सोनिया के वफादारों ने कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा को हानि पहुंचाई

भारत के गृहमंत्री राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होते हैं, और आई बी, एनआईए और रॉ  जैसी सुरक्षा एजेंसियां तमाम आंतरिक और बाह्य शत्रुओं से लड़ाई के अपने दुष्कर कार्य में उनसे साथ देने की आशा रखती हैं। पलानिप्पम चिदंबरम ने उन एजेंसियों को धोखा दिया, और ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने यह अपनी पार्टी प्रमुख और नेत्री सोनिया गाँधी के सीधे आदेशों पर अपने गृहमंत्री के रूप में  २९-नवम्बर-२००८ से ३१-जुलाई-२०१२ के कार्यकाल के दौरान किया। मनमोहन सिंह, जो उस समय नाममात्र के प्रधानमंत्री थे, उन्होंने जब यह शर्मनाक धोखा हो रहा था तब चुप्पी साधे रखी।

यह पूरी कहानी इशरतजहाँ के चारों और घूमती है, जो एक LeT (लश्कर-ए-तोएबा, एक पाकिस्तानी राज्य की सहायता से चलाया जाने वाले आतंकवादी संगठन) कार्यकर्ता थी जिसे ३ दूसरे आतंकवादियों – जावेद शेख और २ पाकिस्तानियों : जीशान जौहर और अमजद अली राना – के साथ १५-जून-२००४ को खुफिया विभाग (आई बी) द्वारा दी गयी सूचना के आधार पर गुजरात पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मार गिराया था। प्रसंगवश यह मामला इशरत जहाँ के नाम से क्यों जाना जाता है, जावेद शेख के नाम से क्यों नहीं, यह भारत के अन्दर बने सामाजिक-राजनीतिक वातावरण का खुलासा करता है जो छद्म-धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद, और अल्पसंख्यक सक्रियतावाद के जहरीले मिश्रण की उपज है – लेकिन यहाँ हम यह विषय अपने आप में एक लेख लिखे जाने के लायक है, चलिए  हम अपने मूल विषय पर वापस आते हैं ।

२००९ में गृह मंत्रालय ने गुजरात हाईकोर्ट के समक्ष एक शपथपत्र (affidavit) फ़ाइल किया जिसमे कहा गया था की इशरतजहां के आतंकवादी संगठनों से सम्बन्ध थे। लेकिन एक महीने के अन्दर एक संशोधित शपथपत्र फ़ाइल किया गया जिसमें इशरतजहां के आतंकवादी संगठनों से सम्बन्ध के सारे उल्लेख गायब थे।

चिदंबरम ने कैसे ख़ुफ़िया विभाग को कमजोर किया

पूर्व गृह सचिव जी. के. पिल्लई ने यह खुलासा किया है कि कांग्रेस नेता और यूपीए सरकार के पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कैसे उनको दरकिनार कर इशरत जहाँ पर शपथपत्र बदलवाया. पिल्लई ने एक चैनल को बताया : “चिदंबरम ने खुफिया विभाग के एक निचले कर्मचारी से संपर्क किया और शपथपत्र को पूरी तरह से फिर से लिखा। वह उनके द्वारा निर्देशित प्रारूप था, इसलिए कोई और कुछ नहीं कह सकता था। उनको नहीं कहना चाहिए कि आईबी और गृह सचिव उनसे सहमत थे। ”

गृह मंत्रालय के पूर्व अवर सचिव, आर वी एस मणि ने भी जीके पिल्लई के संस्करण का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि इशरतजहाँ प्रकरण में उनसे बलपूर्वक दूसरा शपथपत्र फाइल करवाया गया, मणि ने टाइम्स नाउ से कहा, “ नहीं.. मुझे उसे फाइल करने का आदेश दिया गया. वह सरकार का आदेश था । इसलिए मैंने उसपर हस्ताक्षर किया। ” जब उनसे पूछा गया कि क्या यह माना जा सकता है कि इशरतजहां प्रकरण में राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ था, मणि ने कहा यह मानना “बिलकुल सही” है।

सन्डे गार्डियन के एक लेख ने सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा रचे गये एक बड़े षड़यंत्र की महत्त्वपूर्ण बारीकियों का खुलासा किया है जिसका उद्देश्य गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को फंसाना और उनके राष्ट्रीय मंच पर उदय होने से रोकना था। लेख कहता है ( [] के अन्दर की विषयवस्तु इस लेखक द्वारा जोड़ी गयी है)-

