श्रेष्ठतावाद और उत्पीड़न-भ्रान्ति का खेल खेलते कट्टरपंथी इस्लामी  

हाल ही में कुछ वीडियो सामने आए हैं, जो कट्टरपंथी इस्लामियों की श्रेष्ठतावाद और उत्पीड़न-भ्रान्ति दोनों को एक साथ दिखाते हैं।  एक तरफ वह यह कहेंगे कि वह पीड़ित हैं और दूसरी ओर वह यह कहते हैं कि हमने इतने वर्ष तक तुम हिन्दुओं पर शासन किया है, हम मालिक हैं, हम नहीं आते तो यह नहीं होता, वह नहीं होता! वह हमारे हजारों वर्षों के मंदिरों को देखते तक नहीं हैं और उन मंदिरों के ऊपर तोड़कर बनाई गई मस्जिदों को अपनी पहचान बताते हैं। बहुत दिन नहीं हुए थे जब नागरिकता क़ानून का विरोध करते हुए, उन्होंने बच्चों के मुख से भी कई बातें ऐसी कहलवाई थीं, जिन्हें सुनकर कम से कम बहुसंख्यक समाज प्रसन्न तो होगा नहीं, अपितु इसके विपरीत दुखी ही होगा, क्योंकि वह ज़हरीले श्रेष्ठतावाद की पराकाष्ठा थीं।

बाबरनामा से लेकर तुजुके-जहांगीर में यह उल्लेख है कि कितने मंदिर तोड़े गए। यहाँ तक कि दिल्ली में कुतुब मीनार भी मंदिर तोड़कर ही बनाई गयी है। यहाँ तक कि आगरे का लालकिला भी पहले के किले को तोड़कर बनाया गया है। शाहीन बाघ में वह बच्चा जब यह गाना गा रहा था कि अगर वह न आते तो भारत गोबर और गाय का ही देश रहता! यह सुनना कितना अजीब लगता है, छोटे बच्चों के मुख से क्योंकि भारत जब तक गौ आधारित अर्थव्यवस्था रहा, तब तक यहाँ पर आक्रमणकारी आकर्षित होते रहे, इतना धनधान्य और संपदा गौ आधारित अर्थव्यवस्था के समय में ही थी। यहाँ के मंदिरों का उल्लेख लगभग उस काल की हर पुस्तक में मिलेगा। कि कैसे मंदिरों को तोड़ा गया, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि एवं काशी में बाबा विश्वनाथ के मंदिर तो आज तक स्वयं पर हुए अत्याचारों का विवरण देते हैं।

और साथ ही कट्टरपंथी इस्लामियों का यह भी कहना है कि इस्लाम के आक्रमणकारियों ने आज तक जबरन किसी को इस्लाम क़ुबूल नहीं कराया, यदि कराया होता तो आज पूरा भारत मुसलमान होता। और ऐसा एक नहीं कई बोलते हैं, जैसे पिछ्ले दिनों असम में बदरूद्दीन अजमल ने कहा था। हालांकि उनके वीडियो का कुछ अंश ही वायरल हुआ था, पर तथ्यों को जांचने पर यह पता चला कि उन्होंने कहा है कि हिन्दू राष्ट्र बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए, क्योंकि मुसलमानों ने कभी भी मुस्लिम देश बनाने का कार्य नहीं किया है।

ऐसा ही कुछ अभी परसों ही अजमेर दरगाह के खादिम सैय्यद सरवर चिश्ती ने हिन्दुओं को यह कहते हुए धमकी दी कि शहरों के नाम बदले जा रहे हैं, तो क्या रबर से इतिहास भी बदल दिया जाएगा, और साथ ही यह भी कि अगर मुस्लिमों को ‘उकसाने के प्रयास’ किए गए तो वह दुबारा हिन्दुओं पर शासन करेंगे। हिन्दू यह बात भूल न जाएं।

ऐसा नहीं है कि ऐसे उकसाऊ बयान एक या दो नेता देते हों। यह एक अंतहीन सिलसिला है, जो आज से नहीं सदियों से चला आ रहा है।  देश के विभाजन का आधार ही यही था कि मुस्लिम दारुल-हर्ब में नहीं रह सकते हैं। उन्हें दारुल-इस्लाम में रहना है। डॉ. भीमराव आंबेडकर अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ के पृष्ठ सँख्या 293 पर लिखते हैं कि “मुस्लिमों के क़ानून के अनुसार यह दुनिया दो भागों में बंटी हुई है, दारुल इस्लाम अर्थात इस्लाम का घर और दारुल हर्ब अर्थात युद्ध का घर। दारुल इस्लाम का अर्थ है जिस पर मुस्लिम ही शासन करें और दारुल हर्ब का अर्थ, वहां मुस्लिम रह तो सकते हैं, पर शासक नहीं हैं। तो भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की मातृभूमि नहीं हो सकती है। यह केवल मुस्लिमों की ही भूमि हो सकती है, मगर यह ऐसी जमीन नहीं हो सकती है जिसमें हिन्दू और मुस्लमान समान रूप से रह सकें।  और यह मुसलमानों की जमीन तभी हो सकती है, जब इस पर मुसलमान ही शासन करें। जिस दिन कोई गैर मुस्लिम शासन करेगा वह मुस्लिमों की जमीन नहीं रहेगी और यह दारुल इस्लाम के बजाय दारुल हर्ब हो जाएगी।”

