वामपोषित साहित्यिक आकाश में सूर्य थे नरेंद्र कोहली

हिंदी साहित्य का दूसरा नाम ही वामपंथी साहित्य है जिसे उन्होंने कथित प्रगतिशीलता के नाम के नीचे दबा रखा है।  यह प्रगतिशीलता इतनी प्रगतिशील है कि वह दूसरे विचार के किसी भी लेखक को लेखक ही मानने से इंकार कर देती है। वह यह नहीं मान सकती कि जो उसने रेखा खींच रखी है, उससे परे यदि कोई जाएगा तो वह लेखक ही नहीं है।

ऐसा वह कई लेखकों के साथ कर चुके हैं और करते रहते हैं। मध्यकालीन भक्ति कवयित्रियों से लेकर शब्दों के चितेरे निर्मल वर्मा एवं पौराणिक कथाओं के अनुकूलन को एक नया क्षितिज देने वाले नरेंद्र कोहली तक यह अनवरत चल रहा है।  रामकथा एवं महाभारत को अत्यंत रोचक एवं समय के अनुसार प्रस्तुत करने वाले नरेंद्र कोहली मूलत: व्यंग्यकार थे, जो बाद में पौराणिक चरित्रों की ओर मुड़ गए थे।

कल 81 वर्ष की आयु में नरेंद्र कोहली जी का देहांत हो गया।  उनका देहांत हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है।  परन्तु उनका जीवन यह संदेश देने के लिए पर्याप्त है कि कैसे हिन्दू मूल्यों के साथ जीवन जिया जाए। एवं कैसे उन्हें साहित्य की मुख्यधारा में स्थापित किया जाए।

कुछ वर्षों से ही नहीं, अपितु काफी वर्षो से राम कथा एवं महाभारत को गलत तरीके से ही नहीं, अपितु अपमान जनक तरीके से लिखा जा रहा था।  हर क्षण राम के प्रति अनादर की भावना का विस्तार साहित्य के माध्यम से हो रहा था। ऐसे में वर्ष 1975 में रामकथा पर आधारित “दीक्षा” प्रकाशित हुआ तो जैसे यह अनुभव होने लगा था कि साहित्य जगत में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है।

समस्या यही थी कि क्या यह एक व्यक्ति तक सीमित रह जाना था, या फिर यह एक परम्परा की तरह आगे बढ़ना था? क्या रामकथा से आगे बढ़कर भी कुछ और युवा नरेंद्र को लिखना था, यह भी एक प्रश्न था। उनके पाठक आज उनके जाने पर दुखी हैं। दरअसल वह वाकई दुखी हैं। वह इसलिए दुखी हैं क्योंकि वह उस लेखक से प्रेम करते थे, जो उनके राम से प्रेम करता था। जो उनके कृष्ण से प्रेम करता था और जो लेखक स्वयं के चरित्र में हिन्दू धर्म जीता था।

दीक्षा ही नहीं, अभ्युदय भी उन्होंने श्री राम पर लिखी।  जिस समय उन्होंने राम एवं कृष्ण जैसे नायकों को लेना आरंभ किया, उस समय ऐसे नायक एवं नायिकाओं का दारू था जो तत्कालीन मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे एवं समकालीन विमर्श उठाते थे। परन्तु उन्होंने ग्रंथों से नायक लेने आरम्भ कर दिये।

उस दौर में कल्पनाओं का प्रयोग कर नायकों का निर्माण किया जाता था, तो क्या हम कह सकते हैं कि नरेंद्र कोहली जी के उपन्यासों में कल्पनाएँ नहीं थीं, बल्कि कल्पनाओं का तो ओर छोर नहीं था। परन्तु उनकी कल्पनाओं में विकृति न होकर संस्कृति थी। उनमें संस्कृति की सुगंध थी। उनमें विदेशों से उठाई गयी समस्याएं या बिम्ब नहीं थे। उनमें संस्कृति थी। उन्हें भारतीयता थी। उनमें वह पहचान थी, जिस पहचान के लिए पाठक इतने वर्षों से तरस रहे थे। वह पहचान जो मुख्यधारा साहित्य से गुम हो गयी थी।

