छवियों के माध्यम से लोक और इतिहास से दूर करने का षड्यंत्र!

अनुवाद अध्ययन में एक शब्द आता है शिफ्ट! और यह शिफ्ट बहुत महत्वपूर्ण होता है, यह शिफ्ट हमें बताता है कि यह अनुवाद विमर्श की किस दिशा में जाएगा। और यह अधिकतर फिक्शन ट्रांसलेशन में प्रयोग किया जाता है। मगर यह इतना ताकतवर होता है कि आने वाले समय में वह विषय किस लिए याद किया जाएगा, उसे निर्धारित कर देता है। और यदि हम यह समझते हैं कि यह केवल टेक्स्ट के अनुवाद पर लागू होता है, तो आप गलत है! इसका दायरा बहुत व्यापक है और यह शिफ्ट मूलत: डिजिटल माध्यम वाले अनुवादों पर निर्भर करता है।

अब आते हैं एक शहर की कहानी पर! एक समय था वह शहर पूरे देश के लिए सबसे पावन स्थान बन गया था।यही वह शहर था, जहाँ से भारतीय मानस में चेतना का विस्फोट गुलाम काल में हुआ था। वह युग असंतोष का युग था, असंतोष सभी के दिल में कुलबुला रहा था, और फिर एक दिन वह विस्फोट मंगल पाण्डेय के रूप में हुआ। जैसे अभी गर्मी पड़ रही थी, 1857 में भी गर्मी बहुत तेज पड़ रही थी। मगर वह गर्मी ऐसी थी जिसमें क्रोध, क्षोभ, और दुःख का भी ताप मिला हुआ था और सारा मानस एक निष्कर्ष पर पहुँच रहा था कि अब चाहे कुछ भी हो, इनसे छुटकारा पाना है। और वह कौन थे, वह थे आयातित शोषण के प्रतीक, जिन्होनें हमारा मानसिक शोषण किया, हमारा मानसिक पतन किया। जो उस मानसिक पतन से अनछुआ बच गए थे वह भीतर भीतर सोचते थे कि अब बहुत हो गया है। फिर उन्होंने 29 मार्च को अंग्रेजों माने उस मानसिक और आर्थिक शोषण के खिलाफ क्रान्ति का बिगुल फैला दिया। वह शहर पवित्र बन गया। मेरठ की छावनी पूरे भारत के लिए काशी और मक्का हो गयी। आहा, कितनी पावन थी वह भूमि जिसने आगे जाकर भारत को शोषण की जंजीरों से मुक्त करने में सबसे बड़ा योगदान दिया। फिर उसके बाद 10 मई 1857 को कौन भूल सकता है जब मेरठ से उठी हुई सैनिक क्रान्ति से दहल गया था पूरा संसार! यह वह शहर था जिसने अंतिम मुगल बादशाह के दिल में आज़ादी की लौ जला दी थी, और अपनी वृद्धावस्था के बावजूद वह पूरी ताकत से भिड गए थे! मरे तो मरे तो क्या हुआ, शेरों की तरह मरे, कायरों की तरह जीना भी कोई जीना है! आज मेरठ शहर अंग्रेजों की लाइब्रेरी में एक दहशत और वीरता के साथ अपनी ठसक के साथ उपस्थित है।

अब आता है शहर की धारणा के बारे में शिफ्ट! क्या शिफ्ट आता है! अभी तक वीरता और खेल के सामानों के लिए लोकप्रिय रहा था, अब उसका शिफ्ट हो रहा है, शिफ्ट क्या हो रहा है? शिफ्ट हुआ है इन दिनों बनने वाली वेबसीरीज़ के माध्यम से!

जब पिछले वर्ष महान फेमिनिस्ट और बुद्धिजीवी कही जाने वाली आदरणीय स्वरा भास्कर जी की एक फिल्म आई थी अमेजन प्राइम पर, “रसभरी” तो क्रान्ति के शहर कहे जाने वाले उस शहर की एकदम से पहचान ही बदल गयी थी।

जिस शहर ने अपने धार्मिक अधिकार को बनाए रखने के लिए, कि हम गौ मांस की चर्बी वाला कारतूस मुंह से नहीं खोलेंगे, पूरे देश को दिशा दिखाई, उस शहर की छवि महान स्वराभास्कर ने अपनी ओटीटी सीरीज में कैसी बना दी कि “मेरठ की औरतों का घर दूसरी औरत के कारण बर्बाद होता रहा हैऔर यह पूरी तरह स्थापित करने की कोशिश की गयी है कि मेरठ में पढने वाले बच्चे अपनी टीचर पर लार टपकाते रहते हैं। यह जो शिफ्ट हुआ है, वह किसलिए हुआ है, यह हम और आप समझ सकते हैं! यह नितांत महीन रेखा है, बच्चों और महिलाओं में धर्म और इतिहास के प्रति निराशाजनक नैरेटिव निर्माण करने की, जो आपके धर्म के विषय में हीनभावना का विस्तार करती है।

यह शिफ्ट इसलिए हुआ है कि मेरठ जैसा शहर जिसकी पहचान अभी तक प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उद्गम स्थल के रूप में होती थी, जिस शहर के पुरुष अभी तक खुद में कहीं न कहीं मंगल पाण्डेय की छाया देख सकते होंगे, और अब वह उस अश्लील पुरुष के रूप में खुद को पहचानेंगे जो हर लड़की को देखकर पैंट उतार देते हैं। और जिस शहर का सदर बाज़ार अभी तक उन तवायफों पर गर्व करता था जिन्होनें खुलकर अपने देश की क्रांति में योगदान दिया था, वहां हर औरत को एक दूसरे की दुश्मन बना दिया है।

यह होता है पहचान के अनुवाद का शिफ्ट!

और यदि आपको लगता है कि अनुवाद एक बहुत छोटा विषय है, तो आप भ्रम की दुनिया में जी रहे हैं। एक ही शिफ्ट पूरी की पूरी अवधारणा को जड़ से ही परिवर्तित कर देता है। जैसे तांडव सीरीज में महादेव को रैम्प पर वाक करा दी जाती है! जैसे “अतिथि देवो भव” का भाव वाले हमारे देश में “अतिथि कब जाओगे” जैसी फ़िल्में बना दी जाती हैं और हास्य हास्य के माध्यम से ही महान परम्परा को शिफ्ट कर दिया जाता है!

ऐसे ऐसे छोटे शिफ्ट, जो अब ओटीटी और फिल्मों के माध्यम से सामान्य हो गए हैं, वह हमें हमारी ही पहचान के प्रति हीनभावना से भर देते हैं, इन्हें समझाना होगा!


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