“पगलैट” वाकई पगलैट बनाने वाली फिल्म

फिर से एक फिल्म आई है और फिर से हिन्दू परम्पराओं का मज़ाक उड़ाना सामने आया है। जिस भी फिल्म की प्रशंसा से अंग्रेजी मीडिया भर जाए और फेमिनिस्ट लेखिकाओं की फेसबुक भर जाए, उसे गौर से देखना आवश्यक हो जाता है।

कहानी जाहिर है एक हिन्दू परिवार की है और बेहद आम परिवार की। जिसे एकता कपूर की बालाजी फिल्म्स और सिख्या एंटरटेनमेंट ने बनाया है। एक लड़की ही केंद्र में है। और कहानी की शुरुआत में ही पता चल जाता है कि कहानी में हिन्दू रीति रिवाजों को निशाना बनाया गया है। दूसरे दृश्य में जब एक लड़के के बाल नाई काट रहा है तो वहीं रघुबीर यादव एक पुस्तक हाथ में पकड़े हैं, जिसका नाम है ‘अटूट भारत’ और जिसमें भगवा रंग से भारत रंगा हुआ है। अर्थात जो परिवार है वह एक विशेष विचारधारा का परिवार है, अर्थात ‘पिछड़ा’ है।

फिर फिल्म शुरू होती है, तो पता चलता है कि एक सत्ताईस-अट्ठाईस साल के लड़के का देहांत हो गया है और परिवार शोक में है, परन्तु परिवार में केवल माँ और पिता जी! जिस भाई ने दाह दिया है, और जब उसके बाल कट रहे हैं तो उसके बगल में दुकान वाला लड़का उसका मजाक उड़ाकर कह रहा है “यार गजनी लग रहे हो?” और फिर अट्टाहास!

किसी भी हिन्दू परिवार में आज तक यह नहीं देखा है, और ख़ास तौर पर मध्यवर्ग में जिसे लेकर यह फिल्म बनाई है, कि इस प्रकार से अपने भाई की मृत्यु पर मज़ाक उड़ाए।  फिल्म में आगे बढ़ने पर पता चलता है कि जो लड़का मरा है, वह अच्छा लड़का था, जिम्मेदारी उठाने वाला, और उस लड़के का बड़ा भाई, मगर फिर भी यह लोग शोक संतप्त नहीं हैं। इतना ही नहीं, आई हुई मौसियाँ भी शोक संतप्त नहीं हैं।

उसके बाद कहानी में प्रवेश होता है संध्या का! अर्थात नायिका का। अपने पति की मृत्यु के अगले ही दिन वह शांत है। पेप्सी मांग रही है, फेसबुक पर मेसेज चेक कर रही है। बेहद सामान्य है, इसी सामान्यता पर फेमिनिस्ट बलिहारी हैं।  संध्या की माँ रो रही है और वह अपनी माँ को रोने पर डांटती है। और अपने पति की मृत्यु के अगले दिन वह पेप्सी मांगती है। पेप्सी मांगने या पीने में कोई हर्ज नहीं है मगर क्या घर में शोक होने पर ऐसी मांग किसी भी हिन्दू परिवार में होती होगी? मुझे नहीं लगता।

दरअसल यह एक नए तरह से पूरी तरह से हिन्दू समाज की गलत तस्वीर प्रस्तुत करने की शुरुआत है, जिसमें न ही लेखक और न ही निर्देशक को यह पता है कि करना क्या है? एक ओर इन्हें सारी हिन्दू परम्पराओं को आडम्बर घोषित करना है तो दूसरी ओर उन्हें हिन्दू स्त्री की महानता भी साबित करनी है कि जिस घर में डोली आई है उसी में अर्थी जाएगी। यह कहानी केवल भारतीय स्त्री की महानता को साबित करने के लिए बनाई गयी है, जिसमें हिन्दू धर्म की परम्पराओं को तो आडम्बर घोषित किया ही है, बल्कि साथ ही पूरे हिन्दू समाज को सर्वाधिक असम्वेदनशील घोषित कर दिया है।

यह दिखाता है कि उस बहू के साथ कोई संवेदना नहीं रख रहा है, तभी वह अपनी दोस्त के पर्स से चिप्स का पैकेट निकाल कर खा जाती है, आराम से किताबें पढ़ती है और हर प्रकार के सामान्य कार्य करती है। इसे प्रगतिशीलों ने उसकी मजबूती बताया है। दरअसल यह चरित्र की मजबूती है ही नहीं, यह बेहद ही दुर्बल चरित्र है। इसमें दिखाया है कि संध्या इसलिए अपने पति आस्तिक के मरने के प्रति असंवेदनशील है क्योंकि आस्तिक कभी उसके पास नहीं आया।

एक ऐसा चरित्र जो जिन्दा नहीं दिखाया है, उसका पक्ष रखने के लिए पूरी फिल्म में कोई नहीं है।  और मजे की बात है कि सबसे समझदार यदि फिल्म में कोई है तो वह है संध्या की दोस्त नाज़िया ज़ैदी और उसका विरोध कौन कर रहे हैं, रघुबीर यादव, जो “अटूट भारत” नाम की पुस्तक पढ़ रहे थे।

