अब बात राजनीति की नहीं, हिन्दुओं के अस्तित्व की है!

पश्चिम बंगाल में जो कुछ भी हो रहा है, उसे मात्र राजनीति कहना अब मूर्खता पूर्ण कदम होगा। पश्चिम बंगाल में चुन चुन कर हिन्दुओं को मारा जा रहा है। वह हिन्दू किसी भी दल का हो, उसकी पहचान केवल और केवल हिन्दू ही है। परन्तु पारिवारिक समूहों में आज भी लोग इस गंभीर विषय पर बात नहीं करना चाहते हैं। वह इस विषय पर अपने बच्चों के साथ बात करना ही नहीं चाहते हैं कि हमारे अस्तित्व के सामने आखिर खतरा क्या है? हम उन्हें इतिहास की जड़ों में लेजाकर बताना ही नहीं चाहते हैं कि आखिर एक समय में पूरे विश्व में प्रतिष्ठित हिन्दू अब जरा से भूखंड में भी सुरक्षित नहीं हैं?

यह असहज करने वाले प्रश्न हैं, जिसे बचकर लोग भाग जाते हैं। अफगानिस्तान से भागकर आए, पाकिस्तान से भाग आए, बांग्लादेश से भाग रहे हैं,  कश्मीर, कैराना और मेवात से तो हाल ही में भागे हैं, और पश्चिम बंगाल और केरल से भी भागने की फिराक में हैं। ऐसा इसलिए होता है कि हमारे लिए हमारे अस्तित्व का कोई मोल है ही नहीं। हमारे लिए हमारे हिन्दू होने का मोल नहीं है। और ऐसा एक बार में नहीं हुआ है, ऐसा हुआ है वर्षों के बौद्धिक आक्रमण से, जिसके खतरे को कोई अभी भी समझने के लिए तैयार नहीं है और जैसे ही हम आपस में बात करने चलते हैं “पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं के साथ यह हुआ,” तो हमारे परिवार से ही उत्तर आता है “नो पॉलिटिक्स प्लीज़! हिन्दू हो या मुसलमान, दोनों एक ही हैं।”

सही में दोनों एक ही तो हैं। जैसा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से कहा जाता है कि इस विशाल देश की भूमि पर रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। फिर हिन्दू और मुसलमान जैसा विमर्श ही समाप्त हो जाता है। क्योंकि हर कोई भौगोलिक रूप से हिन्दू ही हो गया, बस पूजा की पद्धति तो बदली? अर्थात इस देश में रहने वाला मुसलमान भी भौगोलिक हिन्दू ही है!

जो राम और कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि देवी-देवताओं की पूजा तथा विभिन्न ऋषि-मुनियों-संतों की स्तुति करे वह धार्मिक हिन्दू है, जो अपनी हिन्दू परम्पराओं एवं जड़ों से जुड़ा हुआ है। उसके लिए राम जगत के राजा राम है, इस पूरी सृष्टि के स्वामी हैं, साक्षात् भगवन विष्णु के अवतार हैं। परन्तु एक ओर वह लोग हैं जो सृष्टि के कर्ताधर्ता प्रभु श्री राम को घटाकर इमामे-हिन्द साबित करने लगते हैं और अयोध्या में जन्मे प्रभु श्री राम को महज एक इमाम तक सीमित करते हैं। एवं ऐसा कहने में वह गर्व का अनुभव करते हैं। अब ऐसे में कई प्रश्न एक बार फिर से सिर उठाते हैं कि क्या प्रभु श्री राम को सृष्टि का स्वामी मानने वाले और महज इमाम मानने वाले क्या समान वैचारिक भूमि पर खड़े हो सकते हैं? यदि हाँ, तो कैसे?

और एक जो सबसे बड़ा प्रश्न उभर कर आता है कि यदि सभी हिन्दू हैं तो पश्चिम बंगाल में क्या हिन्दू ही आपस में लड़ रहे हैं? क्या एक धार्मिक हिन्दू को एक भौगोलिक हिन्दू अर्थात मुसलमान मार रहा है? ऐसे कई प्रश्न है, जो बार बार मस्तिष्क को मथते हैं।