खिलाफत आन्दोलन के दौरान कई मुस्लिम इसी कारण भारत से अपना घर परिवार समेट कर अफगानिस्तान चले गए। आंबेडकर जी यह भी लिखते हैं कि तकनीकी रूप से यह हर मुस्लिम शासक का उत्तरदायित्व है कि यदि वह दारुल हर्ब को दारुल इस्लाम बना सकता है तो बनाए।  वर्ष 1919 में तो अफगानिस्तान से भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों ने मदद भी माँग ली थी कि वह भारत पर आक्रमण करें। तो यह श्रेष्ठता बोध उनमें है कि वह किसी भी गैर मुस्लिम के शासन में नहीं रह सकते हैं। यही कारण है कि उन्हें देश के स्थान पर मजहबी क़ानून चाहिए।  क्योंकि उस कानून की वह मनमानी व्याख्या कर सकते हैं, जैसे कि काफिरों के मुंह में थूकना।

‘सिख धर्म, इसके गुरु एवं पवित्र ग्रन्थ तथा लेखकों’ (‘द सिख रिलिजन, इट्स गुरुज़, स्कैरेड राइटिंग एंड ऑथर्स’ – The Sikh Religion, its gurus, sacred writings and authors) में मैक्स ऑर्थर मैकौलिफ पृष्ठ 43 पर अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि अब्दुल्ला वसाफ़ अपनी पुस्तक तज़ियत-उल-अमसर में लिखते हैं कि जब अलाउद्दीन खिलजी (1295-1316) ने कम्बायत के शहर पर आक्रमण किया तो उसने इस्लाम की प्रतिष्ठा के लिए सभी हिन्दू पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया, खून की नदियाँ बहा दीं और उस देश की महिलाओं को उनके सोने, चांदी, और गहनों के साथ अपने साथ ले गया और बीस हजार औरतों को अपना यौन गुलाम बनाया।

उसने एक बार काजी से पूछा कि इस्लाम हिंदुओं के लिए क्या क़ानून कहता है। तो काजी ने कहा “हिन्दू मिट्टी की तरह हैं। अगर उनसे चांदी मांगी जाए तो उन्हें दिल बड़ा करते हुए सोना देना चाहिए, और अगर मुसलमान का मन हिन्दू के मुँह में थूकने का हो तो हिन्दुओं को अपना मुंह आगे कर देना चाहिए। खुदा ने हिन्दुओं को मुसलमानों का गुलाम होने के लिए बनाया है। पैगम्बर ने हुकुम दिया है कि अगर हिन्दू इस्लाम क़ुबूल करने से इंकार करते हैं तो उन्हें जेल में डालना चाहिए, जुल्म करने चाहिए और अंत में मौत के घाट उतार कर उनकी दौलत को अपने पास रख लेना चाहिए।”

वह लिखते हैं कि राजाओं के वंशों को चुन चुन कर मारा गया। हिन्दुओं को उनके धर्म का पालन करने की सजा दी गयी और उनके खुद के महलों के बाहर चालीस पचास हिन्दुओं के शव टंगे रहते थे। हिन्दुओं को उनके परिवार के बच्चों का मांस पकाकर खिलाया जाता था और कईयों को हाथी के नीचे कुचलवा दिया जाता था।

यह केवल खिलजी वंश का ही उल्लेख है, तुगलक वंश, मम्लूक वंश, बाबर, अकबर और औरंगजेब तक लाशों के ढेर तो बताए जाने की प्रतीक्षा में हैं। जब बाबरनामा में बाबर खुद कहता है कि उसने काफिरों के सिरों की मीनारें बनाईं। तो यह कहा जाना कि इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किये, सफ़ेद से भी बड़ा झूठ है।

और जो लोग यह कहते हैं कि अगर वह नहीं आते तो गाय और गोबर का देश रहता, तो उन्हें आज के समय में बंजर बने कंधार अर्थात गंधार के प्राकृतिक सौन्दर्य को वाल्मीकि रामायण में पढ़ना चाहिए, जिसमें राम जी अपने मामा का आदेश पाकर कि हर प्रकार की प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण गंधार देश को गन्धर्वों से मुक्त कराएं, गंधार को गन्धर्वों से मुक्त कराते हैं एवं भरत अपने पुत्रों तक्ष एवं पुष्कल के नाम पर तक्षशिला एवं पुष्कलावत नाम के नगर बसाते हैं।

तक्षं तक्षशिलायां तु पुष्कल पुष्कलावते,

गंधर्वदेशे रुचिरे गान्धार विषये च स:

(वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड एकोत्तरशततम सर्ग)

जो प्रांत एक ऐसी तहजीब के कब्जे में आए, जिसने केवल तलवार के दम पर शासन करना चाहा और दूसरे हर विचार को मारना चाहा, वहां पर आज एक अजीब सी निर्जनता है। जहाँ पहले वृक्ष थे, आज वहाँ आतंक है और वह भी केवल इसी सोच के चलते कि हमारे अलावा किसी विचार का स्थान नहीं।

मजे की बात यह है कि जब तथ्यों के आधार पर बात की जाती है तो कट्टरपंथी इस्लाम वह वर्ग है जो स्वयं को पीड़ित बताने लगता है और बार बार यही कहता है कि मजहब के आधार पर उनका शोषण हो रहा है।  परन्तु यह उनकी रणनीति है, जिस रणनीति को डॉ. आंबेडकर बताते हैं एवं उसे और अच्छी तरह से एस.के. मलिक की पुस्तक ‘कुरानिक कॉन्सेप्ट्स ऑफ वार’ को पढ़कर समझा जा सकता है, जो हमें युद्ध और इस्लाम के विषय में काफी जानकारी प्रदान करती है।

किसी और लेख में उस पुस्तक और युद्ध और इस्लाम के विषय में लिखा जाएगा, तभी इन कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं के हर भाषण को समझा जा सकता है।


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