सांस्कृतिक नरसंहार: मानव सभ्यता के खिलाफ मुस्लिम और ईसाई कट्टरपंथियों का षड्यंत्र  

अभी पिछले साल इस्लामिक स्टेट ने 25 अगस्त 2015 को सिरिया के पाइमिरा में स्थित बाल शमीन मंदिर को नष्ट किया। उसके कुछ दिन बाद सिरिया में ही स्थित बेल मंदिर को अपना निशाना बनाया। वैश्विक आतंक बन चुके इस्लामिक स्टेट ने पिछले महीने में ही अस्सरियन ईसाइयों के सभी धर्म-ग्रन्थों को जला डाला। हमारी आँखों के सामने ही इस्लामिक स्टेट द्वारा अस्सरियन एवं यजिदी सभ्यताओं का विनाश कर दिया गया, फिर भी विश्व की तमाम महाशक्तियाँ इस्लामिक स्टेट का कुछ नहीं कर पाई। इसी प्रकार कुछ वर्षों पूर्व इस्लामिक तालिबन द्वारा अफ़ग़ानिस्तान स्थित बमियान की बुद्ध की प्रतिमा को तहस-नहस कर दिया गया था। मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा सभ्यता-संस्कृति से जुड़ी धरोहरों का विनाश करना कोई नयी और अनोखी बात नहीं है। यह पूरा नरसंहार एक सोची समझी बर्बर रणनीति का नतीजा है।

Palmyra Destroyed By ISIS
इस्लामिक स्टेट द्वारा विध्वंसित पाइमिरा के सांस्कृतिक धरोहर

संस्कृति का मानव सभ्यता से गहरा संबंध है। सभ्यता की आत्मा वहां की संस्कृति है। संस्कृति के खत्म होते ही सभ्यता का भी विनाश हो जाता है। इसका ज्वलंत  उदाहरण हमने यूनान, रोम और मिस्र आदि सभ्यताओं के विलुप्त होने में देख सकते हैं। लोग भले ही उन पुरानी सभ्यताओं में रहने वाले लोगों के ही वंशज हों, किन्तु आज वे सांस्कृतिक रूप से बिलकुल अलग हैं। इस प्रकार संस्कृति मानव सभ्यता की आत्मा है। वर्तमान समय के सभी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां इन पुरातन सभ्यताओं की ही देन है। विज्ञान, गणित व खगोल के लगभग सभी प्रारंभिक ज्ञान भारतीय, चीनी, यूनानी, एवं सभ्यताओं से लिए गए हैं।

वर्तमान समय में कई समृद्ध सभ्यताओं का वजूद खत्म हो गया है, और उनको समाप्त करने के पीछे संसार के दो सबसे बड़े इब्राहीमी पंथों – इस्लाम और ईसाई – के चरमपंथियों का सक्रिय योगदान है। इन पंथों की ऐसी प्रवृति के पीछे उनकी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा है। इस्लाम और ईसाई के अलावा दुनिया के किसी भी पंथ में पूरी दुनिया का धर्मपरिवर्तन कराने का उद्देश्य नहीं है। मुरुभूमि में जन्में इन दो पंथों ने धर्म के नाम पर जीतने लोगों को मारा है, उतने लोग किसी भी विश्व-युद्ध, आकाल या महामारी में नहीं मारे गए। लोगों को मारने के साथ साथ इन्होने वहाँ की संस्कृति का भी समूल नाश कर अपने पंथ को स्थापित किया। जिस प्रकार इस्लाम में गैर-मुस्लिमों को ‘काफिर’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है, उसी प्रकार ईसाईयों द्वारा सनातन धर्मियों को ‘पैगान’ कह कर नीचा दिखाया जाता है। वास्तव में इन दो पंथो जैसा धर्मांध, असहिष्णु तथा विस्तारवादी विश्व में कोई अन्य पंथ नहीं है।