सच में हालांकि ऐसा नहीं है कि जिन्होनें भाजपा के कैडर या धार्मिक हिन्दुओं पर हमला किया वह सभी मुस्लिम थे, हाँ अधिकांश उसमें मुस्लिम ही थे, जैसा कई इन हमलों के शिकार लोगों ने बताया। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वाकई मुस्लिमों अर्थात भौगोलिक हिन्दुओं को भाजपा से या फिर धार्मिक हिन्दुओं से घृणा है, और वह इसलिए उस भाजपा को वोट नहीं देते जिसे वह धार्मिक हिन्दुओं का प्रतिनिधि मानते हैं? यह प्रश्न रोचक इसलिए है कि भाजपा का एक मोर्चा है जिसे अल्पसंख्यक मोर्चा कहते हैं। इस मोर्चे का कार्य है भाजपा की ओर से चलाई जा रही नीतियों का प्रचार प्रसार अल्पसंख्यक समुदाय में करना एवं अपने समुदाय के वोट इस दल को दिलवाना। अल्पसंख्यक मोर्चे में भाजपा भी अन्य दलों की भांति केवल और केवल मुस्लिमों को ही रखती है। यह समझ नहीं आता कि जब अल्पसंख्यकों में जैन, बौद्ध, आदि अन्य धर्म भी हैं तो अल्पसंख्यक मोर्चे में एक ही मजहब का वर्चस्व क्यों है?

इससे भी बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या वह मोर्चा वाकई में भाजपा को वोट दिलवाता है? यह प्रश्न इसलिए उठता है कि ऐसा एक नहीं कई बार हुआ है कि भाजपा को कई ऐसे बूथों पर शून्य वोट मिले हैं, जिन पर उसने बहुत तामझाम के साथ अल्पसंख्यक मोर्चे के किसी पदाधिकारी को बूथ एजेंट बनाया था। यहाँ तक कि उस कार्यकर्ता का भी वोट नहीं प्राप्त हुआ जिसे उन्होंने बूथ एजेंट बनाया था! फिर प्रश्न यह उठता है कि ऐसे में उसके वोट कहाँ गए? जो भौगोलिक हिन्दू अर्थात अल्पसंख्यक कार्यकर्ता भाजपा के लिए वोट एकत्र करने का दावा करते है एवं बड़े बड़े नेताओं के साथ फोटो सेशन कराकर यह भावना उत्पन्न करते हैं कि भाजपा को हिन्दुओं और मुस्लिमों दोनों की ही पार्टी माना जाए, वह एक भी सीट जीतवाने में विफल क्यों रहते हैं?

इतना ही नहीं, प्रश्न भाजपा से जुड़े हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से भी है कि उनका मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, जो कि संघ से जुड़े हुए इन्द्रेश कुमार संचालित कर रहे हैं, उसके सदस्य कहाँ जाते हैं? समय आ गया है कि अब इन्द्रेश कुमार जी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सदस्यों से यह प्रश्न करें कि क्या वह वाकई वोट देते हैं भाजपा को? और कितने?

असम में भी पश्चिम बंगाल के साथ ही चुनाव हुए थे। और उनमें भाजपा ने विजय प्राप्त की है, इस जीत में सबसे बड़े नायक बनकर उभरे हैं असम के मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा! हिमंत ऐसे नेताओं में सम्मिलित हैं जिनकी सोच पूरी तरह से स्पष्ट है।  वह जानते हैं कि मदरसों की कट्टरपंथी सोच कहीं न कहीं समाज में विष घोल रही है अत: वह पहले ही असम में सरकारी मदरसे बंद करा चुके हैं।

असम भी पश्चिम बंगाल जैसा ही सीमावर्ती राज्य है और घुसपैठ से परेशान है। अली और कुली के समन्वय वाला समय देख चूका है और जब असम की अपनी पहचान ही जैसे समाप्त होने की कगार पर आ गयी थी, तब जनता इस सत्य को समझी कि कोई भौगोलिक हिन्दू जैसी अवधारणा नहीं है एवं वह वापस धार्मिक हिन्दू वाली पंक्ति में वापस आई। परन्तु एक अहम कदम सम के चुनावों में, जिसमें चुनावों के बाद अल्पसंख्यक मोर्चे को समाप्त कर दिया।

ऐसा करने के पीछे बहुत ही मजेदार कारण है। कारण यह है कि भाजपा के असम प्रदेश अध्यक्ष रंजीत दास ने कहा कि “असम के अधिकाँश मुसलमान बहुल बूथों पर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के बीस बीस कार्यकर्त्ता हैं, पर फिर भी वहां पर भाजपा को बीस से भी कम वोट मिले”

