हिन्दुओं में विस्मृति का अभिशाप

भगवान श्री कृष्ण विस्मृति को मनुष्य के लिए सबसे बड़ा वरदान बताते हैं क्योंकि यदि उसे हर जन्म की स्मृति रहेगी तो मनुष्य पागल हो जाएगा। परन्तु यह विस्मृति का वरदान मात्र जन्मों के सम्बन्ध तक सीमित रहता तो उचित रहता, तथा वरदान रहता। अब यह उससे आगे जा रहा है।  एवं हिन्दुओं के लिए अभिशाप बन रहा है।  कल 16 अप्रेल था। एक वर्ष पूर्व 16 इस दिन ऐसी घटना हुई थी, जिसे विस्मृत करना जैसे हिन्दुओं के अस्तित्व पर प्रहार था। पर हमने विस्मृत कर दी।

16 अप्रेल 2020 को आखिर क्या ऐसा हुआ होगा जो हिन्दुओं के अस्तित्व के लिए इतना आवश्यक था। वैसे तो हिन्दू समाज कई चीज़ें विस्मृत कर बैठा है। जैसे 90 के दशक में होने वाला कश्मीर में हुआ कश्मीरी हिन्दुओं का नरसंहार, मोपला में हुए हाल ही में हुए दिल्ली दंगे आदि आदि! उन्हें कुछ याद नहीं रहता, कोई घटना होती है तो वह एक क्षण के लिए जागते हैं और फिर सो जाते हैं। विस्मृति में खो जाते हैं।

एक वर्ष पूर्व महाराष्ट्र में पालघर में जो हुआ था, वह साधारण घटना नहीं थी। वह घटना हृदय को भीतर तक आक्रोशित करने के लिए पर्याप्त थी।   परन्तु हमने मात्र शोर मचाया और शांत होकर बैठ गए। शनत बैठ जाना हिन्दुओं की नियति है क्योंकि हमने स्वयं को सरकार की दया पर सौंप रखा है। अपनी रक्षा के लिए जैसे हम एक कर चुका रहे हैं, और उस पर भी हमारी रक्षा नहीं हो रही है। बल्कि हमारे मंदिरों आदि पर अत्याचार ही हो रहे हैं।

बात फिर घूमफिर कर कल की! एक वर्ष पूर्व दो निहत्थे साधु स्वामी कल्पवृक्ष गिरि, और स्वामी सुशील गिरि जो जूना अखाडा के साधु थे, वह अपने ड्राइवर  के साथ अपने गुरु के अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने के लिए गाड़ी से मुम्बई से सूरत जा रहे थे।  परन्तु उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि यह उनकी अंतिम यात्रा ही नहीं अपितु हिन्दू धर्म के लिए भी एक ऐसी रात्रि बन जाएगी, जिससे उबरना असंभव सा हो जाएगा।  मार्ग में कुछ लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। यह घेरना कोई साधारण घेरना नहीं था।  यह एक दुर्भाव के साथ घेरना था। जैसे कुछ इरादे खतरनाक हों।  उनके हाथों में हथियार थे।  वैसे तो साधु संत भीड़ से घिरे ही रहते हैं। उनके पास होता ही क्या है, बस धर्म और उपदेश! क्योंकि आर्म्स एक्ट हिन्दुओं से उनकी रक्षा के लिए अस्त्र रखने का अधिकार छीन चुका है। वह अपनी रक्षा के लिए पुलिस का सहारा ले सकते हैं। सो उन साधुओं ने भी किया। पर क्या हुआ?