ईसाई मिशनरियों ने सबसे पहले यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का विनाश किया जिनमें यूनानी, मिस्री, कैल्टिक, गोथिक, वाइकिंग और रोमा सहित सैकड़ों सभ्यताएं हैं। इन सभी लोगों को क्रूरतम तरीके से खतम किया गया। विद्वानो, दार्शनिकों, और कलाकारों को वीभत्स तरीके से मारा गया। मंदिरों और पुजा-स्थानों को अपमानित करते हुये निर्ममता से तोड़ा गया। यह विडम्बना ही है, कि जिन चमत्कारों के आधार पर यूरोप की लाखों महिलाओं को ईसाईयों ने जिंदा जला दिया, आज उन्ही चमत्कारों के आधार पर ईसाई पादरी को संत घोषित किया जाता है।

यूरोप की औपनिवेशवादी (colonist) ताकतों ने जब विश्व के तमाम हिस्सों में कब्जा करना शुरू किया तो उनके साथ चर्च की बर्बरता और सभ्यताओं का विनाश करने और इस कृत्यों को सही साबित करने का बहाना भी साथ था। दक्षिणी अमेरिका के माया सभ्यता और अटजेक सभ्यताओं का समूल विनाश करने का काम तो ईसाई मिशनरियों ने खुद स्वयं किया और वहाँ के मंदिरों से सोना, चाँदी व बहुमूल्य मूर्तिओं लूटा व मंदिरों को तोड़ दिया। इसी प्रकार मेक्सिको और उत्तरी अमेरिका के मूल इंडियन निवासियों की जनसंख्या और सभ्यता को भी विनष्ट किया गया। सभ्यता का ही बहाना बना कर यूरोपीय ईसाइयों ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों (aborigines) को तो पूरी तरह से ग़ुलाम बना लिया गया और उनकी एक पूरी पीढ़ी को खतम कर दिया गया।

इसी प्रकार इस्लाम ने मोरक्को से ले कर भारत तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को मुस्लिम बनाया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही सभ्यता का विनाश लगभग नियमित अंतरालों पर किया। अरब आक्रमणकारी मुस्लिम ने बड़ी बेरहमी से ‘काफिरों’ का कत्लेआम किया। ईरान के पारसियों का खात्मा तो मात्र 15 सालों में कर दिया गया। तक्षशिला स्थित विश्व की प्रथम विश्वविद्यालय को तबाह कर दिया गया। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा जलाए जाने के बाद नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय महीनों तक जलता रहा।

बल-प्रयोग, कत्लेआम, लूट-पात और आतंक आदि तरीक़े जब नाकाफ़ी पड़ गए तो इस्लामिक षड्यंत्रकारियों ने काफिरों के खिलाफ अन्य गैर-युद्ध तरीक़े अपनाए। जिनमे से ‘धीम्मी’ और ‘अल-तकिया’ प्रमुख हैं। धीम्मी उन काफिरों को कहा जाता है, जो अपनी जान-माल और धर्म की सुरक्षा के लिए इस्लामिक राज्य को एक विशेष प्रकार का टैक्स देते हैं जिसे ‘जज़िया’ कहा जाता है। धीरे-धीरे धीम्मी लोग इस्लामिक ज़्यादतियों को जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बना लेते हैं। भारत के अधिकांश भाग में  हिंदुओं को सदियों तक धीम्मी की तरह रहना पड़ा है। ‘अल-तकिया’ काफिरों के खिलाफ इस्लामिक जिहाद की दूसरी कारगर रणनीति है। यह तरीका छठें इममिया इमाम जफ़र-अल-सादिक़ (765 CE) के समय विकसित हुई। ‘अल-तकिया’ एक तरीक़े से मुस्लिमों के लिए काफिरों के खिलाफ जिहाद के लिए मक्कारी, धोखेबाज़ी और झूठ बोलने का इस्लामिक प्रमाणपत्र है। यह पूरे विश्व को मुस्लिम बनाने का इस्लामिक लक्ष्य का एक कारगर षड्यंत्र है। इसी तकिया नीति के अनुरूप झूठ बोल कर इस्लाम को शान्तिप्रिय धर्म बताया जाता है, काफिरों की लड़कियों को ‘लव जिहाद’ में फसाने के लिए झूठ का सहारा लिया जाता है तथा इस्लाम की सच्चाई को छुपा कर सूफी का अस्थायी चोला भी पहना जाता है।