अर्थात पार्टी के कुछ अल्पसंख्यक कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी को वोट नहीं दिया! यह अपने आप में एक बहुत बड़ा संकेत है कि कथित भौगोलिक हिन्दू धार्मिक हिन्दू वाली पार्टी से कितनी घृणा करते हैं। और यह घृणा दल विशेष से न होकर उनके अस्तित्व से है। इसे समझने की आवश्यकता है। यह घृणा आज की नहीं है, यह घृणा उस एक विचार से जुडी है कि यह धरती एक मजहब विशेष की ही है।और यह बात है आम मुस्लिमों के मन में कट्टरपंथी विचारधारा तथा मज़हबी उन्माद पैदा करने वाले मदरसे-मस्जिद तथा जमात-ए-इस्लामी, देवबंद जैसे संघठन।

इसी कारण भौगोलिक हिन्दू (मुसलमान) भूगोल के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं एवं भारत से न जोड़कर सऊदी अरब से जोड़ते हैं, जबकि धार्मिक हिन्दू अपनी पहचान मथुरा, काशी और अयोध्या से जोड़ता है। भौगोलिक हिन्दू इतनी उदारता नहीं दिखा पाता कि सदियों पहले कई आतताइयों ने हिन्दुओं के मंदिरों को तोडा था, तो उसमें से जो मुख्य तीन मंदिर है, उन्हें वापस कर दें! नहीं, वह इतनी उदारता नहीं दिखाते, और जब कोई पार्टी खुलकर इन मंदिरों की बात करती है तो पहचान का द्वन्द लिए कैसे कोई उस पार्टी का समर्थन कर सकता है, समझ नहीं आता! हालांकि आंकड़े बताते हैं कि भाजपा को लोकसभा में जरूर 8-10 प्रतिशत मुस्लिमों का वोट मिलता है, पर वह अधिक उल्लेखनीय नहीं है क्योंकि शेष वोट वहीं जाते हैं, जो भाजपा को हरा सकता है।

तो यह कहा जा सकता है कि अब समय आ गया है कि इन सब विषयों पर खुलकर संवाद होना चाहिए कि कौन भौगोलिक हिन्दू हैं (मुसलमान) और कौन धार्मिक हिन्दू हैं। और क्यों धार्मिक हिन्दू इस भारत के रूप को बनाए रखने के लिए आवश्यक है, क्योंकि जैसे ही भौगोलिक हिन्दुओं की संख्या अधिक होती है, वहां पर धार्मिक हिन्दुओं के लिए प्रवेश बंद हो जाता है, और नारकीय स्थिति हो जाती है जैसा हम अपने ही देश के दो अलग हुए हिस्सों में देख रहे हैं।

पश्चिम बंगाल, असम और केरल तीनों ही स्थानों पर भाजपा को उस वर्ग ने एकदम नकार दिया है जिसका वोट पाने के लिए वह अपने कोर वोटर्स का दिल दुखाती है एवं यह भी स्पष्ट हुआ है कि हमें इस बात की चर्चा बार बार करनी चाहिए कि धार्मिक हिन्दू के कारण ही आज न केवल भाजपा जैसे दल बल्कि यह पूरा देश साँसें ले रहा है।  संख्या के अनुपात के अंतर के विषय में भी चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि यहाँ पर कई पत्रकार बरगलाने के लिए घुमते रहते हैं कि “यदि देश में मुस्लिम अधिक हो भी गए, तो क्या हो जाएगा?”

ऐसे में वह पकिस्तान और बांग्लादेश में कटते हुए हिन्दू नहीं देखते, वह कश्मीर से भगाए गए हिन्दू नहीं देखते, वह कैराना नहीं देखते और हाँ, वह पश्चिम बंगाल में चुनावों के बाद होने वाली हिंसा भी नहीं देखते। और न ही चाहते हैं कि उनके एजेंडे के अतिरिक्त लोग कुछ और देखें, यदि लोग देखते हैं तो अपील करते हैं कि भगवान के लिए आप सोशल मीडिया न देखें!

हमारे मस्तिष्क पर जब तक ऐसे लोगों का कब्ज़ा रहेगा तब तक धार्मिक हिन्दू हारता रहेगा और ऐसे लोग जीत न पाएं, इसलिए आवश्यक है यह संवाद होना कि धार्मिक हिन्दू, अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ हिन्दू, अपने मूल्यों से जुड़ा हुआ हिन्दू ही इस देश को अक्षुष्ण रख पाएगा।


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