकिस्तान में खुशियाँ मनायी जाएँगी, परन्तु पाकिस्तान में जब इमरान खान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तो उन दिनों प्रगतिशील लेखकों और लेखिकाओं की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा था। और हर कोई खुशी से नृत्य सा करने लगा था। कुछ प्रगतिशील हिंदी लेखिकाओं का मन मयूर हो गया था।  तथा कई निष्पक्ष पत्रकार यह भी कल्पना करने लगे थे कि काश उनके भी प्रधानमंत्री इतने हैंडसम होते।

इन प्रगतिशील लेखकों को जहाँ अपने प्रधानमंत्री में एक भी अच्छाई नहीं दिखाई दी थी तो वहीं इमरान खान के गद्दी पर बैठते ही यहाँ का वर्ग विशेष इमरान खान की प्रशंसा से अपनी अपनी सोशल मीडिया वाल रंग चुका था।

इतना ही नहीं जब अभिनंदन को भारत सरकार की कूटनीति एवं अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते पाकिस्तान ने अपने कब्ज़े से रिहा किया था तो कई प्रगतिशील लेखिकाओं का प्रेम उमड़ उमड़ कर इमरान खान पर आ रहा था। उनकी वाल पर यही संकेत था कि हमारे प्रधानमंत्री तो घृणा फैला रहे हैं तो वहीं इमरान खान अपने कब्ज़े में आए हमारे अभिनंदन को रिहा कर रहे हैं।

आप सभी को निष्पक्ष पत्रकार बरखा दत्त का वह अतिरिक्त उत्साह भी याद ही होगा जो इमरान खान के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री होने पर उपजा था। इतना ही नहीं कई अवसर पर इन्हीं पत्रकारों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पिछड़ा, साम्प्रदायिक आदि घोषित करने में देर नहीं की थी। अभिनंदन के रिहा होने पर शोभा डे, सागरिका घोष, राजदीप सरदेसाई, सुधीन्द्र कुलकर्णी, बरखा दत्त, कृष्ण प्रताप सिंह आदि ने प्रशंसात्मक ट्वीट किये थे।

परन्तु वही पत्रकार जो उन दिनों इमरान खान पर मुग्ध थे, वह अब शांत हैं।  यह उनकी विशेषता है कि जब भी बात उनके मन की नहीं होती है तो वह मौन धारण करना उचित समझते हैं। यही चुप्पी खलती है।  यदि यही बात प्रधानमंत्री मोदी तो छोड़ दीजिये यदि भाजपा के दूसरी पंक्ति के किसी नेता ने कही होती तो अब तक पूरे भारत में धरने प्रदर्शन हो चुके होते।

इमरान खान ने पिछले दिनों कहा कि औरतों के साथ होने वाली यौनिक हिंसा बढ़ती हुई अश्लीलता का परिणाम है और यह बॉलीवुड, हॉलीवुड और पश्चिम का परिणाम है। इसी के साथ उन्होंने जो कहा है, वह किसी भी सभ्य समाज के नेता के लिए सर्वाधिक लज्जाजनक वक्तव्य है। उन्होंने कहा कि औरतों को खुद को परदे में रखना चाहिए, जिससे दूसरे उनके प्रति आकर्षित न हों!

दरअसल यह जो इमरान खान ने कहा है, वह बुर्के में बनाए रखने का सबसे बड़ा हथियार है। भारत में भी यह बहस काफी होती रहती है कि मुस्लिम औरतों को बुर्का पहनना चाहिए या नहीं।  मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग है जो औरतों के बुर्का पहनने के पक्ष में हैं और प्रगतिशील साहित्यकार भी मुस्लिम औरतों के साथ होने वाले इस अत्याचार पर कुछ नहीं बोलते हैं।

जम्मू और कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस वाक्य पर नज़र डाली जाए तो पाएंगे कि पढ़े लिखे समुदाय में कट्टरपंथ की जड़े बहुत गहरी हैं। उन्होंने लिखा था “बुरके पर प्रतिबंध का आहवान इस्लामोफोबिया की लपटों को बढ़ा देगा। यह मुस्लिम महिलाओं को देखने के नजरिए को भी प्रभावित करेगा।”

इसी के साथ ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट करके लिखा, “ऐसे लोग घूंघट हटाने के बारे में क्या कहेंगे? इस पर प्रतिबंध कब लगेगा? कल को कहेंगे कि आपके चेहरे पर दाढ़ी ठीक नहीं है, टोपी मत पहनिए।”

क्या यह समझा जाए कि यह सभी लोग अपने मजहब में औरतों को ऐसी चीज़ मानते हैं, जिसे बचाकर रखना चाहिए।  हाल ही में चर्चा में रहे संगीतकार ए आर रहमान कई बार गलत कारणों से चर्चा में आ चुके हैं। उनकी बेटी का उनके साथ साक्षात्कार पर काफी हल्ला मचा था, जिसमें उनकी बेटी पूरी तरह से बुर्के में थी।  दिल्ली विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे डॉ. मुख्तयार सिंह ने दिप्रिंट में एक लेख में बुर्का के पक्ष में लेख लिखा था। मुस्लिम समुदाय का शिक्षित वर्ग जहां इस समस्या के विषय में बात नहीं करता है तो वहीं भारतीय प्रगतिशील लेखक तो मुस्लिम समुदाय की औरतों के साथ होने वाले अन्याय के पक्ष में ही खड़े दिखते हैं।

ऐसे में इमरान खान द्वारा कहे गए इतने बड़े वक्तव्य पर सब मौन हैं। औरतों को चीज़ मानने वाला यह वाक्य, उसी प्रकार अनसुना जा रहा है जैसे यहाँ पर मुस्लिम औरतों के खिलाफ पारित किये गए फतवों पर चुप रहा जाता है। हाल ही में मुस्लिम औरतों के नौकरी करने के खिलाफ फतवा निकला है और इसी के साथ एक और वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें लड़कियों की जल्दी शादी करने की वकालत की गयी है, और कहा गया है कि जितना जल्दी हो सके लड़की का निकाह कर दिया जाना चाहिए जिससे वह ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा कर सकें और साथ ही मिल्लत की सेवा के लिए समय पर मुक्त हो सकें।

हालांकि पकिस्तान में मानवाधिकार आयोग के साथ साथ कई और संस्थानों ने प्रधानमंत्री के इस घटिया वक्तव्य की आलोचना की है।

करांची में वीमेन एक्शन फोरम ने इस घटिया बयान की निंदा करते हुए इमरान खान से माफी मांगने की बात की है:

इमरान खान की पूर्व पत्नी जेमिमा गोल्ड स्मिथ ने भी इस वक्तव्य की निंदा की है।

परन्तु भारत के वह सभी प्रगतिशील लेखक और लेखिकाएं अब तक शांत हैं, हाँ, भाई उनके प्रिय नेता का प्रश्न जो है, और अपने प्रिय नेता की बनाई छवि है, जिसे वह अपने हाथों से तोड़ नहीं सकते।


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