अब आप कल्पना कीजिए कि यह फिल्म किस हद तक हिन्दू विरोधी फिल्म है कि एक विशेष वर्ग का विरोध करने के लिए बनाई गयी यह फिल्म अंतत: मुस्लिमों को ही सबसे बड़ा सुधारवादी घोषित करने पर समाप्त होती है, वही वर्ग जो अपनी बेटियों के लिए जहेज़ जैसी प्रथा को न केवल बंद कराने में विफल रहा है बल्कि वह अभी तक अपने पर्सनल लॉ बोर्ड पर यह भी दबाव नहीं डाल पाया है कि हमारी बेटियों के साथ बहुविवाह, या तीन तलाक़ (अभी केवल तलाक-ए-बिद्दत यानि एक ही बार में तीन बार तलाक़ बोलना अवैध घोषित हुआ है) या हलाला जैसी कुरीति बंद होनी चाहिए।

पर बालाजी फिल्म्स की यह भ्रमित फिल्म यहीं पर नहीं रुकती है। इसका एजेंडा और भी बढ़कर है। आस्तिक ने एक बीमा पालिसी ली थी, उसमें पचास लाख के क्लेम के लिए अपनी पत्नी अर्थात संध्या को नॉमिनी बनाया था। अब यहाँ पर लेखक भ्रमित है। एक ओर वह आस्तिक को बुरा घोषित कर चुका है क्योंकि संध्या उससे उसी कारण निकट नहीं आ पाई है और दूसरी ओर वह इतना अच्छा है कि अपनी पत्नी के नाम पर वह पालिसी कर गया और इसका भी विरोध कौन करता है, रघुबीर  यादव, जो “अटूट भारत” पुस्तक पढ़ रहा था।

तो नैरेटिव क्या बना है कि “अटूट भारत” जिस पर भगवा रंग का भारत बना हुआ है उसे पढने वाला व्यक्ति नाज़िया का विरोध करता है, और अपनी बहू को मिलने वाले धन पर भी विरोध करता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा कौन सा परिवार है और वह भी मध्यवर्गीय जिसमें, पचपन वर्ष का पुरुष इतना निरीह है कि वह कमा नहीं रहा है? यदि सत्ताईस और अट्ठाईस साल का भी आस्तिक है तो उसके पिता की भूमिका निभा रहे आशुतोष राणा क्या फिल्म में कुछ काम नहीं करते हैं जो अपने बेटे पर आश्रित हैं? यदि वह नौकरी कर रहे थे, जिसके पैसों से उन्होंने अपने बेटे को इस योग्य बनाया कि वह इतना वेतन लेने वाला बना कि उसी के आधार पर पचास लाख की बीमा पालिसी बन गयी? और छोटा भाई कुछ नहीं करता?

और अंत में संध्या त्याग का परिचय देते हुए दूसरी शादी से इंकार कर देती है, और नौकरी खोजने के लिए चली जाती है। मगर एम ए अंग्रेजी में बिना किसी पेशेवर डिग्री के कौन सी नौकरी खोजने वह गयी है यह भी लेखक और निर्देशक छिपा ले गए हैं।

इतना ही नहीं कई और दृश्य नितांत असंवेदनशील है, एक तो वह जिसमें आस्तिक की अस्थियाँ बहाई जा रही हैं, उसी समय संध्या गोलगप्पे खा रही है और अपने मृत पति को माफ़ करने की बात करती है, मगर किस बात के लिए माफी? नहीं पता! जब बाद में पता चलता है कि आस्तिक ने अपने सम्बन्धों को शादी के बाद जारी नहीं रखा तो भी उसके चेहरे पर भाव नहीं आते!

यह एक बेहद अजीब फिल्म है जिसका उद्देश्य एक बार फिर से हिन्दू परम्पराओं को आडम्बर घोषित करना है। और मृत्यु के बाद घर में स्त्रियाँ ऐसे बातें कर रही हैं जैसे सब सामान्य हो। और वह दृश्य तो बहुत ही अजीब है जिसमें बीमा एजेंट को सब लालच भरी निगाह से देखते हैं। सहज मध्यवर्गीय परिवार इतना असंवेदनशील नहीं होता है।

निर्देशक बता ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर आस्तिक से संध्या को चिढ क्यों हैं? क्यों सम्बन्ध सामान्य नहीं हैं? क्यों पत्नी को दुःख नहीं हो पा रहा है? क्या छोटा भाई ऐसे भाई के प्रति इतना असंवेदनशील हो सकता है जो पूरे घर का खर्च उठा रहा हो? यह कहानी कहने में भले ही एक छोटे शहर और अपने परिवेश की कहानी लगे, मगर यह पूरी तरह से भारतीय वातावरण से अजनबी है।

आस्तिक बहुत अच्छा था, मगर उसने अपने पिता को जबरन सेवा-निवृत्ति दिलवाकर पीएफ का पैसा अपने मकान की पहली ईएमआई में लगवा दिया? हद्द है, इतनी मासिक किश्त कितने बड़े मकान की होगी? निर्देशक यह भी नहीं तय कर पा रहे हैं कि आर्थिक स्थिति क्या है? मगर इतना तय कर दिया कि एक एम ए पास लड़की अकेली घर से निकलकर नौकरी खोज लेगी और फिर वापस आ जाएगी?

प्रथम दृष्टया यह फिल्म स्त्री विमर्श की फिल्म जरूर लगे पर यह फिल्म पूरी तरह केवल हिन्दू समाज के विरोध में खडी है और तथ्यगत रूप से बेहद लचर है, जिसका उद्देश्य केवल और केवल हिन्दू परिवार पर एक और प्रहार है, और कुछ नहीं। यह फिल्म स्त्रियों और युवा को और गुमराह करेगी और परिवार को और तोड़ेगी!


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