एक वर्ष से प्रतीक्षारत हैं अमेरिका में शव अंतिम संस्कार के लिए

दुनिया भर में कोरोना अभी भी अपने चरम रूप को दिखा रहा है और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया इन दिनों भारत को लेकर अत्यंत सजग है एवं तरह तरह के नकारात्मक लेख अपने अपने अखबारों में प्रकाशित कर रहा है। यह बेहद हैरानी से भरा हुआ है कि जहां भारत कोविड का प्रबंधन करने में काफी हद तक सफल हुआ है, वह भी तब जब उसका स्वास्थ्य ढांचा भी कथित आधुनिक देशों की तुलना में कहीं नहीं था। फिर भी भारत स्वयं पर आई आपदा का सामना पूरे साहस के साथ कर रहा है।

परन्तु  पश्चिमी मीडिया का दृष्टिकोण भारत के प्रति एक भेदभाव वाला ही रहा है, और बार बार सीएनएन जैसे चैनल भड़काऊ वीडियो चलाकर यह साबित करना चाहते हैं कि “हिन्दू वादी” मोदी के राज्य में भारत इस आपदा का सामना नहीं कर पा रहा है। लगभग हर रिपोर्ट में बार बार मोदी और मोदी के बहाने हिंदुत्व पर ही प्रहार का प्रयास किया जा रहा है। फिर चाहे वह द लैंसेंट हो, बीबीसी हो, न्यूयॉर्क टाइम्स हो या फिर वाशिंगटन पोस्ट! इन सभी मीडिया हाउस के द्वारा प्रयास ही नहीं बल्कि प्रहार किया ही जा रहा है। जबकि आंकड़े हमेशा ही एक दूसरी कहानी कहते हैं।  नरेंद्र मोदी के बहाने हिन्दू चेतना को दबाने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है और कहीं न कहीं यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि “नरेंद्र मोदी” के शासन में हिन्दू मर रहे हैं।

परन्तु क्या वाकई हिन्दू ही मर रहे हैं? क्या यह वायरस केवल हिन्दुओं को निशाना बना रहा है? यह नैरेटिव बहुत ही सूक्ष्मता से लोगों के दिमाग में डाला जा रहा है, कि एक हिन्दू होने के नाते हिन्दुओं के लिए नरेंद्र मोदी विफल रहे हैं। और यह काम विदेशी मीडिया बहुत तेजी से कर रहा है, जिससे हिन्दू न केवल भ्रमित हो बल्कि आने वाले समय में भाजपा को वोट देने से पहले सौ बार सोचे। वह जानबूझकर हिन्दुओं की चिताएं दिखा रहा है और कब्रिस्तान की तस्वीरें छिपा रहा है। यहाँ तक कि अमेरिका में ही उन सात सौ शवों के बारे में बात नहीं कर रहा है, जो अभी तक अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा में हैं। जी हाँ, वही अमेरिका, जो स्वास्थ्य सेवाओं में आधुनिक विश्व का सिरमौर है और जो बार बार अन्य देशों को अपनी स्वास्थ्य सेवाओं का ताना देता रहता है, जो वैश्विक दादा है, वह अभी तक लोगों के शवों को स्टोर करके रखा हुआ है और अंतिम संस्कार नहीं कर रहा है।

अमेरिका में न्यूयॉर्क में कोविड 19 की चरम लहर के बीच यह निश्चित किया था कि वह शवों को रेफ्रिजरेट किए गए ट्रकों में रखेंगे। और अब इन शवों को स्टोर किए हुए एक साल से अधिक समय हो गया है, परन्तु उन शवों की किस्मत में सम्मानजनक अंतिम संस्कार नहीं दिखाई देता।

इंडिया टुडे में एक प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वहां का स्थानीय मीडिया इस बात को बता रहा है कि शहर की स्वास्थ्य समिति ने पिछले सप्ताह इस बात को स्वीकार किया कि अब तक ट्रकों में 750 से अधिक कोविड 19 से संक्रमित होकर मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों के शव रखे हुए हैं। और जिन्हें ब्रूकलिन वाटरफ्रंट के पास पार्क किया गया है।

स्थानीय मीडिया के अनुसार  अब अधिकारी इन शवों की संख्या कम करने की सोच रहे हैं।  वहां के स्वास्थ्य अधिकारी अब इस प्रयास कर रहे हैं कि मृतकों के परिजनों से मुलाक़ात हो सके और शीघ्र से शीघ्र इनका अंतिम संस्कार किया जा सके।

मेडिकल एग्जामिनर के ऑफिस के प्रवक्ता ने एसोसिएट प्रेस को पिछले सप्ताह बताया था कि लम्बे समय के लिए भंडारण को यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि परिवार अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार अपनी सुविधा से कर सकें।

चिताओं की पंक्ति दिखाने वाले गिद्ध पश्चिमी पत्रकार ट्रकों में भरी हुई वह 750 से अधिक लाशें नहीं दिखा रहे हैं, और न ही उनकी स्थिति दिखा रहे हैं।  हिन्दुओं में अंतिम संस्कार की एक विधि होती है, मंत्रोच्चार होते हैं। जिसमें समय लगता है एवं जलने में समय लगता है। कोई भी परिवार हो, वह बिना सम्मानजनक अंतिम संस्कार के अपने प्रिय जन को अग्नि के हवाले नहीं कर सकता है। यही कारण है कि जैसे ही संक्रमण से मृत्यु की संख्या में वृद्धि हुई वैसे ही शमशान घाटों के बाहर पंक्ति लगने लगीं। यद्यपि किसी भी संवेदनशील सरकार के लिए यह पंक्ति तमाम प्रकार के विकासों पर एक तमाचा ही लगेगी!

लेकिन हम अमेरिका की तरह अपने प्रिय जनों को लावारिस नहीं छोड़ सकते।

परन्तु मीडिया को यह नहीं दिखेगा क्योंकि वह हर कीमत पर भारत को ही नीचा दिखाने के लिए लगी हुई हैं। विदेशी मीडिया का भारत के प्रति दुराग्रह इन दिनों अपने चरम पर है, उन्हें अमेरिका में मृत्यु की संख्या नहीं दिख रही है, और न ही यह दिख रहा है कि भारत अपने सीमित संसाधनों के साथ कैसे सधे कदमों के साथ आगे बढ़ रहा है।

जरा कल्पना करें कि यदि भारत में एक वर्ष से शव अपने सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए प्रतीक्षा कर रहे होते तो विदेशी मीडिया का क्या हाल होता?

परन्तु अमेरिका के लिए सब माफ़ है और भारत में रहकर भारत को कोसने वालों की नज़र भी भारत के ही विरोध में जाती है। यह मामला न केवल सरकार अपितु समाज के लिए भी शर्मनाक है!


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