अमेरिका फर्स्ट: जो बाइडन का वामपंथी-उदारवादी छल

भारत इन दिनों कोविड 19 की दूसरी लहर का सामना कर रहा है और वह एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जिस दौर से उसने कभी सोचा नहीं होगा। यह सत्य है कि कुछ प्रशासनिक लापरवाही इस सरकार से एवं राज्य सरकारों से हुई है, जैसा कि अब कई दस्तावेजों से दिखाई दे रहा है। परन्तु जब इस लहर में सबसे ज्यादा जरूरत थी और वैक्सीन पर तेजी से काम होना चाहिए, तब अमेरिका के बाइडन प्रशासन ने अपने असली रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। पिछले साल जब अमेरिका कोरोना से बहुत बुरी तरह प्रभावित था, तब भारत ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवाई भारी मात्रा में वहां भेजी थी, और उसके बाद पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भारत को 100 वेंटिलेटर भेजे थे। परन्तु डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जो बाइडन का प्रशासन भारत की मदद करने के लिए अब तक तैयार नहीं है।

अभी बहुत दिन नहीं हुए थे, जब भारत का एक बड़ा वर्ग केवल इसी बात पर झूम रहा था कि अमेरिकी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस भारतीय मूल की हैं और उन्हें दक्षिण भारतीय भोज पसंद है। एक बड़ा वर्ग जो अमेरिका से मान्यता के लिए उतारू रहता है और जिसे अमेरिका से आया हुआ हर विमर्श पसंद है, वह कमला हैरिस के उप राष्ट्रपति बनने की  खुशी में यह तक भूल गया था कि भारत में स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण तक करने में स्त्रियाँ सम्मिलित थीं, और वह भारत को यह सलाह देने लगा था कि भारत को अमेरिका से सीखना चाहिए कि कैसे औरतों को सशक्त किया जाता है।

हालांकि अमेरिका की इस बात पर जी खोल कर प्रशंसा करने वाले औपनिवेशिक मानसिकता वाले गुलाम लोग, जिन्हें भारत में बुद्धिजीवी वर्ग कहा जाता है, बाइडन और कमला हैरिस के इस निर्णय पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। यह लोग अमेरिका की वामपंथी-उदारवादी सोच की पीछा करने के लिए इतने उतावले रहते हैं कि जो बाइडन के राष्ट्रपति बनते ही यहाँ पर लेख लिखने आरम्भ हो गए थे कि कैसे भारत के नरेंद्र मोदी के साथ जो बाइडन को ‘डील’ करना है। पर यह बौद्धिक गुलाम बाइडन का अपने देश के प्रति प्रेम नहीं देख पा रहे हैं और न ही देश प्रेम जैसी अवधारणा को अपने देश पर लागू कर पा रहे हैं।

बाइडन प्रशासन ने कोविड-19 वैक्सीन के लिए जरूरी कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगा दी है। उनके प्रशासन की यह बात तो चलो मान भी लें कि वह पहले अमेरिका के हितों को ध्यान में रखेंगे और उसके बाद ही भारत की ओर ध्यान देंगे। परन्तु वह तो यह कह रहे हैं की ‘अमेरिका में सब को वैक्सीन पहले लगना पूरे विश्व के हित में है”! और जिस कच्चे माल की बात हो रही है, वह उनके पास उनकी ज़रुरत से ज़्यादा ही है, अतिरिक्त है!

जहां एक ओर अमेरिका यह कहता रहा कि वह भारत के साथ है, तो वहीं अब वह भारत के वैक्सीन कार्यक्रम को रोकने का प्रयास कर रहा है। क्या अमेरिका भारतीयों के खून से अपने हाथ रंगना चाहता है? या यह सब अमेरिकी वैक्सीन निर्माताओं जैसे फ़ाइज़र (Pfizer), जिसने बाइडन के राष्ट्रपति अभियान में बडा आर्थिक सहयोग किया था, को लाभ पहुँचाने के लिए किया जा रहा है?

