हर अवसर पर वामपंथी लेखकों का हिन्दू आस्था पर प्रहार

प्रधानमंत्री मोदी बार बार एक मूलमंत्र दोहराते हैं और वह है आपदा में अवसर! यह आपदा में अवसर बहुत अच्छी बात है, एवं सकारात्मक बुद्धि वाले लोग इस का सदुपयोग करते भी हैं जैसा हमने कोविड 19 की प्रथम लहर में देखा था और पाया था कि कई लोग नए नए रोजगार के अवसरों के साथ आए।  पर क्या यह मात्र सकारात्मक ही लोग कर रहे हैं? यह भी एक प्रश्न है क्योंकि अब ऐसा प्रतीत होता है कि नकारात्मक शक्तियों ने भी आपदा में अवसर खोज लिया है।

आपदा क्या है? और अवसर क्या है? और इसका फायदा वामपंथी कैसे उठा रहे हैं, उसे समझना होगा।  आपदा है कोविड 19 की दूसरी लहर! जिसके विषय में केंद्र सरकार द्वारा पहले से ही सचेत करती हुई आ रही थी, और तमाम तैयारियों के लिए राज्य सरकारों से भी सलाह मांगती आ रही थी, परन्तु उस समय यह वामपंथी भारत में किसान आन्दोलन को पूरी तरह समर्थन देकर, इस वायरस का भारत में फैलाव कर रहे थे। जो फेमिनिस्ट लेखिकाएं इन दिनों कट कॉपी पेस्ट मेसेज फॉरवर्ड दनादन किए जा रही हैं, वह उन दिनों अपनी डिज़ाईनर ड्रेस में किसान आन्दोलन में रोज जा जाकर क्रांतिकारी कविताएँ लिख रही थीं।

और भीड़ का हिस्सा बनकर, हजारों लोगों के साथ बैठकर, खाना खाकर आदि वह स्वयं को सबसे बड़ी क्रांतिकारी समझ रही थीं और सरकार को सबसे बड़ा अत्याचारी। वामपंथी लोग पहले छोटी असंतुष्टि को उभारते हैं, और फिर उसे उभार उभार कर समस्या को विशाल रूप देते हैं। वह पहले सामान्य स्थिति में समस्या खोजते हैं और फिर उस समस्या को हल करने के बहाने जन असंतोष फैलाने का कृत्य करते हैं। अमेरिका को हाल ही में वह अपना शिकार बना चुके हैं, अब उनका अगला निशाना भारत है और भारत पर वह तब तक अधिकार नहीं कर सकते हैं जबतक नरेंद्र मोदी हैं। इसलिए न ही किसान आन्दोलन भारत का आतंरिक मामला रह गया है और न ही अब यह मामला।

अब बात करते हैं इन कॉपी पेस्ट फॉरवर्ड संदेशों के बहाने सरकार को कोसने की। और बात यदि सरकार तक सीमित होती तो भी चलता। हर बार की तरह यह मंदिरों पर निशाना साधने लगे। और उस पर भी अयोध्या के मंदिर पर! वह मंदिर जो अभी बना तक नहीं है, परन्तु वहां ट्रस्ट में इतना धन आ गया है जितना इन लोगों ने सोचा नहीं था। वह मंदिर जिसका हर कीमत पर विरोध किया गया, वह मंदिर जिसकी राह में सबसे ज्यादा रोड़े केवल और केवल कथित बौद्धिकों ने कई अजीबोगरीब तथ्यों से अटकाए थे। यहाँ तक कि उसे बौद्ध मंदिर तक स्थापित कर दिया था, फिर भी तमाम रोड़ो के बाद यह मंदिर अपने असली विशाल रूप में आ रहा है तो कथित बौद्धिकों को परेशानी हो रही है कि बिना सरकारी सहायता के कैसे करोड़ों रूपए इकठ्ठा हो सकते हैं।

