प्रशांत भूषण मामले से झलकती है लुटियंस गिरोह की भारत की न्यायपालिका पर मजबूत पकड़

हाल ही में, न्यायपालिका पर लुटियंस तंत्र की मजबूत पकड़ और गहरी पैठ एक बार फिर से प्रकाश मे आयी। न्यायपालिका ने लुटियंस गिरोह के नामी वकील प्रशांत भूषण को न्यायपालिका की अवमानना और अपमान तथा उसकी गरिमा को क्षति पहुचाने के आरोप में दोषी पाए जाने के पश्चात भी नरमी दिखाई और मामले को हफ्तों के हिचकिचाहट भरे विलंब के बाद मात्र एक रुपये के प्रतीक अर्थदंड के साथ बंद कर दिया।

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शीर्ष अदालत ने लुटियंस गुट के वकील प्रशांत भूषण के इन दो ट्वीट पर आपत्ति जताई थी, जहां उन्होंने सीजेआई (भारत के मुख्य न्यायाधीश) का एक चित्र हार्ले डेविडसन बाइक की सवारी करते हुए साझा किया और टिप्पणी की कि ऐसे समय में जब शीर्ष अदालत को लॉकडाउन में रख कर मुख्य न्यायाधीश नागरिकों को न्याय के मौलिक अधिकार से वंचित रख रहे हैं, वह खुद एक भाजपा नेता की ५० लाख की बाइक पर बिना हेलमेट और मास्क के सवारी कर रहे हैं (वास्तव में सीजेआई स्थिर बाइक पर केवल कुछ क्षण बैठे थे)। भूषण ने लोकतंत्र का हवाला देते हुए आपातकाल जैसी स्थिति बताते हुए यह भी कहा की सर्वोच्च न्यायालय और पिछले चार सीजेआई की सक्रिय भूमिका से लोकतंत्र को नष्ट किया जा रहा है। 

शीर्ष अदालत ने इस विषय का संज्ञान तो लिया परंतु भूषण को दोषी पाए जाने के बाद भी न्यायालय ने निर्णय में विलंब किया और उस दौरान वह भूषण से शाब्दिक रूप में क्षमा मांगने की याचना करती रही।

इस विषय की सुनवाई न्यायाधीश अरुण मिश्रा, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की खंडपीठ ने करते हुए यह व्यक्त किया की ये बयान न केवल दुर्भावनापूर्ण थे और न्यायपालिका की आधार को अस्थिर कर रहे थे बल्कि तथ्यों पर भी कम थे। इस तरह के जोरदार शब्दों के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय भविष्य में इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए अनुकरणीय दंड का उदाहरण देने से वंचित रह गया।

हफ़्ते भर बाद जब दंड का निर्णय आया तो न्यायालय ने एक तरह से आत्मसमर्पण कर दिया, मात्र एक रुपय का अर्थदंड लगा कर। यहाँ पर हमें उस पारिस्थितिकी तंत्र पर भी ध्यान देना चाहिए जिसका निर्माण लुटियंस गुट ने वर्षों से किया है।

संभवत: यही लुटियंस तंत्र है जिसने महान्यायवादी (अटार्नी जनरल) के.के. वेणुगोपाल को भूषण के पक्ष में बोलने के लिए विवश किया जब उन्होंने न्यायालय से कहा कि जनहित याचिकाओं के क्षेत्र में किए गए ‘अच्छे काम’ के मद्देनजर भूषण को दंडित न करें।

संजय हेगड़े का प्रशांत भूषण का बचाव  करना हमें आश्चर्यचकित नहीं  करता है, परंतु एक लुटियंस गिरोह के सदस्य के बचाव के लिए महान्यायवादी का विषय मे कूद पड़ने का क्या औचित्य है, वो भी ऐसे दोषी के लिए जिसके ट्वीट न्यायपालिका के सहित केंद्र सरकार के लिए भी दुर्भावनापूर्ण घृणित विचारों को व्यक्त करते हैं और सत्य से कोसों दूर हैं?

लुटियंस गुट से संबंधित प्रकरणों में जब न्यायपालिका को झुकने को कहा जाता है, तो वह रेंगते हुए दिखती है। सड़ाँध इतनी गहरी है कि यह गुट एक आतंकवादी के लिए बेवक्त, रात्री काल में भी न्यायालयों के द्वार खुलवा सकते हैं जबकि आम अभियोगाधीन (अंडरट्रायल)  नागरिक बिना सुनवाई के ही बंदीगृहों में वर्षों से समय व्यतीत कर रहे हैं।

भूषण के प्रति न्यायालय के व्यवहार के ठीक विपरीत था न्यायालय का न्यायाधीश सी.एस कर्णन के प्रति व्यवहार, जिन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में प्रश्न उठाए थे और जिनकी टिप्पणियों में भूषण के बयानों की गूंज है। आदर्श रूप से विधि में दो भारतीय नागरिकों के बीच भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए, परन्तु लुटियंस गुट के सदस्य विधि-विधान से ऊपर हैं जिनके साथ न्यायालय हमेशा नर्म व्यवहार दर्शाते हैं।

इस मामले में भूषण के अभिभाषक लुटियन्स गुट के ही एक अन्य सदस्य, सुनवाई के मध्य में हुक्का-धूम्रपान करने वाले, राजीव धवन थे जिन्होंने श्री रामजन्मभूमि मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम दलों का प्रतिनिधित्व किया था।

हमने इस गुट के अनैतिक तौर-तरीकों को देखा है जब इन्होंने तत्कालीन सीजेआइ दीपक मिश्रा पर दबाव डालने के लिए महाभियोग चलाने का प्रयास किया था।न्यायालयों तक सुलभ पहुंच और उनके प्रति दी गई ढील के अतिरिक्त लुटियन्स गुट शीर्ष अदालत में अपना काज सिद्ध करने में भी सक्षम है। न्यायपालिका द्वारा सभी साहस प्रदर्शन के बावजूद, तथ्य यही है कि वह लुटियंस गुट के सामने दंतहीन है।

(चित्र सौजन्य : प्रशांत भूषण का ट्विटर अकाउंट)

(प्रमोद सिंह भक्त द्वारा इस अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद)


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