दानिश सिद्दीकी की मृत्यु के बहाने प्रश्न?

भारत के पत्रकार दानिश सिद्दीकी की हत्या के मामले में नया मोड़ तब आया जब तालिबान के प्रवक्ता ने स्वयं ही यह स्वीकार किया कि उन्हें भारतीय होने के नाते मारा गया। और जब वह मर गए थे तो दानिश के सिर को गाड़ी से भी कुचला गया और दावा यह किया जा रहा है कि उन्हें हिन्दुस्तानी होने के कारण मारा गया।

आज तक के अनुसार दानिश को पहले गोली मारी और फिर उनके सिर पर गाड़ी चढ़ा दी।

यह कितना अजीब है कि दानिश ने खुद को हमेशा ही भारतीय मुस्लिम माना और केवल भारतीय होने को नकारते रहे। यदि वह मजहब से परे खुद को रख कर केवल भारतीय मानते तो वह दिल्ली दंगों में एक तरफ़ा रिपोर्टिंग और एकतरफा फोटो न खींचते।

दानिश सिद्दीकी की हत्या के बाद उनके कुछ पुराने ट्वीट वायरल हुए थे उसमें एक ट्वीट गौर करने लायक था, जिसमें दानिश ने लिखा था कि वह एक भारतीय मुसलमान होने के नाते उन पुलिसवालों के लिए फांसी की सजा की मांग करते हैं, जिन्होनें कुछ राजनेताओं को प्रभावित करने के लिए चार मासूम मुसलमानों को मार दिया था।

यह ट्वीट इशरत जहाँ को लेकर था।

इशरत जहां को लेकर क्या केवल एक भारतीय होने के नाते न्याय नहीं माँगा जा सकता था, यदि दानिश को लगा था कि उसके साथ कुछ गलत हुआ। न्याय मांगने के लिए मजहबी पहचान की जरूरत क्यों थी? यह बहुत ही हैरानी भरा था और यही द्रष्टिकोण रखकर ही दानिश ने बाद में पत्रकारिता की और उनकी पत्रकारिता में भारत न होकर भारतीय मुस्लिम था।

और उनकी पत्रकारिता का समर्थन कर रहे कथित धर्मनिरपेक्ष पत्रकार और फेमिनिस्ट भी एंटी हिन्दू पहचान का शिकार हैं। वह सब कुछ हो सकते हैं, हिन्दू नहीं। हिन्दू विरोध उनकी रग रग में भरा हुआ है, तभी दानिश सिद्दीकी की हत्या करने वाले तालिबान को उन लोगों ने क्लीन चिट दे दी और बार बार इस बात की माँग की गयी कि प्रधानमंत्री स्टेटमेंट दें, प्रधानमंत्री ने निंदा क्यों नहीं की। पर क्या उन्होंने खुद तालिबान की निंदा की?

प्रधानमंत्री किसके लिए ट्वीट करते हैं, और किसके लिए नहीं, वह उनके विवेकाधिकार के अंतर्गत आता है। परन्तु हिन्दू घृणा से भरे हुए इन बुद्धिजीवियों और विशेषकर फेमिनिस्ट ने हर सीमा पार करते हुए भारत के हिंदूवादी युवाओं को भारत का तालिबान घोषित कर दिया, मगर तालिबानों के प्रति इनकी दीवानगी इस हद तक थी कि इन्होनें दानिश के हत्यारों की निंदा तक नहीं की है।

दानिश से इन्हें प्रेम केवल इसलिए है क्योंकि वह उनके हिन्दू विरोधी एजेंडे को चलाने में सहायक था, नहीं तो वह पत्रकार रिजवाना की तरह दानिश को भी भुला देते। परन्तु चूंकि दानिश की हत्या को लेकर वह कथित हिंदुत्ववादियों को घेर सकते हैं, इसलिए वह दानिश सिद्दीकी को याद कर रहे हैं। और विडंबना देखिये कि दानिश की मौत को अपने एजेंडे को सफल बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

जैसे ही तालिबान ने यह कहा था कि उन्हें नहीं पता था कि कैसे दानिश की मौत हुई, तो भारत में लिबरल और फेमिनिस्ट सभी यह कहने लगे थे कि तालिबान ने तो कम से कम कुछ कहा है कि उसे दानिश की मौत का शोक है, परन्तु भारत के प्रधानमंत्री ने अभी तक कुछ नहीं कहा है। क्या वह दानिश की हत्या का इस्तेमाल केवल प्रधानमंत्री को गाली देने के लिए कर रहे थे, जो उनका प्रिय शगल है, यह प्रश्न तो उठता ही है?

दानिश के विषय में तालिबान के प्रवक्ता ने कहा था कि जो भी पत्रकार युद्ध क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है, उसे हमें सूचित करना चाहिए, तो हम ध्यान रखेंगे। हमें दानिश की मौत का अफ़सोस है।

मगर यह सच नहीं था क्योंकि आजतक पर जिस प्रकार से दानिश की हत्या की सच्चाई आई है, वह झकझोरने वाली है। दानिश जीवन भर खुद को मुसलमानों की उस पहचान से जोड़ते रहे, जिसके आधार पर वह भारत के बहुसंख्यक को असहिष्णु ठहरा सकें और ऐसा किया भी। परन्तु वह यह भूल गए कि उनकी पहचान एक भारतीय मुसलमान की होते हुए भी बाहर के इस्लामी मुल्कों में भी भारतीय ही है। वह जिस देश और जिस देश के बहुसंख्यक समाज से नफरत करते थे और असहिष्णु ठहराया करते थे, वही देश उनकी पहचान था।

दिल्ली दंगों से लेकर कुम्भ और हिन्दुओं की लाशों के जलने की तस्वीरों को न केवल एकतरफा दिखाया था दानिश ने, बल्कि उन्हें ऑनलाइन बेचा भी था!

यह दानिश का दुर्भाग्य है कि मीडिया के उनके मित्र, सहकर्मी, और उनकी मौत का इस्तेमाल अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने वाले लोगों ने तालिबान की प्रशंसा करने में जरा भी देर नहीं लगाई थी, जब तालिबान ने इस हत्या में अपना हाथ होने से इंकार किया था वहीं जब यह तय हो गया है कि तालिबान ने दानिश के शरीर के साथ कितनी नृशंसता की, तो उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा और दानिश के हत्यारों के पक्ष में जाकर खड़े हो गए हैं।

इससे एक बात स्पष्ट होती है कि वाम पोषित फेमिनिज्म भीतर से खोखला और कट्टर इस्लाम से डरने वाला है, तभी वह दानिश सिद्दीकी की इस क्रूर हत्या के लिए तालिबान को क्लीन चिट दे बैठी हैं। एक बार भी इन्होनें यह नारा नहीं दिया

दानिश हम शर्मिंदा है,

तेरे कातिल जिंदा हैं!”

लिबरल और सेक्युलर पत्रकार और वाम पोषित पिछड़ा फेमिनिज्म आज दानिश के हत्यारों के साथ खड़ा है और दानिश जैसे काश यह समझ पाएं कि अंत समय में उनका वही देश उनके काम आएगा जिसे वह लगातार कोसते रहे न कि वह लोग जिनके उकसाने पर वह अपने देश को बदनाम करते रहे! और हाँ, अभी तक गोली को लानत भेजने वाले पत्रकार ने भी तालिबान को दोषी नहीं ठहराया है!


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