“इस षड़यंत्र में इसकी भी योजना थी कि एक ख़ुफ़िया विभाग (आईबी) के अधिकारी [राजेंदर कुमार] को गिरफ्तार किया जाए और उन्हें मोदी और शाह को फंसाने के लिए मजबूर किया जाए। २००९ में गृह मंत्रालय ने गुजरात उच्च न्यायलय में एक शपथपत्र दाखिल किया जिसमें कहा गया था कि मृत महिला का आतंकवादी संगठनों से सम्बन्ध था। इससे पश्चिमी राज्य के एक बड़े  कांग्रेसी नेता [अहमद पटेल?] गुस्सा हो गए, जिन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को सितम्बर २००९ के पहले सप्ताह में एक पत्र लिखा जिसमें यह निराशा व्यक्त की गयी थी कि इस शपथपत्र के कारण मोदी को इशरत के एनकाउंटर में नहीं फंसाया जा सका

एक जगह इस ढाई पन्ने के टाइप किये पत्र में लिखा है : “इसके साथ ही गुजरात के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री की पूछताछ करने का आखिरी मौका भी निराशा में बदल गया क्योंकि यह आखिरी मौका था जिसमें एक मजबूत SIT (विशेष जांच दल) के द्वारा गुजरात मंत्रिमंडल को शर्मिंदा करके मुसीबत में डाला जा सकता था। आरोपियों में से दो नजदीकी संपर्क में हैं और उन्होंने सबकुछ बताने और मुखबिर बनने के लिए इच्छा जताई है”। कांग्रेस नेता इस बात से नाराज़ थे कि गृहमंत्रालय के शपथपत्र ने आधिकारिक तौर पर इशरत के आतंकवादी होने की बात को मान लिया था।

मोदी को इशरतजहां केस में फंसाने के लिये की गयी बैठकों में से एक अक्तूबर २०१३ में दिल्ली में  एक कैबिनेट मंत्री के निवास में हुई। सूत्रों के अनुसार कम से कम ३ केंद्रीय मंत्री, वह राजनेता जिसने पीएमओ को पत्र लिखा और सीबीआई के एक बहुत वरिष्ठ अधिकारी वहाँ उपस्थित थे। उस मीटिंग में एक केंद्रीय मंत्री जो एक जाने माने क़ानून विशेषज्ञ हैं [कपिल सिब्बल?] ने सीबीआई के अधिकारी से  ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारी राजेंदर कुमार को यंत्रणा देकर, यह क़ुबूल करवाने को कहा कि इशरतजहां को लश्कर के सदस्य बताये जाने वाली जानकारियाँ नकली हैं और मोदी के आदेशों पर रची गयी थीं।

“उसको अरेस्ट कीजिये और चार जूते मारिये, सब कबूल करेगा” यह निर्देश मंत्री ने उपस्थित सीबीआई अधिकारी को दिए।”

हेडली के बयान पर एनआईए का यू-टर्न

पाकिस्तानी-अमेरिकन आतंकवादी, डेविड हेडली ( दाऊद गिलानी), जिसे अमेरिका में २६/११ के मुंबई हमले में उसकी भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था, ने २०१० में भारत की राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी ( एनआईए) के प्रश्नकर्ताओं को २०१० में बताया कि इशरतजहां, जो की ठाणे के मुम्ब्रा की निवासी थी, उसको आला लश्कर कमांडर मुज़म्मिल ने भर्ती किया था । मुज़म्मिल भारत में लश्कर के सञ्चालन का २००७ तक उत्तरदायी था। उसने यह पुष्टि की, कि इशरत वास्तव में फिदायीन ( आत्मघातक हमलावर) थी। लेकिन एक साल बाद एनआईए यह कहकर बिलकुल ही दूसरी धुन अलाप रही थी कि हेडली ने इशरत के बारे में कभी कुछ नहीं कहा! एनआईए भी गृह मंत्रालय के अंतर्गत ही आती है और इस बात का अनुमान कोई भी लगा सकता है कि जब एनआईए ने यह यू-टर्न लिया तब कौन गृह मंत्री था।

आईबी ने बाद में एनआईए की रिपोर्ट की मूल प्रति के अंश जारी किये जिससे यह पता चलता है कि हेडली ने वास्तविकता में इशरतजहां के बारे में बताया था लेकिन वो २ पैरा उस ‘संक्षिप्त’ संस्करण से जाहिर तौर पर चिदंबरम के कहने पर निकाल दिए गए थे। और अगर अब भी कोई संदेह रह जाता है तो वह हेडली ने ३ सप्ताह पहले एक मुंबई कोर्ट को अमेरिका की जेल से किये अपने विडियो कांफ्रेंसिंग में बिलकुल वही बयान देकर दूर कर दिया जो उसने २०१० में एनआईए को इशरत के एक लश्कर  आतंकी होने के बारे में दिया था।