ईसाई और मुस्लिम पंथों की विश्व विजयी महत्वाकांक्षा ने इनके आपसी संघर्ष को भी जन्म दिया है। विश्व के सैकड़ों संस्कृतियों का विनाश करने वाले ये प्रमुख पंथ आपस में भी एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। अफ्रीका के कई देश मुस्लिम-ईसाई संघर्ष की आग में जल कर बर्बाद हो गए उनमें से नाइजीरिया, सुडान आदि प्रमुख है। इन पंथों के विस्तारवादी खूनी टकराव को सैमुअल हंटिंगटन ने अपनी पुस्तक ‘सभ्यताओं का टकराव’ में विस्तार से लिखा है। वास्तव में यह टकराव इन दो पंथों के बीच का ही है, जिसमें छोटी-छोटी किन्तु समृद्ध सभ्यताओं का नरसंहार हो रहा है।

भारत पर इस्लामी आक्रमण

सांस्कृतिक नरसंहार का सबसे बड़ा शिकार भारतवर्ष रहा है। सन 711 CE में सिंध में बिन-कासिम के आक्रमण, लूटपाट, कत्लेआम और हिन्दू मंदिरों को गिराने से मुस्लिमों का आक्रमण प्रारम्भ हुआ। फिर तो अनेकों इस्लामिक आक्रमण हुये, सबका उद्देश्य काफिर हिंदुओं को लूटना, मंदिरों को तोड़ना, स्त्रियों और बच्चों को दास बना कर ले जाना व बचे लोगों को मुस्लिम बनाना ही था।

मुस्लिमों द्वारा मारे गए हिंदुओं की संख्या के बारे में स्वामी विवेकानंद का एक व्याख्यान जो उन्होने अप्रैल 1899 में दिया था, का संदर्भ लेना उचित होगा। स्वामी जी ने कहा था, “सबसे पुराने मुस्लिम इतिहासकार फ़ेरिश्ता के अनुसार जब पहली बार मुसलमान भारत आए तब यहाँ 60 करोड़ हिन्दू थे, अब हम मात्र 20 करोड़ ही है।“  अर्थात, करोडों हिंदुओं को मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों ने मार डाला। सन 1907 में स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के बाद अविभाजित भारत के दंगों, मुस्लिम लीग के डाइरैक्ट एक्शन डे, नोआखाली, और भारत के विभाजन के दौरान लगभग 8-10 लाख हिंदुओं और सिखों का कत्लेआम कर दिया गया। किन्तु स्वतंत्र भारत के इतिहास की पुस्तकों में से इन तथ्यों को जान बुझ कर निकाल दिया गया है। आज की पीढ़ी के बच्चों को इन तथ्यों का जरा भी ज्ञान नहीं है।

आधुनिक इतिहास में ही 1947 के पश्चात मुस्लिमों ने पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब के सभी हिंदुओं का समूल उन्मूलन कर दिया, प्राचीन हिन्दू मंदिरों और धरोहरों का विध्वंश कर दिया गया। आज भी बचे खुचे पाकिस्तानी और बंगलादेशी हिन्दू दहशत में जीते हैं। हर साल 300-400 हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म परिवर्तन करा कर मुस्लिमों से शादी करा दी जाती है। पॅलेस्टीन की गाज़ा पट्टी की छोटी-छोटी छड़पों पर भारत में विरोध मार्च निकालने वाले तथाकथित सेकुलरों ने पाकिस्तान में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार, बलात्कार और सांस्कृतिक विनाश पर आज तक एक शब्द भी नहीं बोला है। वैसे ही जैसे सिरिया के यजिडी और अस्सरियन लोगों का इस्लामिक स्टेट द्वारा नरसंहार किए जाने पर भारत में कोई भी मार्च या सामूहिक निंदा नहीं की गयी।

