एजेंडा से संचालित वामपंथी एवं प्रगतिशील सिस्टरहुड

“सिस्टर हुड अर्थात बहनापा! वामपंथी फेमिनिज्म में फैला हुआ एक बेहद आम शब्द, जो यह दावा करता है कि दुनिया की सारी औरतें एक हैं, बहनें हैं! और हमें एक दूसरे पर होने अत्याचारों के खिलाफ खड़ा होना है! कितना प्यारा सपना है, सही में सपना ही तो है। यह सपना वामपंथी फेमिनिज्म दिखाता है। एक ऐसा गुलाबी सपना जिसके गुलाबीपन में बंधकर लडकियां चली आती हैं, खुद को शिकार बनाने के लिए!

सिस्टरहुड के विषय में Ntozake Shange ने कहा है कि सिस्टरहुड बहुत जरूरी है क्योंकि हम सभी को एक फैसला लेना है। हमें खड़े रहना है। हमें एक दूसरे के पास और एक दूसरे के साथ खड़ा होना है, एक दूसरे के लिए दुआएं करनी हैं और हमें उन खुशियों और कठिनाइयों को साझा करना है जो आज पूरे विश्व में महिलाओं के सामने आते है। अगर हम अपने बारे में आवाज़ नहीं उठाएंगे तो हमें पितृसत्ता द्वारा शांत कर दिया जाएगा और फिर उसका कोई उद्देश्य नहीं होगा!”

बहनापे अर्थात सिस्टरहुड की यह परिभाषा सिस्टरहुड के सपने को और गुलाबी बनाती है।  Ntozake Shange एक अमरीकी ब्लैक लेखिका हैं। अब इस विषय पर आते हैं कि बहनापे अर्थात सिस्टरहुड को जमीन पर कैसे लाया जाए। यह देखने और सुनने में बहुत अच्छा लगता है मगर ऐसा होता नहीं है। आइये कुछ उदाहरणों के माध्यम से जानते हैं कि कैसे वामपंथी सिस्टरहुड आरोपियों के पक्ष में जाकर खड़ा हो जाता है, बजाय पीड़ितों के!

मीटू के मामले में विनोद दुआ का नाम आते ही उनकी बेटी अपने पिता के पक्ष में खड़ी हो गयी थी, वह बहनापे या सिस्टरहुड के पक्ष में नहीं आई! खैर मुद्दा यहाँ पर और भी कुछ है! हम सब लडकियां गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ थीं, गौरी लंकेश के विपरीत विचारों वाली स्त्रियों ने भी उसकी हत्या की निंदा की थी। सिस्टरहुड शायद यही है।

पिछले वर्ष इन्हीं दिनों एक बेहद महत्वपूर्ण घटना हुई थी! वायर, क्विंट और बीबीसी के लिए फ्रीलांसिंग पत्रकारिता करने वाली एक बेहद संभावनाशील पत्रकार रिजवाना ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी खबरें पढकर उसकी वैचारिकी स्पष्ट होती थी। एक खबर आई कि एक पत्रकार ने आत्महत्या कर ली। किसी भी राष्ट्र का युवा आत्महत्या करे, यह सबसे दुखद होता है। पर इस मामले में सिस्टरहुड का गाना गाने वाली एक भी स्त्री साथ नहीं आई थी! अब प्रश्न उठता है कि क्यों? क्योंकि उस लड़की द्वारा सपा के स्थानीय नेता को उसकी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

जिन पोर्टल्स के लिए वह लिखती थी उनमें से कुछ लोगों ने जरूरत रस्मी तौर पर लिखा, परन्तु एक्टिविस्ट, बुद्धिजीवी और पत्रकार बिरादरी मौन रही। रिजवाना की फेसबुक प्रोफाइल में वायर के लिए पत्रकारिता लिखना लिखा था, मगर एक साल होने जा रहा है, एक भी खबर ऐसी आई नहीं कि वायर ने अपनी पत्रकार की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को सज़ा दिलाने के लिए कोई आन्दोलन नहीं दिखा। न ही विमर्श हुए और न ही कुछ आवाजें हैं।

फिर आते हैं परसों की बात पर! परसों ऐसा क्या हुआ? आप सोचेंगे! परसों प्रगतिशील और वामपंथी लेखकों द्वारा समर्थन दिए जा रहे किसान आन्दोलन में उन्हीं के विचारों वाली एक लड़की का बलात्कार का मामला सामने आया। और ऐसा भी नहीं कि यह मामला किसी को पता नहीं था, कथित प्रगतिशील कार्यकर्ता इसमें शामिल थीं। और योगेन्द्र यादव जैसे महान लोगों को भी इसकी जानकारी थी। मगर सिस्टरहुड का रोना रोने वाली क्रांतिकारी बालाएं अभी सामने नहीं आई हैं।

ऐसा क्यों है? क्या इनका सारा सिस्टरहुड केवल उसी स्थिति में सामने आएगा जब केवल और केवल भाजपा समर्थक या हिंदुत्व समर्थक आरोपी होंगे? जरा सोचिये यदि पिछले वर्ष समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता के स्थान पर कोई टुच्चा मुच्चा सा जय श्री राम कहने वाला लड़का होता, जिसने रिज़वाना को आत्महत्या के लिए उकसाया होता तो भी इन प्रगतिशील लेखिकाओं का आक्रोश ऐसा ही रहता?

