पश्चिम बंगाल में स्त्रियों पर हुई सेक्युलर हिंसा पर कथित फेमिनिस्ट वेबसाइट्स की चुप्पी!

बंगाल में चुनावों के बाद हुई हिंसा की एक रिपोर्ट ने कल सभी को चौंका दिया, सभी को दहशत में डाल दिया कि चुनावों के बाद हुई हिंसा में 7000 से अधिक महिलाओं को किसी न किसी रूप में तृणमूल कांग्रेस द्वारा प्रायोजित हिंसा का सामना करना पड़ा था। कितने ही मामले उच्च न्यायालय में हैं, कितने ही मामले उच्चतम न्यायालय में हैं। परन्तु फिर भी इस समाचार पर एक मौन है!

एक नागरिक समूह कॉल फॉर जस्टिस द्वारा पांच सदस्यों की एक टीम का गठन किया गया था जिसकी अध्यक्षता सिक्किम उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त पूर्व मुख्य न्यायालय प्रमोद कोहनी ने की थी और इसके साथ उस टीम में दो सेवानिवृत्त आईएएस और एक आईपीएस अधिकारी भी थे। उन्होंने केन्द्रीय गृह मंत्री को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

इस पर केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि गृह मंत्रालय इस रिपोर्ट का अध्ययन करेगा और इसकी अनुशंसाओं को क्रियान्वित करने का प्रयास करेगा।” इस रिपोर्ट में एक चौंकाने वाली बात यह भी है कि यह हिंसा “स्वत: नहीं उपजी थी, बल्कि सुनियोजित हिंसा थी।”

इस रिपोर्ट के अनुसार कुछ बेहद शातिर अपराधियों, माफिया डॉन, और आपराधिक गिरोहों ने, जो पहले से ही पुलिस रिकार्ड्स में थे, उन्होंने यह इस प्रकार के हमले किए जो यह बताते हैं कि चुनावों से पहले ही अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था और चुनावों के बाद इसे राजनीतिक विरोधियों को शांत करने के लिए प्रयोग किया गया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि जानबूझकर संपत्तियों को निशाना बनाया गया, और उन्हें नष्ट किया गया, और इसका एकमात्र उद्देश्य यही था कि लोगों को उनकी आजीविका से दूर कर दिया जाए या उनका कामकाज पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाए।

रिपोर्ट ने कहा कि अधिकतर लोगों के मन में यही डर था कि पुलिस उनकी बात नहीं सुनेगी और हमलावरों के साथ ही जाएगी, यही कारण है कि वह झिझकते रहे। और सबसे भयभीत करने वाली बात यही है कि इसमें कहा गया है कि 7000 महिलाओं को किसी न किसी रूप से उत्पीडित किया गया। उनका किसी न किसी प्रकार से यौन शोषण किया गया।

हालांकि इस रिपोर्ट से पहले भी कई घटनाओं की पुष्टि हो चुकी है, फिर भी एक बात हैरान करने वाली है, कि कथित रूप से औरतों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली किसी भी वेबसाईट पर न ही इस रिपोर्ट को स्थान दिया गया है और न ही इससे पूर्व उच्चतम न्यायालय में दाखिल की गयी याचिकाओं को! जबकि इन दिनों फेसबुक ही नहीं बल्कि अन्य सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर तमाम ऐसी वेबसाइट्स हैं, जिनमें बार बार यह दावा किया जाता रहा है कि वह औरतों के लिए काम करती हैं, आवाज़ उठाती हैं।

पर उनकी आवाज किसलिए होती है? क्या उनकी आवाज़ उन स्त्रियों के लिए है, जो बंगाल में हिंसा का सामना कर रही हैं? क्या वह उन लड़कियों के लिए आवाज़ उठा रही हैं, जिनका प्यार के नाम पर जबरन धर्मांतरण कराया जा रहा है। यह सभी वेबसाइट्स केवल और केवल हिन्दू धर्म की परम्पराओं को कोसने का कार्य कर रही हैं, लगभग हर लेख में हिन्दू विवाह से जुड़ी परम्पराओं और रस्मों की आलोचना, और कैसे उन्हें तोड़ा जाए, इस बात के प्रयास किए जा रहे हैं।

लोक की वह परम्पराएं जो किसी न किसी रूप में संबंधों को जीवित रखती हैं, उनमें रस घोलती हैं, वह परम्पराएं जो हंसी ठिठोली का माध्यम हैं, उन्हें फूहड़ और स्त्री विरोधी ठहरा दिया जाता है।

विशेषकर shethepeople और feminisminindia, यह दो कथित रूप से वैचारिक वेबसाइट्स हैं, जो स्त्रियों के विभिन्न मुद्दों पर बात करने का दावा करती हैं। पर हैरानी की बात यह है कि भाजपा समर्थक स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों या उनके साथ हुए यौन शोषण, इन वेबसाइट्स के लिए मुद्दा नहीं है।

चाहे उनकी हत्या हो जाए, या फिर मुस्लिमों के जाल में फंसकर मरने वाली लड़कियों की लाशें हों, यह दोनों ही वेबसाइट्स शांत रहती हैं। इतना ही नहीं, इन दोनों वेबसाइट्स में उन हिन्दू स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों पर चुप्पी होती है, जिनके साथ मुस्लिमों या ईसाइयों ने कुछ गलत किया होता है, जैसे अभी बिहार में हमने देखा था कि पूर्णिया में दलित बस्ती पर मुस्लिमों द्वारा किये गए हमलों पर स्त्रियों की चोटों को नहीं दिखाया था।

क्या बंगाल की इन 7000 स्त्रियों का यौन शोषण आम बात है? क्या पूर्णिया की दलित बस्तियों की स्त्रियों की पीड़ा, इन फेमिनिस्ट साइट्स के लिए कोई पीड़ा की बात नहीं है? क्या कोई भी उनकी टीम में ऐसा नहीं है, जो इस विषय में लिख सके या फिर प्रबंधन ही नहीं चाहता है कि उन स्त्रियों की पीड़ा को सम्मिलित किया जाए जो उनके विचारों की नहीं है, जो उनके वामी खेमे की नहीं हैं? कहने को यह समस्त स्त्री जाति के प्रतिनिधित्व का दावा करती हैं, पर हलाला, ट्रिपल तलाक आदि मुद्दों पर मौन धारण करती हैं।

खैर, हिन्दू स्त्रियों की चेतना इस युद्ध से भी जीतकर ही बाहर आएगी, उसे इन फ्रॉड shethepeople, feminisminindia जैसी वेबसाइट्स की आवश्यकता नहीं है, वह युद्ध सच्चाई और साहस के कन्धों पर लडती है, छद्म प्रोपोगैंडा पर नहीं!


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