राजराजा चोल का सैन्य अभियान

राजराजा चोल पर हमारी श्रृंखला के पहले भाग में हमने उनके वंश और परिग्रहण के बारे में विस्तार से बताया था। राजराजा प्रथम के आगमन ने भव्य चोल युग का शंखनाद  किया, जिसने राजवंश के गौरव को शिखर पर पहुंचा दिया।

तिरुवलंगडू पट्टीकाओं के अनुसार, राजराजा प्रथम ने दक्षिण दिशा की विजय के साथ अपना विजयी सैन्य अभियान शुरू किया। पंड्या, केरल और सिम्हला, महाराजा के पूर्वजों के समय से चोलों के खिलाफ गठबंधन में थे। यह गठबंधन राजराजा  प्रथम के समय भी प्रभावशील था,  और इसलिए राजराजा के दक्षिणी अभियान  चेरों और पांडेय दोनों की ओर लक्षित  था।

राजराजा चोल प्रथम के दक्षिणी अभियान

जब पांड्या राजा अमरभुजंगा की हार हुई, तो उनका राज्य चोल राज्य में विलीन  हो गया। राजराजा प्रथम का चेरा समकालीन भास्कर रवि वर्मन तिरुपदि था। उन्होंने चेरों और पांड्या, दोनों को हराकर  “मुमुदी चोल देव” की उपाधि ग्रहण की, जिसका अर्थ था “वह स्वामी जो तीन मुकुट (चोल, चेरा और पांड्या) का श्रृंगार करता है”। कान शास्त्री का मानना है कि इस शीर्षक का अर्थ है तिगुनी शक्ति वाला चोल।

हालांकि राजराजा प्रथम इस खिताब को अपने शासन के चौथे वर्ष से  वहन कर रहे थे, पर दोनों ही राज्यों में उनकी विजय तब तक पूरी नहीं हुई जब तक वे अपने  शासन के आठवें  वर्ष में नहीं जा पहुंचे ; और  इसी काल में केरल और पांड्या राज्य में राजराजा के शिलालेख दिखाई देते हैं। इन दोनों राज्यों की विजय एक सैन्य अभियानों की  श्रृंखला के माध्यम से पूरी हुई थी, जिनमें से एक का नेतृत्व उनके पुत्र और उत्तराधिकारी युवराज राजेंद्र प्रथम चोल ने  किया था।

राजराजा प्रथम चोल द्वारा सिम्हला (श्रीलंका) की विजय

चेरा और पांड्या राज्यों के विजय और चोला राज्य में उनके संविलयन  के बाद राजराजा ने तीन भागों से युक्त सिम्हला के तीसरे हिस्से की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया। इज़हेम (श्रीलंका का उत्तरी भाग) पहले मेयककीर्ति (स्तुत्य रूप) से जाना जाता है, जो “तिरुमगल” के रूप में चरितार्थ  होता है।

श्रीराम ने बंदरों की सहायता से समुद्रों के पार का रास्ता बनाया और फिर तेज धार वाले तीरों के द्वारा लंका के राजा रावण को मार गिराया।  परंतु राजराजा इनसे भी अग्रगण्य थे,  जिनकी शक्तिशाली सेना ने जहाजों से समुद्र पार किया और लंका के राजा को अग्निसात कर  दिया।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, जब राजराजा प्रथम ने  द्वीप पर आक्रमण करने के लिए नौसेना अभियान चलाया था तब महींद-5, जो 981 ईसवी में सिंहासन पर बैठे थे, ही श्रीलंका के शासक थे। राजराजा, महिंद्-5 को जंगलों में  खदेड़ने में सफल हुए और खुद को अधिकांश उत्तरी श्रीलंका  का शासक घोषित कर दिया,  जो कि मुमुदी चोल मंडलम का प्रांत बन गया।

राजराजा ने महिंदा-5 को रोहना नामक द्वीप के दक्षिणी भाग में दुर्गम पहाड़ी-देश में शरण लेने के लिए सफलतापूर्वक  खदेड़ ने के बाद- पोलोन्नरूवा में अपनी राजधानी स्थापित की। उन्होंने शहर जनानाथ-मंगलम का नाम बदला और वहां सीलोन के चोल कब्जे के संकेत को दिखाने के लिए भगवान शिव को समर्पित एक पत्थर का मंदिर का निर्माण कराया।

शिव देवले (चित्र स्रोत: कला और पुरातत्व)

राजराजा प्रथम चोल द्वारा कोंगुमंडलम की  विजय

राजराजा ने वर्तमान कर्नाटक (मैसूर क्षेत्र) के नोलुंबपदी, गंगापदी और तदिगइपदी को चोला  साम्राज्य का हिस्सा बनाया। यह अभियान आंशिक रूप से सफल रहा क्योंकि चोलों ने कोंगूनाडु देश पर अपना नियंत्रण बनाए रखा था जहां से सैन्य आक्रमण शुरू करना आसान था। नोलंबा और गंगा इस क्षेत्र के शासक थे।

राजराजा की विजय के समय, नोलंबा पहले ही अपनी स्वतंत्रता खो चुके थे और गंगा के जागीरदार बन गए थे। नोलुंबपदी में तुमकुर, सितलदुर्ग, बेंगलुरु के बड़े हिस्से, कोलार, बेल्लारी जिले, सेलम और  उत्तरी आरकोट के कुछ हिस्सों को भी शामिल किया गया था। नोलंबा ने यहां शासन किया, और राजराजा के सामंत बने रहते हुए भी गंगा के खिलाफ, गुप्त रूप से और कभी प्रत्यक्ष रूप से भी , चोलाओं का साथ दिया।