पर हो रहे ही हैं और लोग अपने राम के लिए जी खोलकर चंदा दे रहे हैं। और वह और कुछ नहीं देख रहे हैं। भक्त अपनी आस्था के लिए हर कार्य कर रहे हैं। मंदिर पर निशाना साधना वामपंथी जुगाडुओं के लिए  सबसे सरल कार्य है क्योंकि हिन्दुओं में मंदिरों को लेकर कुछ सहिष्णु दृष्टिकोण होता है और कुछ उनके दिमाग में फिल्मों और कहानियों के माध्यम से मंदिरों की नकारात्मक छवि बना दी गयी है तो वह मंदिरों से जुड़ नहीं पाते हैं और बार बार यह पूछते हैं कि मंदिरों में लाखों का जो चढ़ावा आता है उसका क्या होता है? इनसे पूछा जाए कि मंदिरों में लाखों का चढ़ावा किनके लिए दिया जाता है? वह भगवान के लिए दिया जाता है एवं जनकल्याण के कार्यों के लिए। परन्तु अब तो मंदिर के चढ़ावे का काफी हिस्सा सरकार के पास चला जाता है,  इन लोगों का ध्यान कभी कश्मीर के टूटे और जले हुए मंदिरों पर नहीं जाता है, कि जो चढ़ावा आए उससे वह हिन्दू समाज के उन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराए, जो अपने अस्तित्व के अंतिम पायदान पर हैं।

इन लेखकों के कैरियर का आरम्भ ही हिन्दू भगवान की बुराई करके होता है।  राम को स्त्री विरोधी ठहराना, कृष्ण को छलिया बताना, शिव को नशेड़ी बताना, और दुर्गा को वैश्या बताना इनके एजेंडे में हैं। हमारे नायकों को गाली देना इनके साहित्यिक कैरियर का प्रथम पड़ाव होता है। कांवड़ से होने वाली परेशानी इन्हें उन दिनों सबसे बड़ी समस्या लगती है, और नवरात्रि में कन्या भोज ढकोसला। प्रगतिशीलों की बाइबिल कही जाने वाली हंस पत्रिका के पूर्व सम्पादक श्री राजेन्द्र यादव ने तो हनुमान जी को आतंकवादी तक कहा था। तो राजेन्द्र यादव जैसों की दृष्टि में ऊंचा उठने के लिए लेखकों और लेखिकाओं ने जमकर राम जी, हनुमान जी को गाली देना शुरू कर दिया।

परन्तु यह भी देखना रोचक है कि वही लोग जिनका साहित्यिक जन्म ही भगवान को कोसने के कारण हुआ है, जो स्वयं को ‘आस्तिक हैं धार्मिक नहीं’, कहते हैं, वही अब आपदा में अवसर खोजते हुए मंदिरों को कोस रहे हैं और उन मंदिरों के पैसे पर लार टपका रहे हैं, जो केवल और केवल मंदिर में आस्था रखने वालों के लिए होना चाहिए। मंदिरों को कोसने वाले यह नहीं देख रहे हैं कि इस आपदा काल में मंदिरों ने खुलकर अपने दरवाजे खोले हैं और अयोध्या में तो ट्रस्ट ने ऑक्सीजन संयंत्र ही लगाने की घोषणा कर दी है।

मंदिरों के विषय में अधिनियम का “अ” न जानने वाले लेखक और लेखिकाएँ हमारी आस्था का मज़ाक उड़ाते हैं और जबजब उन्हें अवसर मिलता है तो वह हर आपदा को मंदिर को कोसने का अवसर बनाते हैं, फिर चाहे कठुआ काण्ड हो या फिर कोविड या फिर केदारनाथ त्रासदी! यह बेहद निकृष्ट लोग हैं।  इस आपदा काल में कैसा गैंग सक्रिय हुआ है, आपदा में अवसर खोज रहा है, देश को और अशांत करने के लिए ‘कश्मीर नामा’ के लेखक अशोक पाण्डेय की इस पोस्ट से साफ़ हो जाता है। और यह भी गौर किया जाए कि यह ब्लू टिक धारी है अर्थात सत्यापित हैं।


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