यूपीए की बात मनवाने के लिए नौकरशाह को यंत्रणा

आर.वी.एस. मणि ने यह भी दावा किया है कि उन्हें सतीश वर्मा ने यंत्रणा दी, सतीश वर्मा एक विवादास्पद भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी रहे हैं और इशरतजहां मामले में मुख्य अन्वेषक भी रहे हैं। “सतीश वर्मा ने मेरे साथ जो किया वो अभूतपूर्व है … २१ जून २०१३ को सतीश वर्मा ने मुझे सिगरेट से जलाया” उन्होंने टाइम्स नाऊ को बताया। “वे सबूत जुटाने के बजाय सबूत गढ़ रहा था” आर.वी.एस. मणि ने आगे कहा।

यहाँ यह बात प्रासंगिक है कि यहाँ तक लश्कर-ए-तोएबा ने भी इशरत की मौत के बाद अपने लाहौर स्थित अपने मुखपत्र ‘गजवा टाइम्स’ में उसे एक लश्कर कार्यकर्ता बताकर उसकी जिम्मेदारी ली थी।

यूपीए के द्वारा नियुक्त अन्वेषकों/जजों की संदेहास्पद पृष्ठभूमि

यह विस्तृत लेख इस पूरी घटिया ‘जांच’ में आये मोड़ों का खुलासा करता है, जहां टैक्स अदा करने वालों के करोड़ों रूपये यूपीए के राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने में लगाए गए.. और राष्ट्रीय सुरक्षा भाड़ में जाए। इशरतजहां मामले में एसआईटी के मुखिया की तरह एक महीने तक काम करने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी ने यह खुलासा किया है –

“इशरतजहां और प्रनेश पिल्लई गुजरात और महाराष्ट्र में कई जगह गए और होटलों में रुके. जब उनकी हस्तलिपियों की केंद्रीय फॉरेंसिक प्रयोगशाला में जांच की गयी तो जांचकर्ता ने सत्यापित किया कि हस्तलिपियां उनकी ही थीं” सिंह ने ANI को बताया। “ उन पर बहुत दबाव डाला गया कि वे यह कहकर नकारात्मक रिपोर्ट दें कि हस्तलिपियां नहीं मिलतीं. बाद में उनकी रिपोर्ट चार्जशीट में नहीं शामिल की गयीं ”

राष्ट्रीय मीडिया की चुप्पी का षड़यंत्र

हालांकि ये सब विवरण इन्टरनेट कनेक्शन रखने वाले किसी भी सामान्य नागरिक के पास उपलब्ध हैं, लेकिन राष्ट्रीय मीडिया की बड़ी हस्तियों में से किसी ने भी, वे भी जो ‘साहस की पत्रकारिता’ करने का दम भरते हैं,  ने सोनिया गाँधी, पी चिदंबरम या मनमोहन सिंह से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र पर इस बेशर्मी से किये गयी अंतर्घात पर प्रश्न उठाने की हिम्मत नहीं की। यह प्रकरण देश के खुफिया अधिकारियों के निडर होकर काम करने की क्षमता पर असर डालेगा। कुछ और नहीं तो केवल इसी कारण से ही यह आवश्यक हो जाता  है कि वर्तमान सरकार इस दुःखदायी प्रकरण के पीछे राजनीतिज्ञों पर मुक़दमे चलाये जिससे राजनीतिक हलकों में एक कड़ा सन्देश जाए कि देश एक पार्टी या एक राजपरिवार से ऊपर है।

सरस्वती फिल्म्स द्वारा निर्मित डाक्यूमेंट्री “The Ishrat Jahan Conspiracy”  (इशरतजहां षड्यंत्र) इस पूरे मामले का खुलासा करती है । जो काम एक सतर्क राष्ट्रीय मीडिया का होना चाहिए वो एक स्वतंत्र फिल्मकार मनीष पंडित ने अपने खुद के खर्चे पर किया। मुख्यधारा की मीडिया का कोई भी चैनल इस डाक्यूमेंट्री को प्रसारित करने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसका सीधा कारण सोनिया गाँधी और उसके हारवर्ड शिक्षित मीठी बात करने वाले वफ़ादार पी चिदंबरम का डर था। आप पूरी ४० मिनट की डाक्यूमेंट्री नीचे देख सकते हैं :

(अस्वीकृति : यह लेख लेखक के विचार प्रस्तुत करता है और लेखक इस लेख के तथ्यों की सत्यता के लिए  उत्तरदायी है। Hindupost इस विषयवस्तु में दी गयी किसी भी जानकारी की सटीकता, पूर्णता, अनुकूलता और वैधता के लिए उत्तरदायी नहीं है।)