वेदों से लेकर आज तक स्त्री की यात्रा

कहा गया कि स्त्रियों को वेदों को पढ़ने का अधिकार नहीं था, यह भी कहा जाता है कि स्त्रियों को पढने का अधिकार नहीं था। अध्ययन नहीं कर सकती थी स्त्रियाँ! और जो चेतना आई, वह मात्र तब आई जब अंग्रेजों ने भारत में कदम रखा या फिर जब महात्मा गांधी जी ने स्त्रियों से स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने के आह्वान किया। 

दो ही दिन पहले स्त्री दिवस निकला है। इस दिवस में हमने कई क्रांतिकारी कविताएँ पढीं कि अब औरत नहीं झुकेगी, अब औरत आगे बढ़ेगी। जब हम औरत के सन्दर्भ में यह बात कहते हैं कि औरत आगे बढ़ेगी तो यह सच हो सकता है क्योंकि स्त्री और औरत में जमीन आसमान का अंतर है। स्त्री और औरत की अवधारणा में पूरी की पूरी संस्कृति का अंतर है। 

जब भी कोई कहता है कि औरत के लिए यह संसार बहुत जुल्मी रहा है, तो यह सच हो सकता है क्योंकि औरत की अवधारणा ही मर्दों के मनोरंजन के लिए है।  औरत बनाई ही मर्द की पसली से है। जबकि स्त्री के साथ ऐसा नहीं है। स्त्री का अर्थ स्वयं में शक्ति है।  जब हम स्त्रियों के विषय में बात करते हैं, तो हर शब्द के विषय में हमें ज्ञात होना चाहिए।

हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि चूंकि हर शब्द किसी न किसी संस्कृति का द्योतक होता है, तो स्त्री और औरत शब्द भी अलग अलग संस्कृति के शब्द हैं। 

भिन्न भिन्न शब्दों के अर्थ:

1) स्त्री- प्रकृति- स्त्री शब्द एक प्रकृति का बोध कराता है, वह गुणों का बोध कराता है। गुण स्त्री और पुरुष होते हैं।  

2) नारी-देवत्व-  नारी शब्द देवत्व का बोध कराने वाला शब्द है

3) महिला-सामाजिक प्रस्थिति-यह अधिकार वाचक शब्द है।

4) औरत-मजहबी- यह उपभोग बोधक शब्द है, यह अरबी शब्द औराह से निकला है, जो एक क्रिया है, और जिसका अर्थ है शरीर के अंगों को ढकना, छुपाना ।

5) मादा-जैविक- यह तो मात्र प्रजनन की प्रक्रिया का बोधक शब्द है 

6) Women – पराधीनता- यह wyfmen से बना है, जिसका अर्थ है wife of man यह पराधीनत बोधक शब्द है।

तो महिला दिवस के अवसर पर जब भी स्त्री सशक्तीकरण जैसे शब्दों को सुनें तो इन्हें बदलने की आदत डालिए क्योंकि स्त्री तो स्वयं में शक्ति का ही नाम है। वह तो गुण और प्रकृति है, उसे कब से सशक्त करने की आवश्यकता होने लगी। इसी प्रकार नारी शब्द देवत्व का प्रतीक है, उसे भी सशक्त क्या करना। हाँ, महिला सशक्तीकरण की बात हो सकती है क्योंकि समय के साथ समाज में जो पतन आया, उसमें महिला की स्थिति कमज़ोर हुई।

अब जो सबसे महत्वपूर्ण शब्द है वह है औरत! औरत को तो आज़ादी चाहिए ही होगी क्योंकि वह तो उस धातु से निकला हुआ शब्द है जिसका अर्थ ही दबना और ढांकना है। उसे तो बंधन से आज़ादी चाहिए ही होगी। वह तो कैद में है ही। परन्तु स्त्री नहीं! 

