सशक्त हिन्दू स्त्रियों को निर्बल बनाने का नैरेटिव: हिडिम्बा

हिडिम्बा के सम्मुख उसके भाई हिडिम्ब का मृत शरीर पड़ा था और उसके सम्मुख खड़ा था वह पुरुष, जिसमें वीरता और सौन्दर्य दोनों ही अपने चरम पर था। हिडिम्बा का ह्रदय तो पहले ही उस पुरुष पर आ चुका था, वह हार चुकी थी अपना ह्रदय! आहा, कैसा तेजस्वी है यह पुरुष!”

तभी उस पुरुष के स्वर से उसकी तंद्रा भंग हुई “हे देवी, अब आप स्वतंत्र हैं। आपको यह परेशान नहीं करेगा!”

परन्तु हिडिम्बा कहाँ स्वतंत्र हो पाई थीं? वह तो उस पुरुष के मोहपाश में बंध गयी थीं। और निश्छल होकर सोच रही थीं कि क्या यह वीर पुरुष जिसने काम का तीर उसके हृदय में चला दिया है, वह उसके लिए जीवन भर के लिए बंध पाएगा? या फिर कुछ ही क्षण के लिए? परन्तु इस निर्जन वन में यह सौन्दर्य और वीरता की प्रतिमूर्ति कर क्या रहा है?  अंतत: यह पुरुष कौन है?  कोई देवता है, गंधर्व है? जो भी है साधारण तो नहीं है!

“आप कौन हैं? और मैं आपके साथ ही जीवन व्यतीत करना चाहती हूँ!” वह सकुचा कर बोली!  राक्षस कुमारी हिडिम्बा, जो इतनी सक्षम थी कि वह अपने भाई के लिए शिकार लाती थी, वह एक पुरुष के सम्मुख अपनी स्त्री सुलभ इच्छा लेकर खड़ी थीं। क्या क्षण था वह? इतिहास में शायद ही कोई ऐसा क्षण रहा होगा, जब एक स्त्री यह जानते हुए भी कि यह साथ शारीरिक रूप से अत्यंत ही अल्प होगा, उस पुरुष के साथ इसलिए कुछ क्षण व्यतीत करना चाहती थीं क्योंकि वह आत्मा के स्तर पर वह उस पुरुष के साथ बंध चुकी थी।

“हे सुन्दरी, मैं पांडु पुत्र भीम हूँ। मैं तुम्हारी इच्छा का मान करता हूँ, परन्तु तुम्हें अपने साथ नहीं ले जा सकता हूँ! मैं और मेरे भाई अभी एक भयंकर विपदा से बचकर आए हैं और अपने प्राणों को बचाते हुए विचरण कर रहे हैं, मैं अपने साथ तुम्हारे प्राण भी संकट में नहीं डाल सकता!”

शोर सुनकर निद्रामग्न कुंती और शेष पांडव भी आ गए थे।

सारा वृत्तांत सुनकर कुंती कुछ चिंता में पड़ गईं थीं। वह स्त्री सुन्दर थी, परन्तु वह संभवतया राजमहलों की कुटिल राजनीति का प्रबन्धन नहीं कर पाएगी? वह उन संस्कारों की भी नहीं है, जो एक राजकुमारी में होने चाहिए। यह तो बहता हुआ जल है, निश्छल, पवित्र! हर प्रकार की कुटिलता से परे, जो साक्षात है!

कुंती के ह्रदय में हिडिम्बा के प्रति स्नेह उमड़ आया। कैसे दुष्ट भाई के साथ रह रही थी, जो उसका शोषण कर रहा था, और अब प्रेम भी हुआ तो भीम से? जिसका अभी खुद ही रहने का ठिकाना नहीं है? वह बार बार राक्षस कन्या को देखतीं और उनके ह्रदय में एक शूल उठता! इस कन्या का क्या होगा?

“मैं अपने जीवन यापन के लिए सक्षम हूँ माँ! मुझे बस आपके पुत्र से एक पुत्र चाहिए, जो इनके जैसा वीर हो, स्त्रियों का आदर करे, उसमें इतनी मानवता हो कि अनजान स्त्री के मान के लिए भी अपने प्राण संकट में डाल दे! मैं इनके प्रति प्रेम से भरी हुई हूँ! हे माँ, और स्त्री की प्रणय इच्छा को पूरा करना आपका कर्तव्य है। आपके पुत्र का भी यह कर्तव्य है!”

इतिहास में कोई भी घटना सामान्य नहीं होती, उसका एक कारण होता है, एक उद्देश्य होता है! हिडिम्बा का आना और भीम से प्रणय निवेदन करना भी साधारण नहीं था। परन्तु वह भीम के साथ इन जंगलों में कैसे जा सकती थी? वह लोग अपना ध्यान रखेंगे कि इस राक्षस कन्या का?

तभी कुंती ने अपना हाथ उस हिडिम्बा के सिर पर रखते हुए कहा “जाओ पुत्री, मेरे पुत्र के साथ जाओ! हाँ, उसे सही समय पर हमारे पास वापस कर जाना! हमारी कुछ विवशताएँ हैं, जिनके कारण हम तुम जैसी वीर पुत्रवधू को अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं।”

राक्षस कन्या हिडिम्बा और भीम की यह प्रेम कहानी मात्र कुछ दिनों की नहीं थी। हिडिम्बा में एक ऐसी स्त्री है जिसने जानते बूझते एकल माँ होना चुना। तमाम राजनीतिक उठापटक के बावजूद वह यह अधिकार जताने नहीं गईं कि भीम पर मेरा अधिकार है, उन्हें भीम से जो चाहिए था वह घटोत्कच के रूप में मिला। इतिहास में नाम करने वाली स्त्रियों ने रुदन नहीं अपितु साहस चुना है। हिडिम्बा ने कभी समाज को कठघरे में नहीं खड़ा किया कि एकल माँ की क्या विवशताएँ होती हैं, वह ऐसी एकल माँ रही जिसने अपने पुत्र को इतना पराक्रमी बनाया कि जब महाभारत का निर्णायक युद्ध हुआ तो उसे रोकने के लिए कर्ण को उस शक्ति का प्रयोग करना पड़ा जो उसने अर्जुन वध के लिए अपने पास रखी थी।

इतिहास में एकल माँ के रूप में हिडिम्बा का नाम सशक्त स्त्री के रूप में रहेगा!  परन्तु आज का फेमिनिज्म एकल माँ को एक विवश माँ के रूप में प्रचलित करता है और समाज को तोड़ने के लिए बाध्य करता है। वह इसे एक ऐसी कृत्रिम महानता के रूप में स्थापित करता है, जो समाज पर बाध्यकारी होती है न कि समाज के निर्माण के लिए सहायक, तभी हमारी बेटियों के हृदय में इन महान स्त्रियों के लिए आदर उत्पन्न नहीं होता बेचारगी उत्पन्न होती है! और वह अपने ही धर्म की स्त्रियों के विरोध में खड़ी हो जाती हैं!


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