जिस मुग़ल शासक को सन 1947 से अकबर महान कह कर स्वतंत्र भारत के स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है, वह कहीं से भी अपने पूर्व के इस्लामिक धर्मान्ध शासकों से कम न था। उसने भी हिंदुओं पर अनेकों अत्याचार किए। जिसे जान बूझ कर छुपा दिया गया। पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू को हराने के बाद अकबर ने उसका कटा हुआ सिर काबुल भिजवा दिया और बाकी शरीर को दिल्ली के पुराना किले के बाहर लटकाया गया| इसके उपरांत हेमू के सिपाहियों के कटे हुए सरों से एक ‘विजय स्तंभ’ बनवाया गया। चित्तौड़गढ़ पर विजय पाने के बाद अकबर ने 30,000 निहत्थे हिंदुओं को मौत के घाट उतरवा दिया। मुस्लिम इतिहासकार अब्द-अल-कादिर के अनुसार 1 रजब 990 हिजरी (सन 1582) को अकबर की सेनाओं ने कंगड़ा के पास स्थित नगरकोट में 200 गायों की बलि दी, अनेकों हिन्दुओं का कत्लेआम किया व वहाँ के सबसे बड़े मंदिर को तोड़ डाला।

औरंगजेब द्वारा जारी मंदिरों को तोड़ने का फ़रमान
औरंगजेब द्वारा जारी मंदिरों को तोड़ने का फ़रमान (9 अप्रैल 1669)

“इस्लाम के सबसे बड़े नाज़िम को पता चला है की थत्ता, मुल्तान और विशेष रूप से बनारस में ब्राह्मण काफिरों द्वारा झूठी किताबों को उनके द्वारा स्थापित झूठे स्कूलों में पढ़ाया जाता है। शहँशाह औरंगजेब इस्लाम कायम करने को कटिबद्ध हैं और इसी क्रम में सभी रियासतों को यह हुक्म दिया जाता है कि काफिरों के स्कूलों और मंदिरों को गिरा दिया जाये, और काफिरों की तालिम और उनके मजहब को आम-ओ-खास से फौरी तौर पर हटा दिया जाए।“

यह शासनादेश एक उदाहरण मात्र है, औरंगजेब ने ऐसे सैकड़ों शासनादेश जारी किए थे।

चूंकि भारत में कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं थी और छोटे राज्यों के पास अनेकों सेनाएँ थी, इस वजह से भारत को ईरान की तरह एक झटके में जीत कर इस्लामिक राष्ट्र बना देना संभव न हो सका। हिन्दू धर्म भारत के लोगों की जीवनशैली बन चुकी थी, जिसे बदलना आसान न था। तमाम अत्याचारों, जज़िया करों, यातनाओं के बावजूद भारत के हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन उस प्रकार नहीं हो रहा था जैसा की अन्य देशों में हुआ।

अतः भारत के तत्कालीन मुस्लिम शासकों ने अल-तकिया रणनीति के तहत सूफियों का सहारा लिया। लगभग सभी प्रमुख हिन्दू तीर्थस्थानों के आस पास इन सूफी फकीरों के मज़ार बनाए गए। पुष्कर, त्रयंबेश्वर जैसे प्रमुख तीर्थों के साथ साथ स्थानीय महत्व के हिन्दू तीर्थों के आस पास भी सूफियों के मज़ार बनाए गए। लखनऊ के पास महादेवा नमक हिन्दू तीर्थ के पास अब देवा-शरीफ का मज़ार है। और वर्तमान में यह मज़ार पुरातन काल के शिव मंदिर से कहीं अधिक प्रसिद्ध है। सूफी फकीरों को राजकीय संरक्षण दिया गया ताकि वे अधिक से अधिक हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करा सकें। उल्लेखनीय है की भारत मुस्लिम शासक सुन्नी थे, और सुन्नी मुस्लिम सूफियों को वास्तविक मुस्लिम नहीं मानते। फिर भी हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन कराने हेतु सूफी-फकीरों का प्रयोग किया गया। इनके प्रभाव में आ कर लाखों हिन्दूओं ने इस्लाम धर्म अपना लिया। हालांकि यह प्रक्रिया अब बहुत धीमी है, लेकिन आज भी जारी है। सूफियों के इस अल-तकिया जिहाद ने लाखों हिंदुओं को मुसलमान बनाया। आज भारत में रह रहे मुस्लिम इन्ही परिवर्तित हिंदुओं की संताने हैं।

