प्लाज्मा थेरेपी, कोरोना उपचार, और आत्महीनता बोध- भाग 1

आईसीएमआर के नए दिशानिर्देशों के अनुसार अब कोरोना महामारी के लिए प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग रोक दिया गया है।  अब कोरोना के उपचार के लिए प्लाज्मा का शोर नहीं मचाया जाएगा।  यद्यपि कोरोना की पहली लहर में भी प्लाज्मा थेरेपी को लेकर कई प्रश्न उठे थे, परन्तु बाद में कई और शोध किये गए और अध्ययन में यह पाया गया कि यह थेरेपी कोरोना के उपचार के लिए कारगर नहीं है, अत: उसे प्रयोग में न लाया जाए।

लोगों ने या कहें हिन्दुओं ने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। बिना किसी प्रश्न के! बिना यह पूछे कि जब यह प्रभावी नहीं थी तो अंतत: इसे प्रयोग क्यों किया जा रहा था? जब प्लाज्मा थेरेपी आरम्भ हुई थी, तब भी किसी ने यह नहीं प्रश्न किया था कि क्या इसकी कोई वैज्ञानिक प्रासंगिकता है? कितने रिसर्च ने इसे अनुमत किया है? हमने नहीं पूछा, प्रश्न करने का कोई सवाल ही नहीं! क्यों करना? आखिर विदेश से आया है, कथित रूप से सभ्य और आधुनिक पश्चिम से आया है, तो प्रश्न क्यों करना?

हमने आंकड़े नहीं मांगे? क्यों नहीं मांगे? क्योंकि हमें उन पर विश्वास है, हमें लगता है कि पश्चिम से आई है तो श्रेष्ठ ही होगी और हम स्वयं के मस्तिष्क एवं देह सहित जीवन को उन्हें समर्पित कर देते हैं और उनके लिए ऑब्जेक्ट या कहें गिन्नी पिग बन जाते हैं।  हम विशेषज्ञ तो क्या साधारण जागरूक व्यक्ति भी नहीं बनते! प्रश्न हमारे कहीं तहों में चले जाते हैं। पर हमारे प्रश्न जागते हैं, जब हमारे बीच से ही कोई व्यक्ति उठता है और हमारे समक्ष समाधान प्रस्तुत करता है। या कोई हमें हमारी जड़ों से जोड़ने का प्रयास करता है, तब हमारे सामने प्रश्न फुंफकार कर खड़े हो जाते हैं और हम अपनी शेष जड़ों को काटने के लिए एकदम तैयार हो जाते हैं।

जैसा हमने प्लाज्मा थेरेपी के प्रति दृष्टिकोण रखा, क्या उसका दस प्रतिशत विश्वास भी आयुर्वेद या कहें कोरोनिल में रखा? यहाँ तक कि हमने तो अपनी स्वदेशी विकसित वैक्सीन पर भी प्रश्न उठाए! क्या हमें स्वयं पर इतना अविश्वास है? हम पश्चिम से प्रमाणपत्र की चाह क्यों करते हैं? जैसे हमने अपने देश में विकसित वैक्सीन पर प्रश्न उठाए, जैसे हमने आयुर्वेद पर प्रश्न उठाए, वैसे हमने क्या प्लाज्मा थेरेपी पर उठाए?

प्लाज्मा के प्रति एक बार भी संदेह व्यक्त नहीं किया, जबकि बार बार यह कहा जा रहा था कि यह थेरेपी प्रभावशाली नहीं है। द न्यू इंग्लैड जर्नल्स ऑफ मेडिसिन्स (The New England Journal of Medicine) में अ रैंडमाइज्ड ट्रायल ऑफ कोन्वेलेसेंट प्लाज्मा इन कोविड -19 सीवीयर न्यूमोनिया (A Randomized Trial of Convalescent Plasma in Covid-19 Severe Pneumonia) में 228 रोगियों पर किये गए अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया था कि प्लेसबो प्रयोग करने वाले और प्लाज्मा लेने वाले रोगियों के बीच कोई भी महत्वपूर्ण अंतर नहीं है।

इसी शोध के साथ अन्य और अध्ययनों के हवाले से चिकित्सा क्षेत्र में 18 प्रमुख व्यक्तियों ने एक पत्र भारत सरकार के मुख्य साइंटिफिक सलाहकार को भेजा और इसकी प्रति इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रीसर्च (आईसीएमआर) के महानिदेशक एवं आल इंडिया इंस्टीट्युट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स), नई दिल्ली के निदेशक को भेजी।