और जरा सोचिये कि यदि किसान आन्दोलन में जिस लड़की का बलात्कार और फिर कोरोना से मृत्यु हुई, क्या यह फेमिनिस्ट बालाएं इतना ही शांत रहतीं! क्या इनकी कल्पनाशीलता ऐसी ही शांत रहती? यदि यह व्यक्ति आम आदमी पार्टी से जुड़े न होकर भाजपा के साथ जुड़े होते तो हंगामे का स्तर आप सोच सकते हैं? अब तक ब्रश तोड़ कार्टून बन चुके होते!

पर अब नहीं क्योंकि यह आग उन्हीं की लगाई हुई है!

अब एक और बड़े मुद्दे पर आते हैं, क्या यह सारी वेबसाइट केवल आपकी मदद तभी करेंगी जब आप उनके एजेंडा के अनुसार लिखेंगी? क्या आन्दोलन के लोग महज़ अपने प्रयोग के लिए ही लड़कियों को इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या वायर और क्विंट का यह उत्तरदायित्व नहीं था कि वह पिछले वर्ष अपनी खुद की पत्रकार और इस वर्ष उस प्रगतिशील क्रांतिकारी के साथ खड़े हों, जो उनके घृणा पूर्ण एजेंडे का शिकार हो गयी हैं।

पिछले वर्ष 4 मई से लेकर आज 11 मई के बीच जो यह शांति है, वह सिस्टरहुड की भावना के खिलाफ है। यह शान्ति एजेंडा से भरे हुए सिस्टरहुड या बहनापे को उसी तरह उधेड़ कर रखती है जैसे स्वेटर उधड़ता है।  यही शान्ति हमें बार बार यह जताने की कोशिश करती है कि कहीं न कहीं हम एजेंडा परक सिस्टरहुड के साथ हैं। जब तक आप हमारे एजेंडा पर चलती हैं हम आपके साथ हैं, और जैसे ही लड़की ने आपके एजेंडा के खिलाफ कुछ कहा या किया, या अपनी समस्या के बारे में बात की, आपको अकेला छोड़ दिया जाएगा। यह सब सही नहीं है! किसान आन्दोलन वाले मामले में भी यही हुआ, लड़की को जैसे अनाथ छोड़ दिया गया।

हमारे भीतर एजेंडा परक सिस्टरहुड का चलन है, विशेषकर वामपंथी और प्रगतिशील लेखिकाओं के बीच! हम कठुआ काण्ड पर शोर मचाएंगे और गाज़ियाबाद में एक मस्जिद में एक दस साल की बच्ची के बलात्कार पर यह कहेंगे कि बच्ची अपने आप गयी थी, इसलिए वह बलात्कार जायज़ है! ऐसा नहीं चलेगा! गौरी लंकेश की हत्या पर शोर और रिजवाना की आत्महत्या पर चुप्पी यह भी घातक है!

एजेंडा से संचालित सिस्टरहुड नहीं चल पाएगा, और राजनीतिपरक सिस्टरहुड नहीं चल पाएगा! धर्मपरक सिस्टरहुड नहीं चलेगा, किसी धर्म विशेष को बदनाम करने वाला सिस्टरहुड नहीं चलेगा। सारी प्रगतिशीलता उस प्रगतिशील राज्य की चौखट पर दम तोड़ देती है जहाँ कथित प्रगतिशील धर्म की ननें अपने ही रिलिजन की कट्टरपंथिता के कारण जीवन को समाप्त कर रही हैं, या फिर कुछ हिम्मत करके संघर्ष कर रही हैं। परन्तु अत्यंत प्रयास के बावजूद केरल की उस नन के पक्ष में अपने प्रगतिशील और वामपंथी लेखिकाओं की वाल पर एक भी शब्द नहीं दिखा था, जिन्होंने बिशप फ्रैंको मुलक्क्ल पर बलात्कार का आरोप लगाया था।

और अब भी कई नन फ्रैंको बिशप के खिलाफ गवाही दे रही हैं, मगर प्रगतिशील वामपंथी लेखिकाएं अपनी उन बहनों के साथ नहीं हैं, और यही सिस्टरहुड का सबसे बड़ा अपमान है। हमारी वामपंथी प्रगतिशील लेखिकाओं ने हजारों यजीदी लड़कियों को ईराक में यौन गुलाम बनाने पर एक भी पंक्ति नहीं लिखी जबकि वह हाल के दिनों का सबसे जघन्य काण्ड था। यह सिस्टरहुड नहीं हो सकता। हमने उन तमाम स्त्रियों के बारे में एक भी शब्द नहीं लिखा जिन्हें सुदूर अफ्रीका में बोकोहराम के आतंकियों ने इसलिए रौंद डाला क्योंकि उन्हें अपनी सेना के लिए नए लड़ाके चाहिए थे

उनका सिस्टर हुड एजेंडा से संचालित है और एकतरफा है! जैसा हाल ही में टिकरी बॉर्डर वाले मामले ने प्रमाणित कर दिया है।


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