“पेशवा थे मराठा साम्राज्य के पतन का कारण” – कांग्रेस मंत्री नितिन राउत द्वारा राम मंदिर समारोह पर ताना कसते हुए बयान

महाराष्ट्र के एक और ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनेता ने राम मंदिर भूमि पूजन समारोह के लिए हिंदुओं का उपहास उड़ाया है। एनसीपी अधिनायक शरद पवार के यह पूछने के बाद कि ‘राम मंदिर बनाने से क्या कोरोना दूर होगा?’, एक अन्य कांग्रेस विधायक ने ब्रह्मणों को कोसने और अपने इतिहास को विकृत करने का निर्णय किया है ।

हाल के दिनों मे राजनीतिक विमर्श ब्राह्मणों के प्रति घृणा से युक्त हो चला है, विशेष रूप से महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ एमवीए (महा विकास आघाडी) सरकार में शामिल दलों द्वारा। ब्राह्मणों के लिए घृणा को बढ़ावा देने का कार्य अग्रणी रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही दशकों से करती आ रही  है, जिसने सामान्य हिंदुओं के लिए अपनी उपेक्षा और अवमानना को हमेशा से व्यक्त किया है। इसलिए महाराष्ट्र सरकार के ऊर्जा मंत्री और नागपुर के संरक्षक मंत्री, नितिन राउत, के घृणात्मक बयान में कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है। विडंबना यह है कि नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का मुख्यालय है. ये एक ऐसा संगठन है जिस पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस यह आरोप लगाती  रही है कि वह जातिवाद से प्रेरित घृणा को बढ़ावा देता है – अब इससे बड़ा पाखंड और क्या होगा!

हाल ही में किए गए एक ट्वीट में राउत ने यह आरोप लगाया कि छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा अपने पसीने और रक्त बहा कर स्थापित किये गए मराठा साम्राज्य को पेशवा, जो ब्राह्मण थे, द्वारा अनुष्ठान करने वाले “पंचपात्र” में डुबो दिया गया था, यानि उसका अंत कर दिया गया था। उनके अनुसार यह एक ‘ऐतिहासिक तथ्य’ है , और हमेशा की तरह अपने इस दावे का कोई भी साक्ष्य-प्रमाण नहीं है उनके पास ।

उनका यह ट्वीट 5 अगस्त को होने वाले अयोध्या राम मंदिर शिलान्यास समारोह के संदर्भ में विवरण देते हुए एक समाचार लेख के संदर्भ में किया गया है। हालांकि दोनों के बीच संबंध स्पष्ट नहीं है किंतु यह उपहास उन हिंदुओं पर है जो अपने मंदिरों का उत्सव मना कर अपने धर्म का पालन करते हैं, जिसकी तुलना ‘कर्मकांडी’ ब्राह्मण यानी पेशवाओ से की गई है जो उनके मुताबिक, पूरे मराठा साम्राज्य के पतन का कारण बने। एक बात तो साफ है कि पेशवाओ को हारे हुए, कमजोर, खलनायक के रूप में चित्रित करने के उद्देश्य से यह एक ऐतिहासिक रूप से गलत दावा है।

एक ऐसी पार्टी, जो चिल्ला चिल्ला कर यह कहती रही, कि “राहुल गांधी एक जनेऊधारी ब्राह्मण” है और जिसने अध्यक्ष राहुल गांधी को हास्यास्पद रूप से “दत्तात्रेय गोत्र का कश्मीरी ब्राह्मण” घोषित कर रखा है, उसके लिए यह बहुत ही आश्चर्यजनक बात है कि इसी पार्टी के राउत कट्टर ब्राह्मण-विरोधी भावना रखते हैं और सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी करते हैं।

सौजन्य -इंडिया. कॉम

वैसे राउत, जो संयोग से कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष भी हैं, हमेशा ब्राह्मण विरोधी बयान देने के लिए जाने जाते हैं। हिंदूपोस्ट ने पहले भी राउत की मानसिकता को उजागर किया था जब उन्होंने रामपुर में एक सीएए विरोधी रैली में बात की थी। उस समय राउत ने कहा था – “ब्राह्मण, जो खुद विदेश से आए थे, क्या वह हमें सामान्य ज्ञान सिखाएंगे? वे हमें प्रमाण पत्र (पहचान) प्रस्तुत करने के लिए कहेंगे? मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगा।” यह विचार कि ब्राह्मण और अन्य ‘उच्च’ जाति के हिंदू ‘आर्य’ हैं, जिन्होंने भारत के मूल निवासियों, यानी ‘निचली’ जातियों और द्रविड़ों को अधीन करने के लिए आक्रमण किया था— ये उस आर्य आक्रमण सिद्धांत[एआईटी] के विचार हैं जिसकी अब पोल खुल चुकी है.