उन्होंने लिखा कि हम देश में कोविड 19 के लिए प्लाज्मा के कुतर्की एवं गैर-वैज्ञानिक प्रयोग के विषय में चिंतित हैं। और उन्होंने भी कहा कि जब ऐसी थेरेपी का फायदा नहीं है तो इस विषय में दिशा निर्देश बनाए जाएं, ताकि रोगी, उनके परिवार आदि परेशान न हों। तमाम तरह के अध्ययनों के बाद सरकार ने अब प्लाज्मा थेरेपी को हटा दिया है। क्योंकि विशेषज्ञ ने कहा है कि प्लाज्मा के अतार्किक प्रयोग के कारण कोविड के और स्ट्रेन विकसित हो सकते हैं।

परन्तु प्लाज्मा थेरेपी पर एक बार भी प्रश्न नहीं उठाए गए और सोशल मीडिया इन्फ्ल्युएन्सर, जिनमें वामपंथी लेखक और कांग्रेसी कार्यकर्ता भी शामिल थे, इनकी व्यवस्था के लिए शोर मचाते रहे। जबकि प्लाज्मा के बाद भी लोग मरते रहे। कई पत्रकार भी प्लाज्मा मिलने के बाद नहीं रहे, परन्तु प्रगतिशील पत्रकारों ने एक बार भी इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न नहीं उठाया।

परन्तु आम भारतीय और प्रगतिशील पत्रकार अपनी स्वयं की धरोहर के प्रति इतना आत्महीनता से भरा हुआ है कि वह विदेशी प्रमाणपत्र की मांग अपने सदियों की परम्परा आयुर्वेद के लिए मांगने लगता है। और जैसे ही बाबा राम देव या कोई और भारतीय उपक्रमी यह बताने के लिए आगे आता है, कि कैसे आप इस रोग से बच सकते हैं, तो वह आलोचना करने के लिए तैयार हो जाता है। आम हिन्दू पूछता है कि “क्या इसे डब्ल्यूएचओ से मान्यता प्राप्त हुई है?” “क्या इसे आईसीएमआर ने मान्यता दी है?” “क्या यह अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुकूल है?” आदि आदि कई प्रश्न उठाए जाने लगते हैं।

सारी वैज्ञानिकता का पिटारा खुल जाता है। सारी जिज्ञासाओं का पिटारा खुल जाता है। यह जानते हुए भी कि जो बाबा रामदेव की कोरोनिल है वह बचाव हेतु है एवं यह जानते हुए भी कि कोविड 19 का कोई भी उपचार उपलब्ध नहीं हैं और सभी उपचार मात्र संक्रमण को कम करने के लिए हैं।

फिर भी चेतन भगत जैसे लोग कोरोनिल के बहाने आयुर्वेद पर आक्रमण करते हैं, जबकि मजे की बात यह है कि पूरी ज़िन्दगी आयुर्वेद, हिंदुत्व आदि को गाली देने वाले प्रगतिशील लेखक कोरोनिल एवं अन्य आयुर्वेदिक औषधियां प्रयोग कर रहे हैं।

फरवरी 2021 में जब कोरोनिल को आयुष मंत्रालय से प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ था कि वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से एक ऐसी औषधि है जिसे “कोविड 19 के लिए सहायक उपाय एवं इम्युनिटी बूस्टर के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।” तो ऐल्युपैथी को ही उपचार का एक मात्र माध्यम मानने वालों के बीच हंगामा हो गया था। इस प्रेस कांफ्रेंस में योग गुरु बाबा रामदेव ने कोरोनिल की विश्वसनीयता प्रस्तुत की थी एवं साथ ही इसमें स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन एवं परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी भी मौजूद थे।

फरवरी 2021 में कोरोनिल की लॉन्चिंग करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री हर्षवर्धन एवं योग गुरु बाबा रामदेव

इस प्रेस मीट में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री हर्षवर्धन के मौजूद रहने पर इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी और कहा था कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री हर्षवर्धन को “अवैज्ञानिक” आयुर्वैदिक टेबलेट कोरोनिल से दूर रहना चाहिए था, जिसे कोविड 19 के लिए पहली प्रमाण आधारित दवाई के रूप में प्रचारित किया गया था तथा आईएमए ने उनसे सफाई माँगी थी