ब्रिटिश उपनिवेशवाद और ईसाई मिशनरियों द्वारा हमला

मुस्लिमों के इतने तिकड़म, घृणा, तिरस्कार, विनाश और नरसंहारों के बावजूद मुग़ल-काल की समाप्ति पर भी भारत में हजारों हिन्दू स्कूल थे जिनमे धार्मिक शिक्षा व प्रशासन संबंधी शिक्षा दी जा रही थी। भारत की सुदृढ़ शिक्षा तंत्र से अंग्रेज ईर्ष्या करते थे। यूरोप के ईसाइयों ने हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने का षड्यंत्र रचा जिसमे उद्देश्य हिन्दू धर्मग्रंथों की भ्रमात्मक व्याख्या कर गलत साबित करना था। मैक्समूलर ने इस काम की शुरुआत की। मैकाले द्वारा स्थापित अँग्रेजी शिक्षा को श्रेष्ठ बता कर नव शिक्षित भारतियों को हिन्दू धर्म से घृणा करना सीखाया गया। आज भी यह प्रवृति जारी है।

ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक दिनों में ही ईसाई मिशनरियों को चार्टर एक्ट 1813 द्वारा लोगों को क्रिश्चियन बनाने और अँग्रेजी पढ़ाने की अनुमति दी गयी। इसके बाद तो अंग्रेजों ने भारत की जनता के पैसों पर ही एक इक्लेज़्टिकल डिपार्टमेंट बनाया, जिसके अधिकारी आर्चबिशप और बिशप होते थे। इस डिपार्टमेंट में भारत के लगभग सभी नगरों के सामरिक और प्रमुख स्थानों पर कब्जा कर चर्च बनवाया। यह डिपार्टमेंट भारत की स्वतन्त्रता तक बना रहा। स्वतन्त्रता के पश्चात भी सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद की आपत्तियों को दरकिनार करते हुये नेहरू और संविधान रचनाकारों ने हिंदुओं के सांस्कृतिक अधिकारों का अतिक्रमण कर ईसाइयों और मुसलमानों को असीमित सांस्कृतिक अधिकार दे दिये। ईसाई मिशनरियों के भारत में प्रवेश और अँग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म-प्रचार और धर्म परिवर्तन के प्रावधान को आजतक समाप्त नहीं किया जा सका है।

विदेशों से मिल रहे अथाह पैसों पर ईसाई मिशनरी प्रतिदिन हजारों हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। ये ईसाई बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाते हैं। प्रार्थना सभा, चंगाई सभा और चमत्कारी सभा इत्यादि नामों से हिंदुओं को छला जाता है। और कई बार तो ईसा को हिन्दू देवी-देवताओं जैसा पेश किया जाता है ताकि आसानी से हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराया जा सके।

Jesus Depicted As Hindu

और तो और, आज खुद हिन्दू अपने बच्चों को कान्वेंट-शिक्षित कहलाने में गर्व महसूस करते हैं। यह सांस्कृतिक नरसंहार का ही परिणाम है कि कुछ लोगों को अपनी भाषा व धर्म छोटा लगता है। ऊपर से भारतीय संविधान द्वारा मुस्लिमों और ईसाइयो को दिये गए असीमित सांस्कृतिक अधिकार इस प्रवृति को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं।

इन दो पंथों के आक्रामक विस्तारवादी प्रवृति का सबसे बड़े शिकार अफ्रीका के जनजातीय लोग हैं। पूरे अफ्रीका को छोटे-छोटे देशों में बाँट कर वहाँ के लोगों को मुस्लिम और ईसाई बना दिया गया है। लोग एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं और प्राकृतिक संसाधनों पर इन पंथों के ठेकेदारों का कब्जा हो गया है। ये लोग पश्चिमी मीडिया और उसकी पिछलग्गू भारतीय मीडिया को इस्तेमाल कर यही प्रवृति भारत में दुहराने की फिराक में हैं। हिन्दू विरोधी कम्यूनिस्ट उनका हर स्तर पर साथ दे रहे हैं। हाल ही में इसी उपक्रम में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाल्लाह, इंशाल्लाह!’ नारे लगाए गए और कथोलिक सोनिया गांधी की काँग्रेस पार्टी ऐसे लोगों के समर्थन में खड़ी है। इनके षडयंत्रों को देखते हुये यह बात सिद्ध हो जाती है कि भारत में हिंदुओं कि संख्या घटते ही देश बट जाएगा और अफ्रीका कि तरह खूनी संघर्ष शुरू हो जाएगा।