उनका पिछला बयान और हालिया ट्वीट, इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि राउत को इतिहास का बिल्कुल ज्ञान नहीं है। एआईटी कई अध्ययनों, पुरातत्विक, भाषाई और अनुवांशिक अध्यन के मद्देनजर अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। मराठों का इतिहास बताता है कि पेशवा मराठा शासक के प्रति निष्ठावान थे, और जिन्होंने विभिन्न दिशाओं से उत्त्पन्न संकटों के बावजूद मराठा साम्राज्य को बचाने के साथ-साथ आगे भी बढ़ाया था। छोटी और संकीर्ण बुद्धि के लोग यह नहीं समझ सकते कि किसी भी साम्राज्य या सभ्यता में वृद्धि तभी होती है जब नई पीढ़ी अपने पूर्वजों द्वारा रखी गई नींव पर आगे निर्माण करती है। पहला पेशवा खुद छत्रपति शिवाजी द्वारा नियुक्त किया गया था और बाजीराव प्रथम (48 लड़ाई में अपराजित), बालाजी बाजीराव, माधवराव द्वितीय जैसे पेशवाओं के अधीन ही मराठा साम्राज्य का विस्तार होता चला गया, और 1800 तक भारत का सबसे गौरवशाली साम्राज्य बन कर उभरा, यहां तक कि इसने 1775-1782 के पहले मराठा-ऐंग्लो युद्ध में अंग्रेजो को भी पराजित करने का गौरव प्राप्त किया। लेकिन कार्यसूची जब ब्राह्मण विरोधी है तो तथ्य क्या मायने रखते हैं?

पेशवा-मराठा -ब्राह्मण
चित्र सौजन्य -HEM NEWS AGENCY

प्रत्यक्ष रूप से तो यह ब्राह्मण विरोधी प्रचार की तरह लगता है, लेकिन इसका वास्तविक निशाना हिंदू धर्म है—जिसे हिन्दुओं से घृणा करने वालों ने मौका मिलते ही बिना आधार के “ब्राह्मणवादी धर्म” बताने में कोई कसार नहीं छोड़ी। इस तरह की विचारधारा ने हाल के दिनों में महाराष्ट्र में राजनीतिक विमर्श पर कब्जा कर लिया है, और हिंदू विरोधी, ब्राह्मण विरोधी बयानों को सार्वजनिक क्षेत्र में फिर से सुदृढ़ किया जा रहा है।

हाल ही में एक प्रोफेसर विलास खरात ने भी हिंदूओं और विशेष रूप से ब्राह्मणों के विनाश का आव्हान करते हुए एक बयान जारी किया था। उन्होंने ब्राह्मणों को ‘आक्रमणकारी, षड्यंत्रकारी और विदेशी’ करार दिया था। विलास खरात BAMCEF (अखिल भारतीय पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी महासंघ) के सदस्य हैं और भारतीय पत्रकारिता संघ के प्रभारी हैं। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय प्रभारी भी हैं।

ब्राह्मण विरोधी और हिंदू विरोधी वाद-विवाद समाज में कलह के बीज बोने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है। कांग्रेस हमेशा दोहरा चरित्र ही दिखाता रहा है, चाहे वह ‘जनेऊ धारी ब्राह्मण’ राहुल गांधी का मंदिर की दौड़ हो या यूपी में उनकी बहन प्रियंका द्वारा रुद्राक्ष माला पहनकर वोट मांगने की रणनीति। पार्टी के कार्यकर्ता अपने नेता की तरह पाखंड के रास्ते पर ही चलते हैं और इसलिए हम अक्सर कांग्रेस के विभिन्न नेताओं को बंदर की तरह उछल-कूद करते हुए देखते हैं।

ऐसा लगता है कि हिंदू एकता के अलावा इस मानसिकता को कोई नहीं बदल सकता। इस बीच, राउत जैसे राजेनेताओं को ये सलाह है कि जातिगत घृणा को तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करने से पहले अपने इतिहास के ज्ञान पर ध्यान दें।

(रागिनी विवेक कुमार द्वारा इस अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद)


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