इस पर दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन, जो आईएमए की ही एक राज्य शाखा है, ने आईएमए की आलोचना की थी और कहा था कि पतंजलि की कोरोनिल टैबलेट को मान्यता देने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री हर्षवर्धन पर हमला बोलना ठीक नहीं है। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन का कहना था कि यह सब सस्ती लोकप्रियता को उठाने के लिए उठाया गया कदम है।

एक प्रश्न यह उठता है कि जब आयुष मंत्रालय द्वारा आयुर्वेद को बढ़ावा दिया जाता है एवं उपचार की एक पद्धति माना जाता है तो आईएमए को आयुर्वेदिक उपचार से समस्या क्या है? आयुर्वेद हमेशा से ही निरोग होने पर जोर देता आया है। अभी जो हाल ही में डीआरडीओ ने कोविड -19 के लिए जिस 2deoxy D glucose (2 जी) के लिए आपात प्रयोग का अनुमोदन दिया है, उसका सुझाव भी सबसे पहले पतंजलि अर्थात बाबा रामदेव द्वारा ही एक शोध द्वारा दिया गया था कि 2डीजी वायरस पर सीधे आक्रमण करता है, जैसा योगगुरु बाबा रामदेव ने ट्वीट करके कहा था:

परन्तु ऐसा नहीं है कि हम भारतीयों में ही स्वयं को हीन समझने की प्रवृत्ति है। कोरोना पर सबसे प्रभावी आधुनिक चिकित्सा वाली वैक्सीन बनाने वाले भारत देश के प्रति विदेशी मीडिया का व्यवहार और भी अधिक अपमानजनक है।  वह खोज खोजकर ऐसे एकमात्र मामले लाते हैं जो भारत को दुनिया की नज़रों में और नीचा दिखाते हैं, जबकि वह प्रक्रियाएं समाज के एक नगण्य हिस्से द्वारा अपनी जा रही हैं। और हिन्दूफोबिया भारतीय वामपंथी मीडिया एवं अंग्रेजी मीडिया इसे ऐसे प्रस्तुत करता है जैसे यह पूरा हिन्दू समाज कर रहा है।

और यदि समाज के कोई लोग किसी मान्यता का पालन कर रहे हैं एवं किसी को हानि नहीं पहुंचा रहे हैं, तो समस्या किसी को क्या है? क्या “माई चॉइस” की अवधारण केवल और केवल नकाब और हिजाब या हिन्दू लड़कियों के देह प्रदर्शन तक ही है?

कोविड के बहाने हिन्दुफोबिया मीडिया को रोज़ नए मौके मिले और कुम्भ पर लिखकर जब मन नहीं भरा तो उन्होंने गुजरात में एक कुछ मुट्ठी भर लोगों द्वारा की जा रही एक प्रक्रिया को ही पूरे हिन्दू समाज का प्रतिनिधित्व बनाकर प्रस्तुत कर दिया और एक रिपोर्ट में लिखा कि कुछ लोग गौशाला जाते हैं एवं गौ मूत्र एवं गोबर में मिश्रण को देह में लगाकर योग करते हैं एवं फिर दूध या मट्ठे से स्नान करते हैं। हालांकि जिसका विरोध नेट यूज़र्स ने जमकर किया और उनके हिन्दूफोबिया को कोसा!

और रायटर्स में इसी आधार पर पूरी रिपोर्ट है कि डॉक्टर्स के अनुसार ऐसा हो सकता है, वैसा हो सकता है।  परन्तु केवल आशंका है, ऐसा कुछ हुआ नहीं है। फिर भी मान लेते हैं कि यदि आशंका ठीक भी है तो यह कार्य कितने लोग कर रहे हैं? क्या पूरा हिन्दू समाज ऐसा कर रहा है? नहीं? क्या जिन लोगों ने यह पद्धति की, वह कोरोना पोजिटिव हुए? नहीं? तो फिर क्या समस्या है?

