“क्या धर्म बदलने पर बच जाएंगे हम?” विवश है जनता, विवश राज्यपाल: यह है चुनाव बाद पश्चिम बंगाल

“क्या हम धर्म बदल लें तो क्या हम बच जाएंगे?” यह शब्द सिसकते हुए ऐसे व्यक्ति के हैं, जिसका पद राज्य में केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करता है। यह शब्द हैं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के, जिसमें वह सिसकते हुए एक पीड़ित परिवार की व्यथा बता रहे हैं कि “एक वृद्ध महिला यह प्रश्न कर रही है कि क्या धर्म बदलने पर हम बच जाएंगे?” हिन्दुओं की क्या स्थिति हो गयी है पश्चिम बंगाल में? वह हिंसा ग्रस्त क्षेत्रों में हिंसा से पीड़ित लोगों से मिलने गए थे! उन्होंने शुक्रवार को कूच बिहार से भाजपा सांसद नितीश प्रमाणिक के साथ असम के धुबरी जिले में शिविर का दौरा किया था तो वहीं शनिवार को उन्होंने नंदीग्राम का दौरा किया था।

आज कई अतिउत्साही लोग इजरायल की प्रशंसा कर रहे हैं, इजरायल अपने यहूदी नागरिकों की सुरक्षा आतंकियों से कर रहा है, परन्तु  जब अपने ही देश में हिन्दुओं के साथ धर्म के आधार पर अत्याचार हो रहा है, तब एक मौन पसरा हैं? क्यों? आखिर उनकी क्या गलती है? पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं को अपना धर्म बदलने के लिए कौन विवश कर रहा है? यदि यह आधिकारिक तौर पर हो रहा है तो क्या केंद्र सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए या यदि सरकार नहीं कर सकती है तो क्या स्थानीय भाजपा विधायकों को ही आगे बढ़कर विरोध नहीं करना चाहिए? मामला विस्फोटक है!

प्रदेश वाकई एक ज्वालामुखी पर बैठा हुआ है। और ऐसा और कोई नहीं बल्कि स्वयं राज्यपाल कह रहे हैं।  वह तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष एवं प्रदेश की मुख्यमंत्री से प्रश्न कर रहे हैं कि क्या उन्हें लाखों बच्चों और स्त्रियों की चीख सुनाई नहीं देती? आखिर ऐसा क्यों है कि वह सुन नहीं पा रही हैं? वह नहीं सुनेंगी क्योंकि उन्होंने पहले ही कह दिया था कि खेला होबे और अब उनके कार्यकर्ता हर विरोधी महिला के घर जा जाकर कह रहे हैं “एबार असल खेला होबे!

मनोचिकित्सक डॉ रजत मित्रा, जो ऐसे पीड़ितों की मानसिक पीड़ा को कम करने का प्रयास करते हैं, उन्होंने भी पश्चिम बंगाल की हिंसा की पीड़ित महिला की पीड़ा का उल्लेख किया है। वह लिखते हैं कि वहां पर स्त्रियाँ अब अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं क्योंकि अब वह गोनिमोतेर माल की धमकी पा रही हैं, गोनिमोतेर माल अर्थात गनीमत का माल।

पश्चिम बंगाल में चुनावों के बाद से ही हिंसा का दौर जारी है और अब चुन चुन कर उन हिन्दुओं को मारा जा रहा है या उनकी बेटियों को गनीमत का माल कहकर उठाया जा रहा है, जिन्होनें भाजपा को वोट दिया था।  अब तक एक लाख से अधिक हिन्दू पश्चिम बंगाल छोड़कर पड़ोसी असम में जा चुके है।

इस भीषण पलायन का शिकार हुए हिन्दू अब तक लौटने का साहस नहीं जुटा पाए हैं। और इस पलायन में कई हिन्दुओं को अपना सामान जैसे रिक्शा आदि ऐसे ही छोड़कर आना पड़ गया था। और उनका यह सामान अब तृणमूल कांग्रेस एवं इस्लामी गुंडों के कब्ज़े में हैं। वह लोग अब इन चीज़ों को वापस करने के लिए भारी रकम मांग रहे हैं।

सिर्फ न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी बर्धमान जिले के बोनपारा और मलिपारा के गावों में जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हो चुके हैं, वह अब हिन्दुओं से शान्ति से रहने के लिए दो लाख रूपए की मांग कर रहे हैं। यह गाँव पहले हिन्दू गाँव हुआ करते थे, परन्तु जन्सांख्यकी में निरंतर परिवर्तन के चलते अब यह मुस्लिम बहुल गाँव हो गए हैं।