यह अभियान मुख्य रूप से गंगाओं को लक्षित कर चलाया गया था। चोल सेना ने कोंगुनादु से कावेरी नदी को पार कर तदिगइपदी पर कब्जा कर लिया। इस विजय की शानदार सफलता ने चोलों को एक सदी से अधिक समय तक इस क्षेत्र का अधिपति बना दिया।

यहां एक राजनैतिक क्रांति का उल्लेख है, जिसने राजराजा को महान बनाने में मदद  की— वो थी  तैला द्वितीय अवहमल्ला द्वारा राष्ट्रकूटों की जगह लेना और 973 ईस्वी में प्राचीन चालुक्यों  की पुनर्स्थापना । गंगा और नोलंबा ने राष्ट्रकूट में एक प्रमुख सहयोगी खो दिया था और अपेक्षाकृत नए पश्चिमी चालुक्यों से उन्हें बांधे रखने  के लिए कुछ भी नहीं था। राजराजा खुद एक जानेमाने सैन्य प्रतिभा थे लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम ने उनकी जीत को बहुत आसान बना दिया था। राजराजा प्रथम चोल ने पश्चिमी चालुक्यों के खिलाफ आक्रामक शुरुआत की।

सत्यश्रया 992 ई. के कुछ वर्षों बाद चालुक्य सिंहासन पर बैठे जब राजराजा ने पश्चिमी राज्य पर विजय प्राप्त की थी। राजराजा के शिलालेख में कहा गया है कि वह सत्यश्रया के खिलाफ युद्ध में सफल रहे जिसमें उसने उस के कुछ खजानों पर कब्जा कर लिया जो की भव्य तंजावुर  बृहदेश्वर  मंदिर को समृद्ध बनाने में काम आया ।

जिस समय राजराजा ने दक्षिण से अपना अभियान शुरू किया उसी समय पश्चिम चालुक्यों को उत्तर में मालवा के परमारों से सैन्य आक्रमण का सामना करना पड़ रहा था। यह स्पष्ट है कि सत्यश्रया को दो  शक्तिशाली शत्रुओं के विपरीत दिशाओं से हमले से  संघर्ष करने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता। पश्चिमी चालुक्यों के रत्तापदी को चोल साम्राज्य में मिला दिया गया था। कान शास्त्री में उल्लेख है कि सत्याश्री कुछ समय बाद रत्तापदी को पुनः प्राप्त करने में सफल हुए थे।

राजराजा चोल और पूर्वी चालुक्य

पूर्वी चालुक्य जो वेंगी में लगभग तीन शताब्दियों से शासन कर रहे थे अब एक पतन और जरा जीर्ण राह पर चल पड़े थे, और राजराजा के सिंहासन पर आते ही उनका राज्य विवादित उत्तराधिकार और अराजकता का शिकार हो गया था।

पश्चिमी और पूर्वी चालुक्यों के बीच के संबंध एक अलग विषय है  लेकिन यहां यह बताना पर्याप्त है कि राजराजा ने वेंगी के मामलों में प्रत्यक्ष रुचि ली और पूर्वी चालुक्यों और चोला के बीच वैवाहिक गठबंधन करा कर उन्हें करीब लाए। वेंगी के राजकुमार विमलादित्य ने राजराजा की बेटी और राजेंद्र प्रथम चोला की छोटी बहन कुंथवई से शादी की जिससे पूर्वी चालुक्यों में एक नए रक्त का संचार हुआ और खत्म होते हुए वंश को जीवनदान मिला, जिससे की उनका अस्तित्व अगली शताब्दी तक बना रहा ।

राजराजा प्रथम चोल की मालदीव पर विजय

राजराजा की अंतिम विजय, जिसका उनके शासन-काल के २९ वें वर्ष के समय के शिलालेखों में उल्लेख है, समुद्र के पुराने बारह हजार द्वीपों के समूह पर कब्जे का ब्यौरा देता है। विद्वानों ने इसकी पहचान मालदीव के द्वीपों से की है। दुर्भाग्य से इस विजय का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है। हालांकि यह विजय राजराजा  द्वारा खड़ी की गयी महान कुशल नौसेना का एक साक्ष्य है, जिसका आने वाले वर्षों में दक्षिण पूर्व एशिया की अपनी विजय के दौरान उनके बेटे और उत्तराधिकारी राजेंद्र प्रथम चोल द्वारा बड़े ही प्रभावी रूप से उपयोग  किया गया है।

राजराजा प्रथम चोल के शासनकाल में चोल साम्राज्य की सीमा (स्रोत: Wikiwand.com)

राजराजा की सैनिक प्रतिभा उनकी बुद्धि और प्रशासनिक क्षमताओं से समान रूप से मेल खाती थी, जिसे हम इस श्रृंखला के बाद के भागों में देखेंगे ।

संदर्भ
चोल – के ए नीलकंठ शास्त्री (स्रोत)
राजराजा द ग्रेट : श्रद्धांजलि की एक माला – सेल्वी पुनगोथाई और डॉ केडी थिरुनावुकारसू (स्रोत)  द्वारा संकलित।

(रागिनी विवेक कुमार द्वारा इस अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद)


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