जैसे ही रायटर्स की यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई, उसे हिन्दू फोबिक द प्रिंट ने लपक लिया और पूरी रिपोर्ट इस पर बना दी कि कैसे गोबर ब्लैक फंगस के खतरे बढ़ा सकता है। और उसमें गुरुग्राम के मेदान्ता अस्पताल की डॉ. नेहा गुप्ता से कहलवाया कि ब्लैक फंगस के मामले केवल उन्हीं स्थानों पर मिलेंगे जहां पर अवैज्ञानिक थेरेपी और मिथ हैं।”

और नागपुर के सेवन स्टार अस्पताल के सिर एवं गला कैंसर सर्जन और निदेशक डॉ शैलेश कोठालकर इसमें कह रहे हैं कि यह चिंताजनक ट्रेंड है और यदि डायबिटीज़ वाले मरीज जो देर से स्टेरेओइड लेते हैं और यदि यह प्रक्रिया अपनाते हैं तो उन्हें ब्लैक फंगस होने का खतरा है।

गुरुग्राम में नारायणा अस्पताल में आँख विभाग के प्रमुख भी इसे चिंताजनक बता रहे हैं।

परन्तु अभी तक ब्लैक फंगस के जो भी मामले आए हैं, उनमें से कोई भी मामला ऐसा नहीं आया है जिसमें यह प्रक्रिया अपनाने वाले व्यक्ति आए हों।

और प्रिंट की इसी रिपोर्ट में यह लिखा है कि डॉ. नेहा गुप्ता ही यह कह रही हैं कि गोबर और ब्लैक फंगस के बीच रिश्ता तो है पर अभी तक जो मामले सामने आए हैं, वह सभी मामले जलवायु, अस्पताल में बढ़ते बीजाणु, अनियंत्रित डायबिटीज़ वाले मरीजों और स्टीरेओइड के इस्तेमाल से सम्बन्धित हैं।”

अर्थात न ही तो रायटर्स और न ही द प्रिंट ने एक भी प्रमाण इस सम्बन्ध में प्रस्तुत किया कि गोबर वाली प्रक्रिया से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, और न ही अपनी रिपोर्ट में यह प्रमाणित कर पाए कि इससे ब्लैक फंगस हो भी रहा है। यद्यपि हम इस प्रक्रिया का समर्थन नहीं करते हैं। फिर भी एक छोटे से समूह जिसमें मात्र बीस या पच्चीस ही लोग सम्मिलित हैं, उनके आधार पर पूरे हिन्दू समाज को बदनाम करने की उनकी नियत पर प्रश्नचिन्ह अवश्य खड़े होते हैं।

इस पूरे लेख में केवल आशंका व्यक्त की गयी है कि इन दोनों के बीच सम्बन्ध अवश्य है, परन्तु अभी तक मामले नहीं पाए गए हैं।

और पश्चिमी मीडिया जिसने प्लाज्मा थेरेपी के बाद भी लोगो के मारे जाने पर कोई प्रश्न नहीं किया, कोई शो नहीं किया, कोई आंकड़े नहीं प्रस्तुत किए, वह एक काल्पनिक भय का पहाड़ खड़ा करने चला है और ब्लैक फंगस के लिए उस कारण को उत्तरदायी ठहरा रहा है, जिसका दूर दूर तक कोई भी लेना देना नहीं है।

यही प्रिंट जैसे लोग हैं जो किसान आन्दोलन के दौरान भीड़ एकत्र करने को क्रांतिकारी कदम बता रहे थे और बार बार यही कह रहे थे कि कोरोना और कुछ नहीं है बस किसान आन्दोलन को समाप्त करने की सरकार की साज़िश है। इतना ही नहीं किसान आन्दोलन में सरकार के खिलाफ भड़काने वाले क्रांतिकारी पत्रकार अजित अंजुम तो पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान बिना मास्क के घूमे थे।

तस्वीर अजित अंजुम के यूट्यूब चैनल से ली है

क्यों?

किसान आन्दोलन में जम कर भीड़ लगाने वाले क्रांतिकारी पत्रकार वही पत्रकार थे जो नागरिकता संशोधन क़ानून में भी सरकार के विरोध में चले गए थे और कोरोना की प्रथम लहर में कोविड प्रोटोकॉल के अंतर्गत प्रदर्शन कर रहे थे।

यही क्रांतिकारी पत्रकार और लेखक आयुर्वेद और बाबा रामदेव पर प्रश्न उठा रहे थे और हिन्दुओं को बार बार हीन भावना से भर रहे थे, और यही लोग हैं जो प्लाज्मा के लिए शोर मचा रहे थे, एसओएस बनवा रहे थे, और हाँ एक बार भी उन मौतों के बारे में नहीं बोले जो एल्योपैथ उपचार के बाद हुई थीं! हाँ शोर अवश्य मचाया परन्तु दवाई की कमी को लेकर परन्तु क्या किसे की मृत्यु किसी ओवरडोज़ से तो नहीं हुई है, ऐसे असहज करने वाले प्रश्न नहीं पूछे गए!


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