ऐसा नहीं है कि जजिया केवल इन्हीं गाँवों तक सीमित हो। ऐसी घटनाएं नाडिया जिले के भी कुछ गाँवों से प्राप्त हुई हैं, जहाँ पर कट्टर इस्लामी हर परिवार से 80 हजार से लेकर 5 लाख रूपए तक की हिन्दू परिवारों से मांग कर रहे हैं।  एक बंगाली यूट्यूब चैनल आरामबाग टीवी के एंकर सफीकुल इस्लाम ने एक न्यूज़ पीस में यह बताया कि उनके पिता की भी दुकान को एक व्यक्तिगत विवाद के चलते बंद करा दिया गया था। यहाँ पर यह भी ध्यान में रखना होगा कि सफीकुल इस्लाम और उनकी बीवी को जून 2020 में पश्चिम बंगाल की पुलिस द्वारा इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार का विरोध किया था।  उन्होंने बताया कि कई हिंसाग्रस्त क्षेत्रों से उनके पास कॉल आई हैं कि उनसे 30 हजार से लेकर 50 हजार रूपए तक दुकान खोलने के लिए मांगे जा रहे हैं।

आम आदमियों के लिए न ही सरकार और न ही अधिकारी कुछ कर पा रहे हैं और आम हिन्दू कट्टर इस्लामी एवं तृणमूल कांग्रेस के गुंडों के आतंक से त्रस्त है और उनसे जजिया भी जमकर वसूला जा रहा है।  जजिया वह कर है जो मुस्लिम शासकों द्वारा गैर मुस्लिम जनता पर लगाया जाता था। और भारत में मध्यकाल में जब मुग़ल शासन था तो द्वितीय श्रेणी का नागरिक होने के नाते हिन्दुओं को वह कर देना पड़ता था।

और जो जजिया नहीं दे पाते थे उन्हें अपना धर्म बदलना पड़ता था। जैसा अभी पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं कि या तो जजिया दें या फिर अपना धर्म बदल दें।  पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने राज्य में होने वाली हिंसा को देखकर दुखी होते हुए कहा कि “क्या हमने ऐसी कल्पना की थी कभी? और कूच बिहार में जाने पर लोगों ने कहा कि झंडे लगाकर भी हमें छुटकारा नहीं मिल रहा है।” राज्यपाल ने कहा कि यह सही है कि कोविड की समस्या बड़ी है पर यह भी कोई छोटी समस्या नहीं है। राज्यपाल की पीड़ा एक एक शब्दों से झलक रही है जिसमे वह प्रश्न कर रहे हैं कि क्या स्वतंत्र भारत में एक वोट की कीमत यह देनी होगी? यह हमने कैसा समाज बना दिया है?

पर प्रश्न फिर वही है कि वह यह प्रश्न किससे कर रहे हैं? प्रश्न तो सभी से हैं, प्रदेश की मुख्यमंत्री से हैं, केंद्र सरकार से हैं और भाजपा से भी हैं? भाजपा से और केंद्र सरकार से सबसे अधिक हैं क्योंकि जिन लोगों ने वोट दिए थे, उन्होंने उन नेताओं के आश्वासन पर ही तो वोट दिए थे।  क्या वह विश्वास टूटने देगी? जैसा डॉ मित्रा उस राजनीतिक कार्यकर्ता के माध्यम से लिख रहे हैं कि इन्हीं सबके मध्य जिस स्त्री को उन पुरुषों ने गोनिमोतेर माल की धमकी दी है, उसकी निराशा और हताशा कम नहीं होगी। फिर वह लिखते हैं कि यह 2021 के बाद की बंगाल की नई वास्तविकता है और भारत की नई वास्तविकता बनने की ओर अग्रसर है। यह वक्तव्य कि “जो बंगाल आज सोचता है, वह भारत कल सोचता है” शायद सच होने को है, बस उसमें सोच के स्थान पर “शोक” लगाना होगा।

क्या हम वाकई धर्म के आधार पर शोक के लिए तैयार हैं? क्योंकि पश्चिम बंगाल के बाद अब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने भी भाजपा समर्थकों को अगले चुनाव परिणामों के बाद नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहने के लिए कहा है? क्या हिन्दुओं की जान की कीमत मात्र वोट देने या न देने तक ही सीमित है? प्रश्न कई है परन्तु दुर्भाग्य यही है कि इन प्रश्नों के उत्तर अभी हालफिलहाल कहीं नहीं हैं।

और अभी हिन्दुओं को सहना ही होगा क्योंकि उनका दुर्भाग्य यही है कि उनके साथ न्यायपालिका भी नहीं है और कलकत्ता उच्च न्यायालय यह कह चुका है कि वह ममता बनर्जी सरकार द्वारा चुनावों के उपरान्त हुई हिंसा का प्रबंधन करने के लिए उठाए गए क़दमों से संतुष्ट है और उन्होंने केंद्र सरकार की विशेष जाँच टीम गठित करने की मांग को एक सिरे से ठुकरा दिया है।

अब देखना यह है कि भाजपा अपने मतदाताओं के साथ किस सीमा तक जा सकती है? या फिर हिन्दू मतदाता अनाथ ही रहेगा?


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