नरेंद्र कोहली द्वारा लिखी गयी राम कथा या महासमर या कृष्ण और सुदामा की मित्रता पर आधारित अभिज्ञान में कल्पना हैं, परन्तु वह कल्पना ऐसी थी जिसमें मूल में तथ्यगत छेड़छाड़ नहीं थी। जब आप उन्हें पढ़ना आरम्भ करते हैं तो ऐसा लगता ही नहीं है कि आप मूल नहीं पढ़ रहे हैं।

महासमर, महाभारत का ऐसा अनुकूलन है, जो पाठकों को जटिल महाभारत को अत्यंत सरल तरीके से प्रस्तुत कर देता है।  महासमर का हर खंड मूल्यों को प्रदर्शित करता है, न ही वह किसी चरित्र का मिथ्या महिमामंडन करता है और न ही वह किसी चरित्र को नीचा दिखाता है।  उनका हर पौराणिक उपन्यास कथाओं का वृहद् संसार है।  यह कथाएँ हर आयामों को खोलती हैं। यह कथाएँ कई नए विमर्शों को आरम्भ करती हैं, इतना ही नहीं वह पूर्व में स्थापित विमर्शों को ही आगे लेकर जाती हैं।

परन्तु प्रश्न यही उठता है कि पौराणिक हिन्दू चरित्रों को हिन्दू दृष्टि से रचने वाले नरेंद्र कोहली को साहित्य के वाम टोले ने कैसे स्वीकार किया होगा? क्या प्रशंसा की होगी या फिर उनका उपहास किया होगा।  एक समय में जब राजनीतिक विरोध के चलते कई लेखकों ने जब अपने अपने सम्मान को लौटाना आरम्भ किया था, एवं सरकार के बहाने देश को बदनाम किया जाने लगा था तो कई स्वरों ने इस कदम का विरोध करते हुए एक आन्दोलन किया था, जिसे मार्च फॉर इंडिया का नाम दिया गया था।

इसमें अनुपम खेर, मालिनी अवस्थी आदि ने भाग लिया था। तथा इस आन्दोलन को हिंदी के साहित्यिक समाज ने एक बेहद खतरनाक पद्धति बताया एवं इतना ही नहीं यह कहते हुए उपहास किया था कि इस आन्दोलन में कोई भी बौद्धिक नहीं था, लेखक तो कोई भी नहीं।  लेखक के नाम पर एक ही नामी नाम था, नरेंद्र कोहली जो कतई भी बौद्धिक नहीं थे और एक औसत लेखक हैं।

परन्तु जब भी वह नरेंद्र कोहली पर औसत लेखक कहकर उंगली उठाते थे तो जैसे वह अपने विदेशों से आयातित बिम्ब से भरी रचनाओं की कृत्रिमता ही छिपाते थे क्योंकि यह भी सत्य है कि भारतीय मूल्यों के संवाहक नरेंद्र कोहली सबसे ज्यादा बिकने वाले लेखकों में से एक थे और अमेज़न पर उनकी पुस्तकें टॉप चार्ट में रहती थीं और हमेशा रहेंगी क्योंकि यह सत्य है कि जब तक राम हैं, तब तक अब वाल्मीकि एवं तुलसीदास ही नहीं, अपितु नरेंद्र कोहली भी इस देश की चेतना में जीवित रहेंगे। ऋषि परम्परा के यह लेखक सदा स्मृति में रहेंगे एवं अमर रहेंगे।

कोरोना ने नरेंद्र कोहली को दैहिक रूप से छीन लिया है, परन्तु वह हमेशा रहेंगे पाठकों के मध्य, महासमर के साथ, दीक्षा के साथ, तोड़ो कारा तोड़ो, महासमर आदि सभी के साथ।


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