कट्टर कथोलिक क्रिश्चियन सोनिया गांधी के हाथों भारत की सत्ता आने पर उसने वही किया जो ईसाई विस्तारवादी करते आए हैं। सोनिया के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने षड्यंत्र बना कर सार्वजनिक जीवन के हर पहलू से भारतीय और हिन्दू चीजों के हटाया। सरकारी पाठ्य पुस्तकों से रामायण, महाभारत, पंचतंत्र आदि भारतीय महाग्रन्थों को हटवाया गया। उनकी जगह पर पाकिस्तान प्रेम और ईसाई-सेकुलरवाद को बढ़ावा देने वाली कहानियों को बच्चों को पढ़ाया जाने लगा। यह सिलसिला अभी भी जारी है। सांस्कृतिक नरसंहार हेतु ही “शिक्षा के अधिकार” (RTE) अधिनियम को विभाजनकारी बनाते हुये इसे हिन्दुओं द्वारा चलाये जा रहे निजी स्कूलों पर थोप दिया गया किन्तु मुस्लिम और ईसाई स्कूलों को इससे मुक्त रखा गया। यहाँ तक की दूरदर्शन द्वारा प्रारम्भ से ही प्रयोग किए जा रहे “सत्यम शिवम सुंदरम” आदर्शवाक्य को बस इसलिए हटवाया क्योंकि यह उपनिषदों से है जो की हिन्दुओं के महान ग्रंथो में से एक है। हिन्दुओं को सांस्कृतिक और सामरिक रूप से कमजोर करने के लिए जैन समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित करवाना भी सोनिया के एस षड्यंत्र का हिस्सा था।

आज भी हिन्दू तीर्थों, मेलों और आयोजनों पर अतिरिक्त कर लगाया जाता है जबकि मुस्लिम और ईसाई आयोजनों के लिए हिन्दुओं से ही वसूला गया कर मुफ्त में लूटाया जाता है। हमें यह बातें बिलकुल ही बुरी नहीं लगती क्यों कि हम हमेशा से यह देखते आए हैं और हमारी सोच व मानसिकता को पाठ्य-पुस्तकों और संचार माध्यमों से इस तरह की बना दी गयी है। मुस्लिम और ईसाई आज भले ही हिंदुओं की तुलना में कई गुना कम हों, उनके चर्च और वक्फ बोर्ड के पास हिन्दू-मंदिरों के मुक़ाबले कई-गुना ज्यादा जमीन-जायजाद है। आज उत्तर भारत के लगभग एक तिहाई गाँवों का नाम इस्लामिक है। अधिकांशतः इन गाँवों में मुस्लिम नहीं रहते और ना ही इन नामों का उस स्थान या भारत की संस्कृति से कुछ लेना देना है, फिर भी ऐसे नाम थोपे गए। यह सांस्कृतिक आक्रामकता का एक उदाहरण हैं, जो कि पीढ़ियो तक असरदार है।

हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति विश्व के उन बची-खुची प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, जिसे ये दोनों पंथ तमाम कोशिशों के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं कर पाये। हालांकि ये अभी भी प्रयासरत हैं और उनका क्षद्म-युद्ध अभी भी जारी है। सोची-समझी आक्रामकता ही सुरक्षा का कारगर तारीका है। हमें इनके षड्यंत्र को समझते हुये अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। साथ ही विश्व के किसी भी मूल संस्कृति पर ईसाई और इस्लाम द्वारा हो रहे हमले का प्रतिकार करना होगा।

About the Author

Amit Srivastava

Adherent follower of Hindu Dharma, RSS Swayamsevak,
Thinker-Executor, Participant-Observer, Philosopher-Practitioner, Interested in politics, culture and social research. IIT Mumbai and JNU alumnus.

Follow him on twitter @AmiSri

  • Yuvraaj S Raizada

    Concise and Comprehensive analysis …

    It’s time we start actively fighting against these Adharmik cults (Islam and Christianity) …

  • Yuvraaj S Raizada

    Brilliant !!! to say the least .

    Keep Enlightening ….