ऐसे ही woman शब्द भी पराधीनता को परिलक्षित करता हुआ शब्द है। क्योंकि वह शब्द बना ही वाइफ ऑफ मैन से है। 

जब हम अपनी स्त्रियों के विषय में बात करते हैं, तो वह मात्र पत्नी का द्योतक नहीं होता क्योंकि हमें हमारे इतिहास में सुलभा संन्यासिनी जैसी स्त्री भी प्राप्त होती हैं, जिन्होनें स्वयं ही अविवाहित होना स्वीकार किया था। जिन्होनें राजा जनक के साथ शास्त्रार्थ कर यह स्थापित किया था कि आत्मा कोई स्त्री पुरुष नहीं होती।

वेदों में सूर्या सावित्री से लेकर सुरमा जैसी स्त्रियों के उदाहरण हैं। जहाँ सूर्या सावित्री विवाह में पढ़े जाने के लिए मन्त्रों की रचना करती हैं तो वहीं सुरमा पाणियों को यह सन्देश देने के लिए इंद्र की दूत बनकर जाती हैं कि उन्होंने इंद्र की गौओं को चुराकर जो पाप किया है, तुम उनकी क्षमा मांग लो, और गौ धन देवताओं को वापस कर दो!

यह स्त्री चेतना थी और यह स्त्री गुण थे, यह स्वाभाविक गुण थे। यह पराधीनताबोधक नहीं थे। तभी सूर्यासावित्री से चली आ रही चेतना विस्तारित होती रही। 

भारत भूमि में चेतना मात्र पुरुषों तक सीमित नहीं थी, जैसा पश्चिमी विचारक दावा करते हैं। वह यह दावा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि वह woman के रूप में स्त्री को देखते हैं। वह woman के कल्चर की दृष्टि से स्त्री संस्कृति को देखते हैं, तभी वह पहचान नहीं पाते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई एक स्त्री होकर युद्ध करने के लिए आ जाती हैं। और चूंकि उन्होंने मात्र वाइफ की ही दृष्टि से देखा होता है तो वह चंडी और माँ काली की शक्ति को पहचानने में विफल रहते हैं। 

यह चेतना आज तक चलती चली आ रही है, तभी हमारे यहाँ सुदूर गाँवों में एक नानाम्‍मल आती हैं और योग की अलख जगाती हैं।  यह स्त्रियों की चेतना का देश है तभी फ्लाइट लैंफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन कारगिल युद्ध में अपने शौर्य का परिचय देती हैं।  

तभी आज भी ओडिशा में कोई उर्मिला बेहरा एक लाख से भी अधिक वृक्ष लगाकर अपनी धरती को हरा भरा करती हैं। कोई दुलारी देवी बिना किसी लाभ की आस में कला की सेवा करती जाती हैं, और जब उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री प्राप्त होता है तो जैसे लोग चौंकते हैं कि अरे जमीन से जुड़ी स्त्री को भी यह सम्मान मिल सकता है?

इसी देश में मैरी कॉम से लेकर बबिता फोगट जैसी खेलों से प्रेम करने वाली स्त्रियाँ हैं। यह स्त्रियाँ अपने देश का मान बढ़ाने वाली स्त्रियाँ हैं। यह स्त्रियाँ हैं जो स्वयं में शक्ति का नाम हैं।  उनमें हर आयातित कुरीति से लड़ने का दम है तभी झारखंड की चुटनी देवी पश्चिम से आई डायन प्रथा को अपने समाज से मिटाने के लिए दृढ संकल्प हैं और तभी उन्हें सरकार इस वर्ष पद्मश्री से सम्मानित करती है।

यह जो सम्मान हैं, वह स्त्रियों के सम्मान हैं, जो औरतों की नजर से देखते हैं, वह नहीं समझ पाएंगे और जो woman की नजर से देखते हैं, वह भी नहीं समझ पाएंगे।

इस महिला दिवस पर आइये हम अपने देश की स्त्रियों के विषय में जानें जिन्होनें वेदों से लेकर अब तक हमारी चेतना को जीवित और स्पंदित रखा हुआ है। 


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