यह एक बड़ा प्रश्न है क्योंकि ब्राउन पब्लिक हेल्थ में डीन और प्रोफ़ेसर आशीष के झा ने ट्वीट किया था कि अमेरिका में हमारे पास 35-40 मिलियन खुराकें अस्ट्रा ज़ेनेका वैक्सीन की रखी हैं जिनका प्रयोग अमेरिका कभी नहीं करेगा। वह पूछते हैं कि क्या हम यह भारत को उधार दे सकते हैं?

यह ट्वीट कई प्रश्न उठाता है! सबसे पहले तो यही कि क्या वास्तव में भारत अमेरिका पर भरोसा कर सकता है? परन्तु यह सत्य है कि इस बहाने कई लोगों को भारत पर प्रहार करने का अवसर प्राप्त हो गया है। भारत पर नहीं बल्कि केवल नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए वह पूरा गैंग सक्रिय हो गया है, जो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को हटाने के बाद अब नरेंद्र मोदी को हटाने की फिराक में है। इस समय जब मानवता के नाम पर भारत के साथ एकत्र होने का था, उस भारत के साथ जिसने सर्वे भवन्तु सुखिनः के सिद्धांत का पालन करते हुए अपनी वैक्सीन को लगभग सभी देशों में भेजा था। और आज वही देश जब अपनी सबसे बड़ी स्वास्थ्य त्रासदी से होकर गुजर रहा है, तो उसका दोस्त होने का दावा करने वाला अमेरिका आज भारत की पीठ पर खंजर घोंपने का कार्य कर रहा है।

एक खबर के अनुसार यह भी कहा जा रहा है कि कच्चे माल पर प्रतिबन्ध एक महीने तक भी जारी रह सकता है। कोविड-19 रिस्पांस टीम के वरिष्ठ सलाहकार और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शस डिसीज के डायरेक्टर डॉ एंथनी फौसी ने कहा है कि हमारे पास हाल फिलहाल भारत के लिए कुछ नहीं है। सीरम संस्थान के सीईओ अदार पूनावाला ने डॉ. एंथनी फौसी से यह अपील की थी कि वह इन प्रतिबंधों के नियमों में ढील दें।

पर अभी अमेरिका की ओर से भारत को निराशा ही हाथ आई है।

अमेरिका की हरकत पर भारत में लोगों की तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। ट्विटर पर लोग खुलकर अमरिकी प्रशासन के इस निर्णय के विरुद्ध लिख रहे हैं। इसी के साथ वह यह भी कह रहे हैं कि भारत हर युद्ध की भांति इस युद्ध से भी जीतकर आएगा, और एक बार पुन: वैश्विक प्रपंचों को हार का मुंह देखना होगा। जहां एक ओर औपनिवेशिक मानसिकता वाले लोगों के ट्वीट आ रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर उन लोगों के भी ट्वीट आ रहे हैं, जो भारत को हारते हुए नहीं देख सकते हैं। यदि बाइडन प्रशासन के लिए अमेरिका प्रथम है तो लोग अब कह रहे हैं कि अब भारत के लिए भी “भारत प्रथम” की नीति श्रेयस्कर होगी।

यह देखना रोचक होगा कि भारत कैसे इस आपदा से बाहर निकलता है जब अभी काफी बड़ी जनसँख्या को जहां वैक्सीन लगनी शेष है तो वहीं उसके उत्पादन में समस्या आने वाली है। परन्तु इस बहाने हर उस मीडिया का असली रूप दिखाई दे रहा है, जो कहने के लिए भारतीय है, पर दिल वामपंथी-उदारवादी बाइडन जैसे गैर-भारतीय नेताओं के लिए धड़क रहा है और अब ट्रम्प को हराने के बाद नरेंद्र मोदी अगला निशाना है। परन्तु यह भी ध्यान देने की बात कि क्या यह भारत को आगे बढ़ने से रोकने का षड्यंत्र है?


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