क्या पुलिस ने उनकी सहायता की? क्या पुलिस उनका हाथ थामकर यह बताने में सक्षम हुई कि वह उन्हें सुरक्षा देगी या फिर वह उनके लिए कुछ करने में सक्षम भी होगी? या वह उन साधुओं के बहाने पूरे देश के हिन्दुओं को यह संकेत देना चाहती थी कि भीड़ के सम्मुख वह भी कुछ नहीं! प्रश्न कई हैं, पर प्रश्नों के उत्तर कहीं नहीं! जिसे खोजना है वह शांत होकर कुम्भ मेला न हो, इसके लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। वह कुम्भ के बहाने साधुओं और सन्यासियों को कोस रहा है और हिन्दू समाज हर वह कार्य कर रहा है जिससे उसके धर्म से लोग बिदक जाएं। और फिर ऐसे में एक दिन पालघर जैसा कुछ हो जाता है, और रह जाता है शेष पछतावा या कहें पछतावा भी नहीं!

तो शांत होकर कुम्भ मेला न हो, इसके लिए एड़ी चोटी का जोर लगाने वाले हिन्दू एक वर्ष पूर्व हुए उस जघन्य हत्याकांड पर चुप हैं, जो हत्याकांड मात्र हत्या न होकर आपके समूचे अस्तित्व पर आक्रमण था। वह दो साधु जिस रंग का वस्त्र पहने थे, वह धर्मार्थ ही पहना जाता है, और जब उस वस्त्र पर आक्रमण हो और वह भी निर्दोष साधु पर तो यह सबसे बड़ा पाप है, इससे बड़ा पाप कोई हो नहीं सकता है! वह वीडियो अब तक आँखों के सामने है और दर्द भी उतना ही जीवित है, जब वह बेचारे निरीह वृद्ध संत पुलिस का हाथ थामे थे, तो उनके अबोध शिशु जैसे निश्छल नेत्र, जैसे एक विश्वास से भरे हुए थे। उन्हें यह विश्वास था कि वह अपने रक्षकों के साथ हैं।

पर हाय ऐसा नहीं हुआ! जो हुआ, वह सबसे सर्वनाश का सबसे नंगा नाच था। उससे वीभत्स कुछ हो नहीं सकता था। उन्हें उन्हीं पुलिस वालों ने भीड़ के हवाले कर दिया, जो उन्हें मारने आई थी। और फिर वह निर्दोष पुलिस के सामने पिटते रहे। जैसे ही जाते वह पुलिस वाले के पास, वह उनका हाथ झिटक देते! और फिर उन्हें समझ आ गया। वह दोनों संत उस दिन चले गये, पर सम्पूर्ण मानवता पर यह प्रश्न छोड़कर गये कि उनका दोष क्या था? यद्यपि बाद में यह कहानी चलाई गयी कि बच्चा चोरी की आशंका के मध्य लोगों ने यह किया? परन्तु यदि बच्चा चोरी की अफवाह थी तो उस अफवाह से निबटना केवल और केवल पुलिस का कार्य था, वह प्रश्न करती! फिर उस हिंसक भीड़ के सम्मुझ झोंकने का क्या अर्थ था?

और हिन्दुओं में जो आक्रोश उत्पन्न हुआ, वह एक माह में ही ठंडा क्यों हो गया? एक वर्ष बीतते बीतते वह ऐसे ठहरा हुआ पानी हो गये हैं, जैसे जमी हुई काई, जिस पर हमारी आने वाली पीढ़ी फिसल तो सकती है, पर निर्माण नहीं कर सकती!

पालघर जैसी घटनाओं को हमें भूलने नहीं देना है, उसे जाग्रत रखना है अपने हृदय में! उन दो निर्दोष साधुओं की हत्या को भूलने का अर्थ होगा, स्वयं के अस्तित्व को सदा के लिए मिटा देना!

यद्यपि पुलिस की कार्यवाही चालू है, परन्तु प्रमाणों के अभाव में लोग छूटते जा रहे हैं। हम यह आशा करेंगे कि उन दोनों ही निरीह संतों को न्याय मिलेगा, अवश्य मिलेगा!  एवं हिन्दुओं को विस्मृति के इस अभिशाप से उबरना ही होगा, अन्यथा वह स्वयं विस्मृत हो जाएंगे! विस्मृति के इस अभिशाप ने इतने विशाल भूभाग को समेट दिया है, यदि अभी भी न चेते, तो शेष नहीं रहेगा कुछ!


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